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शहर और सपना PDF Print E-mail
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Wednesday, 03 September 2014 12:03

विनोद कुमार

जनसत्ता 3 सितंबर, 2014: आपातकाल की घोषणा के बाद मैं पहली बार दिल्ली गया था। उस दौरान एक मित्र के साथ हम गौतमनगर में रहते थे। चालीस रुपए मासिक किराए पर। हमारा कमरा एकमंजिली इमारत की छत पर था और सामने थी थोड़ी-सी जगह। खुशनुमा दिन वे होते थे जब करोलबाग में रहने वाले एक बिहारी परिवार में कुछ विशेष खाने के लिए हमें आमंत्रित किया जाता। वहां गुड़ मिले चावल की खीर बनती और पूड़ियां। उन दिनों कांग्रेस का राज था। अवैध कालोनियों पर बुलडोजर चल रहे थे और उन्हें बचाने के लिए संजय गांधी की शरण में जाना पड़ता था। 

इतिहास का शोधकर्ता तो नहीं, लेकिन कुछ बातें मोटी बुद्धि से समझ सका कि सामंती और राजशाही के युग में राजे-रजवाड़े शहर बसाया करते थे। हस्तिनापुर में पांडवों को सूई भर जमीन देने के लिए जब दुर्योधन तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने इंद्रप्रस्थ बनवाया। हैदराबाद के निजाम ने हैदराबाद, विजयवाड़ा के राजघरानों ने विजयवाड़ा। इसी तरह कई शहर मुगलों के जमाने में अस्तित्व में आए, जो मूलत: जनता की गाढ़ी कमाई की लूट से बनते थे। फिर वाणिज्य व्यापार के केंद्र के रूप में इतिहास के दौर में कई शहर बने। आधुनिक भारत में कल-कारखानों के साथ बोकारो, भिलाई, दुर्गापुर और रांची जैसे औद्योगिक शहर अस्तित्व में आए। हालांकि औद्योगिक शहर के रूप में विकसित होने के पहले भी उन इलाकों में कुछ आर्थिक गतिविधियां चलती थीं। मसलन, औद्योगिक शहर बोकारो के अस्तित्व में आने से पहले वहां चास नाम का शहर आबाद था, जहां संभवत: चासी यानी बड़े किसान रहते थे और यह आदिवासी इलाकों में पैदा होने वाले लाह के व्यापार का केंद्र था। इसी तरह एचईसी के अस्तित्व में आने के पहले भी ईसाई मिशनरियों की सक्रियता, सघनता और बिहार की उप-राजधानी होने की वजह से रांची एक शहर के रूप में विकसित हो रहा था। लेकिन उन्हें गति मिली आर्थिक आधार मिलने के बाद। 

मगर अब आर्थिक गतिविधियों का अर्थ बदल गया है। किसी जमाने में मुंबई कपड़ा मिलों के लिए विख्यात था। पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद कांसे के बर्तनों और मलमल के कपड़ों के लिए। मझोले उद्योग के दायरे में चलने वाले ये उद्योग समाप्तप्राय हैं। उपभोक्ता माल अब केंद्रीकृत रूप में बनता है। बहुधा उत्पादन के केंद्र पिछड़े इलाके में होते हैं। शहर अब उद्योग वाणिज्य का केंद्र नहीं। प्रभु वर्ग की रिहाइश का ठिकाना है। वहां जनप्रतिनिधि, सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, प्रोफेसर, डॉक्टर, वकील, पत्रकार या फिर बिल्डर, उद्योगपति, सटोरिए आदि रहते हैं। शिक्षा का केंद्र होने की वजह से बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी, जिन्हें अगर हॉस्टलों में जगह मिल गई तो ठीक, वरना बेहद तंगहाल बस्तियों में रहते हैं। शहर के लिए महरी, मजदूर, ठेला-रिक्शा वाले, छोटे-मोटे कारीगरों की


भी जरूरत होती है। लेकिन ऐसे लोगों के लिए शहर में कभी जगह नहीं रही। वे बुनियादी सुविधाविहीन झोपड़पट्यिों में रहते हैं। और यूज ऐंड थ्रो वाली जो संस्कृति आ रही है, उसमें छोटे-मोटे मिस्त्रियों की जरूरत ही नहीं। बड़े शहरों में अब मेनटेनेंस का काम भी कॉरपोरेट जगत करता है। हर कंपनी का अपना कस्टमर केयर सेंटर है। पुरानी मिक्सी, टेबल फैन, आयरन आदि बनाने वाला मिस्त्री अब आपको छोटे-मोटे कस्बों में ही मिलेगा। नवीं मुंबई, पनवेल जैसे आधुनिक शहरों में तो कोई झोपड़पट््टी भी आपको नहीं दिखेगी। अब तो ऐसी दीवारों से घिरे शहरों की कल्पना की जा रही है, जहां मजदूर आएंगे और शाम ढलने के पहले निकल लेंगे। बड़ी-बड़ी कॉलोनियां इसी तर्ज पर बन रही हैं। 

इसलिए, जब मोदी कहते हैं कि वे सौ नए शहर बनाएंगे तो उसका अर्थ क्या है? क्या शहर किसी के बनाए बनता है? क्या वे मध्ययुगीन बादशाह हैं, जो शहर बनवाएंगे? अगर उनकी नीतियों से नवधनाढ्य वर्ग की आबादी में इजाफा होता है और उसके लिए शहरों का विस्तार होता है, तो क्या उन नए सुविधा संपन्न रिहायशी इलाकों में गरीब गुरबों के लिए जगह होगी? बंगलुरु और मैसूर के बीच शहर पसरता जा रहा है। मुंबई और पुणे के बीच शहर का विस्तार होता जा रहा है। अपने झारखंड में टाटा और रांची के बीच तमाड़, बुंडू आदि शायद कल न रहें या उनका चेहरा इस कदर बदल जाए कि हम आप उसे पहचान भी नहीं सकें। लेकिन तब सामान्य लोगों के लिए वहां जगह रह जाएगी? फिर ऐसे शहरों का हमारे लिए क्या महत्त्व? इसलिए बेहतर तो यह होता कि मोदी मूलभूत नागरिक सुविधाओं को घर-घर पहुंचाने की बात करते। लेकिन यह दुष्कर कार्य है। आसान है शहर बनाना, क्योंकि यह बस लूट की छूट देने मात्र से हो जाएगा। और शहर में जन साधारण के लिए माकूल जगह न भी हो, लेकिन वह आज भी एक रूमानी सपना है। और मोदी सपनों के सौदागर। 


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