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संस्थाओं की साख PDF Print E-mail
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Tuesday, 02 September 2014 11:01

जनसत्ता 2 सितंबर, 2014: न्यायमूर्ति पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाए जाने की संभावना ने स्वाभाविक ही एक तीखे विवाद को जन्म दिया है। दरअसल, ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल के पद पर नियुक्त करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता, जो सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रह चुका हो। अगर ऐसा होता है तो यह न केवल राज्यपाल के चयन में मनमानी का एक और उदाहरण होगा बल्कि इससे न्यायपालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचेगी। इस तरह, ऐसा फैसला दोनों संस्थाओं की साख को चोट पहुंचाने वाला होगा। विपक्ष में रहते हुए भारतीय जनता पार्टी इस बात की पुरजोर वकालत करती रही कि जजों को सेवानिवृत्ति के बाद कोई पद ग्रहण नहीं करना चाहिए। यह वाजिब तर्क था, क्योंकि अवकाश-प्राप्ति के बाद लाभ का पद मिलने की आशा में न्यायिक निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। अब भाजपा अपने उस रुख को तिलांजलि देने पर क्यों आमादा है? 

अगर न्यायमूर्ति सदाशिवम को लोकपाल या मानवाधिकार आयोग या सूचना आयोग की कमान सौंपे जाने या उनकी अगुआई में कोई जांच आयोग बिठाए जाने की बात होती, तो उसे सहजता से लिया जाता, क्योंकि ये जिम्मेदारियां पूरी तरह गैर-राजनीतिक हैं और निष्पक्षता के मूल्य से जुड़ी हैं। यह परिपाटी के भी अनुरूप होता। लेकिन राज्यपाल को केंद्र के निर्देश पर चलना होता है। फिर, जिस तरह के लोग राज्यपाल होते आए हैं उससे इस पद को राजनीति से परे रखने की अपेक्षा बराबर धूमिल होती गई है। पिछले दिनों कई राज्यपाल हटाए गए हैं और उनकी जगह नई नियुक्तियां हुई हैं। इनमें कल्याण सिंह और वजूभाई वाला आदि ऐसे लोग हैं जिनका केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़ाव जगजाहिर है। क्या न्यायाधीश रह चुके व्यक्ति को इस कतार में शामिल होना चाहिए? अच्छा हो कि न्यायमूर्ति सदाशिवम खुद राज्यपाल पद की पेशकश नामंजूर कर दें। पर अभी तक उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है। प्रधान न्यायाधीश राष्ट्रपति को शपथ दिलाते हैं, इससे उनके पद को संविधान में मिले महत्त्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश को राज्यपाल का पद पुरस्कार होगा, या उनकी पृष्ठभूमि का अवमूल्यन? प्रस्तावित न्यायिक नियुक्ति आयोग को लेकर कार्यपालिका के बेजा


दखल के अंदेशे जाहिर किए गए हैं। ऐसे समय एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल बनाए जाने की चर्चा और भी कई सवालों को जन्म दे सकती है। विपक्ष में रहते हुए यूपीए सरकार पर भाजपा का एक आरोप यह भी होता था कि वह संवैधानिक संस्थाओं का मान नहीं रख रही है। लेकिन भाजपा ने कैसा मान रखा है? 

वर्ष 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा के ही एक नेता बीपी सिंघल की याचिका पर फैसला सुनाया था कि जब तक कोई ठोस और प्रासंगिक कारण न हो, केंद्र में सरकार बदलने के साथ किसी राज्यपाल को पद-मुक्त नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन पांच जजों के संविधान पीठ के इस फैसले को मोदी सरकार ने ताक पर रख दिया और एक के बाद एक कई राज्यपाल बदल दिए। उन्हें हटने के निर्देश भी दिए गए तो केंद्रीय गृहसचिव के जरिए। क्या संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करने का भाजपा का यही तरीका है? भाजपा संघीय भावना का खयाल रखने का भी दम भरती रही है। लेकिन नए राज्यपालों के चयन में केंद्र को संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से परामर्श करना कतई जरूरी नहीं लगा। राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से मोदी सरकार ने भरोसा दिलाया था कि वह संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का खयाल रखेगी। फिर एक महीना भी नहीं हुआ था कि उसके इस आश्वासन की कलई खुलने लगी। और अब तो उसकी कथनी और करनी की खाई और चौड़ी होती जा रही है।


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