मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
संयम और क्षमा PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Tuesday, 02 September 2014 10:55

शुभू पटवा

जनसत्ता 2 सितंबर, 2014: सदा ही इनकी आवश्यकता रही है और आज तो ये अपरिहार्य हैं। लेकिन हम इन्हीं के प्रति सबसे अधिक बेपरवाह हैं। ऐसा इसलिए है कि आज हम पर ‘बाजार’ का दबाव है और उससे बचना मुश्किल है। उपाय एक ही बचता है कि हम अपनी जीवनशैली को बदलें और इसके लिए हमारे पुरखों ने एक सौगात के रूप में जो साधन हमें दिया है, उसका स्मरण करें। समाज का एक वर्ग ‘जैन’ इसे स्वीकार करता है, पर अंगीकार करते हुए वह रस्म-अदायगी भर का निर्वाह कर पाता है। यह सौगात है- ‘पर्यूषण पर्व या संवत्सरी’। हमारे जिन पुरखों ने यह सौगात दी, वे भगवान महावीर हैं। महावीर तीर्थंकर हुए हैं। उनके पूर्ववर्ती तीर्थंकरों की ऐसी कोई परंपरा रही है, यह अज्ञात है। पर संयम, साधना और क्षमा की परंपरा उन पूर्ववर्तियों की भी रही है। ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं। कालांतर में निर्वाण प्राप्त करने वाले सभी तीर्थंकरों ने सांसारिक ऐश्वर्य और भौतिक वैभव को छोड़ कर ही संयम और साधना के मार्ग को अंगीकार किया। उनकी साधना के वैभव ने उन्हें अपराजेय बना दिया था।

अपने उन पुरखों को आज हमने संकीर्णता के दायरे में कैद कर डाला है। वे अब सबके न रह कर ‘कुछेक’ के हो गए हैं। एक महान परंपरा, जो जन-जन के लिए थी और आज भी हो सकती है, वह सिकुड़ कर रह गई है। पर कितना अच्छा है कि निर्वाह करने की इस धारा (भले रस्म-अदायगी हो) में उसके नामलेवा तो वे कहलाते हैं। जिस तरह अनेक भाषाएं विलोपित हो चुकी हैं, अनेक खतरों के बाद भी जिस तरह हिंदी का नाम है और चौदह सितंबर ‘हिंदी दिवस’ का हमें स्मरण भी रहता है, इसीलिए सारी दुर्दशा के बाद भी ‘हिंदी’ का अस्तित्व अच्छा-खासा बचा हुआ है, उसी तरह पर्यूषण पर्व या संवत्सरी, फिर अगला दिन क्षमायाचना पर्व या मैत्री दिवस भी हजारों वर्षों से हमारी स्मृति में है। बजरिए जैन ही सही। लाखों जन (जैन) इस महापर्व के आठ दिनों में यथासंभव संयम बरतते हैं। फिर आठवें दिन उपवास रखते हैं और अगले दिन हर जन से क्षमायाचना करते हैं। इस बार यह पर्व अगस्त के अंत में आया। आचार्यश्री तुलसी (अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता) ने तो इस क्षमायाचना दिवस को ‘मैत्री दिवस’ का ही नाम दे दिया था। इस एक बात से क्षमायाचना दिवस का अर्थ व्यापकता में बदल गया था। फिर भी अगर यह परंपरा ‘जैन’ के दायरे में सिमटी हुई है, तो यह हमारे लिए सोचने का मामला क्यों नहीं है? प्रगतिशील समाज में आलोचना का अपना स्थान है, पर आलोचना मर्यादा में होनी चाहिए, यह सब जानते हैं। तो क्या सबसे पहले हमारी सरकार को ही प्रगतिशीलता का


परिचय नहीं देना चाहिए?

विनम्रता, उदारता और सहनशीलता हर एक के जीवन के गुण होते हैं- यह सभी मानते हैं। फिर यह मानने में कोई गुरेज क्यों होना चाहिए कि इन गुणों के लिए जहां भी, जो भी तजवीज हमें मिले उसे अंगीकार किया जाए? इसके लिए प्रगतिशीलता कहां आड़े आ रही है? अगर वह आड़े आती है, तो फिर यह दायरों में बंधे रहना क्यों न माना जाए? प्रगतिशीलता का तकाजा है कि वह संकीर्णताओं के दायरों को तोड़े, उनका अतिक्रमण करे। संवत्सरी या मैत्री दिवस मात्र ‘जैन’ तक न सिमट कर ‘जन-जन’ का आदर्श और वास्तविक आधार-सेतु बने। इसके लिए किसी पहल के रूप में हमारे प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को पहल करनी चाहिए। अच्छी और स्वस्थ परंपराओं को जीवित रखना क्या सरकार का काम नहीं? संयम और क्षमा जन-जन के स्वभाव का अंग बने और ऐसी जीवनशैली का विकास हो, जो ‘बाजार’ से संचालित न होकर हमारे अपने स्वभाव से चालित हो। तब ‘बाजार’ पर भी प्रकारांतर से नियंत्रण स्थापित होगा। तब संयम के मायने भी व्यापक हो जाएंगे। यह कैवल भौतिक संसाधनों तक सीमित न रह कर प्राणी और व्यवहार में भी झलकेगा। इसके बाद क्षमा, विनम्रता, सहनशीलता और उदारता अपने आप आ जाएंगे।

हमारे शिक्षा संस्थानों से इसकी शुरुआत सरलता से हो सकती है। एक समय में ऋषियों के आश्रम ही ‘शिक्षण-शालाएं’ हुआ करते थे। वहां नामांकित शिक्षार्थियों की दैनिक चर्या में संयम और साधना का प्रमुख स्थान था। ‘गला-काट’ शिक्षा प्रबंधन के इस दौर में भी हमारी वही परंपरा अपना स्थान ग्रहण करे, तो बेहतर रहे। आज शिक्षा प्रमुख रूप से शासन के हाथों में है और शासन के लिए ऐसी व्यवस्था निर्मित करना आसान है। हमारी प्रारंभिक शिक्षण शालाएं साधना और शिक्षा के ऐसे केंद्र बन जाएं, तो जिस नालंदा या तक्षशिला की परंपरा से दुनिया प्रभावित है और जिसे फिर से साकार करने की बातें होने लगी हैं, सही अर्थों में उसे साकार किया जा सकता है।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta  


आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?