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अर्थव्यवस्था की सूरत PDF Print E-mail
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Monday, 01 September 2014 11:59

जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: सवा दो साल से विकास दर में चला आ रहा ठहराव और ह्रास का सिलसिला टूटने से जहां अर्थव्यवस्था में फिर से तेजी आने की उम्मीद जगी है, वहीं मोदी सरकार को अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिला है। बीते शुक्रवार को आए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आकलन के मुताबिक अप्रैल से जून के बीच यानी मौजूदा वित्तवर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 5.7 फीसद रही, जो कि पिछली नौ तिमाहियों का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले साल की इसी अवधि में जीडीपी की वृद्धि दर पांच फीसद से नीचे थी। विनिर्माण और उद्योग, अर्थव्यवस्था के इन दो अहम क्षेत्रों ने उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है। दूसरी उत्साहजनक बात यह है कि बिजली, गैस और जलापूर्ति जैसे आधारभूत क्षेत्रों ने दस फीसद से ऊपर बढ़ोतरी हासिल की है। ऐसी ही वृद्धि वित्तीय सेवाओं की भी रही। इसी समय आए कुछ और आंकड़ों ने भी अर्थव्यवस्था की तस्वीर बेहतर होने के संकेत दिए हैं। मसलन, मई से लगातार तीन महीने निजी वाहनों की खरीद का ग्राफ ऊपर चढ़ा है। निवेश भी बढ़ा है। ये आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब राजग सरकार ने सौ दिन पूरे किए। लिहाजा, इसे अपनी उपलब्धि बताने में प्रधानमंत्री क्यों संकोच करते! उन्होंने कहा कि इन सौ दिनों में हमने स्थिरता हासिल की है और जो गिरावट का दौर चल रहा था उसे रोका है। 

बेशक मोदी सरकार आते ही निवेशकों का हौसला बढ़ा और अर्थव्यवस्था में तेजी की उम्मीद कुलांचे भरने लगी। इस माहौल का असर पड़ा होगा। पर जीडीपी के ताजा आंकड़े अप्रैल से जून के हैं। जबकि मोदी सरकार मई के आखिरी हफ्ते में गठित हुई। जाहिर है, सुधार का क्रम यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में ही शुरू हो गया था। बहरहाल, सवाल यह है कि क्या पहली तिमाही में दिखी वृद्धि आगे भी बनी रहेगी? क्या इन आंकड़ों के मद््देनजर ब्याज दरों में कटौती का कदम रिजर्व बैंक उठाएगा? इस बारे में कई अगर-मगर हैं। कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले साल चार फीसद थी, ताजा आंकड़ों में इसमें कमी दर्ज हुई है। कुछ लोगों ने इसे कमजोर मानसून से जोड़ा है। यह


दलील अपनी जगह सही है। पर कई बड़े राज्यों में कमजोर मानसून का असर आने वाले महीनों में ज्यादा दिखेगा। इसलिए अगली दो-तीन तिमाहियों में कृषि क्षेत्र की विकास दर में और कमी आ सकती है। इससे खासकर ग्रामीण इलाकों में मांग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। फिर, कृषि क्षेत्र का लचर प्रदर्शन महंगाई पर काबू पाने की कोशिशों पर पानी फेर सकता है।

पहले ही खुदरा महंगाई नौ फीसद से ऊपर है। अगर महंगाई पर नियंत्रण पाने की चिंता वैसी ही बनी रही, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाने से हिचक सकता है। दूसरी अड़चन यह है कि राजकोषीय घाटे में कोई कमी नहीं आई है बल्कि कुछ बढ़ोतरी ही हुई है। चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में राजकोषीय घाटा जीडीपी का साढ़े दस फीसद रहा, जो कि पिछले साल की इसी अवधि से थोड़ा अधिक है। सरकार ने इस वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटे को करीब चार फीसद पर लाने का लक्ष्य तय किया हुआ है। पर पहली तिमाही के सरकारी खर्चों और राजस्व के अंतर को देखते हुए यह लक्ष्य पाना कतई संभव नहीं दिखता। अगर खर्च और राजस्व की यह खाई बनी रही तो उलटे राजकोषीय घाटा और बढ़ सकता है। फिर ब्याज दरें घटाने में अड़चन का यह एक अतिरिक्त कारण बनेगा, महंगाई भी और बेलगाम होगी। इसलिए जीडीपी के उत्साहजनक आंकड़ों के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि सब कुछ अच्छा ही है।  


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