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बिपिन चंद्र PDF Print E-mail
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Monday, 01 September 2014 11:59

जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: उनका मानना था कि इतिहास प्रगतिशील विचारों के प्रसार का सशक्त माध्यम हो सकता है। इसी नजरिए से उन्होंने न सिर्फ आधुनिक भारत का इतिहास लिखा, बल्कि संकीर्ण मतवादों के विरोध में इतिहासकारों का प्रखर समूह तैयार किया। बिपिन चंद्र ने जिस दौर में आजाद भारत का इतिहास लिखना शुरू किया, उससे पहले का लगभग सारा इतिहास लेखन औपनिवेशिक ढर्रे और मार्क्सवादी विचारों की दो बनी-बनाई लीक पर चल रहा था। उन्होंने इन दोनों धाराओं से अलग अपनी राह बनाई। अलबत्ता उनके इस अनूठे योगदान को समझने में लोगों को वक्त लगा। कुछ लोगों ने उन्हें कांग्रेस समर्थक इतिहासकार कहना शुरू कर दिया था। जबकि हकीकत इससे अलग थी। वे प्रगतिशील मूल्यों के हिमायती थे। आजादी के पहले और बाद का इतिहास लिखने वाले किसी भी इतिहासकार के लिए निरपेक्षता के बावजूद ऐसे आरोपों से बचना आसान नहीं था, क्योंकि उस वक्त राष्ट्रीय जीवन में कांग्रेस की ही सबसे प्रभावी भूमिका थी। बिपिन चंद्र ने न कभी इन आरोपों का तल्ख जवाब देना जरूरी समझा, न अपनी धारा बदली। उनके व्यक्तित्व में ऐसी सरलता थी कि कोई भी उनसे मिल कर सहज ही अपनत्व महसूस करता था। उनकी कोमल मुस्कान, सहजता और निश्छलता उनके व्यक्तित्व की खूबियां थीं। विरोधी विचार वालों से भी वे बिना किसी आग्रह के मिलते, उन्हें सुनते, बल्कि अनेक मौकों पर उनके सकारात्मक पक्षों को सार्वजनिक रूप से उभारने में कोई संकोच नहीं करते थे। भारतीय इतिहास कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने देश के तमाम इतिहासकारों को प्रगतिशील विचारों के प्रसार के मकसद से इतिहास लेखन की दिशा में प्रवृत्त किया। बाद में उन्होंने सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक तरह से मोर्चा ही खोल दिया था। इसके लिए दिल्ली इतिहासकार समूह बनाया, जिसके सदस्य देश भर में लिखी जा रही इतिहास-पुस्तकों और पाठ्यपुस्तकों पर नजर रखते और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने के खिलाफ आवाज उठाते। इसका सबसे बड़ा उदाहरण एनसीइआरटी की पाठ्यपुस्तकों में शामिल पाठों में ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत किए जाने पर उनका विरोध था। आधुनिक भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास के साथ-साथ उन्होंने युवा इतिहासकारों के साथ मिल कर सांप्रदायिकता के


विरोध में कई पुस्तकें तैयार कीं। सरल भाषा में कई ऐसी पुस्तिकाएं भी तैयार की गर्इं, जिन्हेंजनजागरूकता अभियान का जरिया बनाया जा सके। 

बिपिन चंद्र बड़े इतिहासकार और दूरद्रष्टा तो थे ही, कुशल प्रशासक भी थे। नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने इतिहास और समाजविज्ञान की अनेक दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद और प्रकाशन कराया। खासकर प्रवासी इतिहासकारों की पुस्तकों को भारतीय भाषाओं में लाना उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। हालांकि यह एक तरह से शोभा का पद था, पर वे उम्र अधिक होने और स्वास्थ्य ठीक न रहने के बावजूद पूरी ऊर्जा के साथ वहां की हर गतिविधि में शामिल रहते। पांडुलिपियों की तलाश से लेकर उनके संपादन, अनुवाद आदि के मामले में वे व्यक्तिगत रुचि लेते रहे। इस मामले में न तो कभी अपनी विचारधारा को ऊपर रखने की कोशिश की और न दूसरी विचारधारा को मलिन करने के मकसद से लिखी गई पुस्तकों के प्रकाशन को बढ़ावा दिया। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। एक लेखक ने अपनी पुस्तक में सावरकर के माफी मांगने वाले प्रकरण को विस्तार से लिखा था। बिपिन चंद्र ने उनसे वह अंश हटाने को कहा। उनका मानना था कि इस एक घटना के आधार पर स्वतंत्रता संग्राम में सावरकर के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे निश्छल, जुझारू और उदारमना इतिहासकार को खो देना निश्चय ही एक बड़ी बौद्धिक क्षति है। 


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