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जल जतन PDF Print E-mail
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Monday, 01 September 2014 11:52

श्रीभगवान सिंह

जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: इस साल गरमी की छुट्टियों में अपने गांव गया तो सबसे सुखद अनुभव हुआ कुएं को लेकर। वर्तमान युवा पीढ़ी भले ही इस बात से अवगत न हो, लेकिन यह तथ्य है कि पहले गांवों से लेकर शहरों तक में पानी के लिए कुएं खुदे होते थे, जिनसे लोगों को पीने या फिर अन्य कार्यों के लिए पानी सुलभ होता था। कुएं के अलावा पशु-पक्षियों को पानी सुलभ कराने के लिए पोखर-तालाब हुआ करते थे। शहरों में बोरिंग और मोटर के चलन ने कुओं को समाप्त करना शुरू किया, लेकिन गांवों में कुएं आबाद रहे। खेतों की सिंचाई का काम भी इनके जरिए होता था। ढेकुल, रहट जैसे उपकरणों से कुओं का जल निकाल कर पटवन का काम किया जाता था। इससे पानी की फिजूलखर्ची नहीं होती थी। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों के दौरान गांवों में भी हैंडपंप, बोरिंग-मशीन का चलन इतनी तेजी से बढ़ा कि लोग कुओं से उदासीन होकर पीने से लेकर सिंचाई तक के कार्य या तो हैंडपंप से या बोरिंग से करने लगे। नतीजतन, इन कुओं का अस्तित्व संकट में पड़ता गया और कई कुओं को लोगों ने र्इंट-मिट्टी से भर कर पाट दिया।

पिछले साल गांव गया तो मेरे घर के पास स्थित शिव मंदिर से संबद्ध एक कुएं की हो रही मौत ने मुझे विचलित कर दिया। कुछ लोगों के सामने मैंने इस कुएं के पुनरुद्धार का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने बड़े उत्साह से इसका स्वागत किया। मैंने कुछ आर्थिक सहयोग किया और गांव के सुदामा चौबे, दयाशंकर सिंह और उनकी पत्नी ने पूरी जिम्मेदारी से उस कुएं के पुनरुद्धार का काम कराया। उसमें जमा र्इंटों और मिट्टी को निकाला गया और उसका जल-स्रोत फिर सक्रिय हो गया। कुएं में पाइप लगा कर एक चापाकल लगा दिया गया, ताकि इसके पानी का इस्तेमाल होता रहे। इस बार गांव गया तो इस दम तोड़ते कुएं को जिंदा होते देख कर मन आह्लादित हो उठा। दूसरी खुशी इस बात की हुई कि धरती से पानी निकालने वाले हैंड पंप, बोरिंग जैसे आधुनिक तकनीकों के मोह में पड़ी युवा पीढ़ी में कुओं के प्रति आकर्षण बढ़ चला है, क्योंकि पानी की फिजूलखर्ची को रोकने के लिए वह इसे एक कारगर उपाय के रूप में देखने लगी है।

सच तो यह है कि अत्यधिक पानी निकासी के कारण गरमी में कई हैंड पंपों या बोरिंग के जल स्तर इतने नीचे चले जाते हैं कि उनसे पानी आना बंद हो जाता है, जबकि कुएं कभी सूखते नहीं थे। जब इस नई पीढ़ी को मैंने बताया कि कैसे पहले इन कुओं से ढेकुल


या रहट के जरिए सिंचाई के कार्य संपन्न होते थे, तो ऐसे उपकरणों के लिए उनका मन मचलने लगा। आज की तारीख में ये उपकरण लुप्तप्राय हो चुके हैं। मेरे क्षेत्र में न तो ढेकुल बनाने-चलाने वाले इल्मदार रहे, न रहट का नामो-निशान रहा। काश, आज गांधी होते, तो जिस तरह उन्होंने लुप्तप्राय चरखे को 1917 में खोज निकाला और हाथ-पैर को बेकार करने वाले मशीनीकरण के बरक्स पूरे देश में हस्त उद्योग के रूप में चरखे का जाल बिछा दिया, उस तरह आज वे पानी की फिजूलखर्ची को रोकने और हाथ-पैर के श्रम पर आधारित ढेकुल, रहट जैसे उपकरणों को खोज निकालते।

निस्संदेह यह एक असंभव हो चुके कार्य को संभव बनाने की चुनौती होती। लेकिन इसमें शक नहीं कि ‘आज भी खरे हैं तालाब’ की तरह पुरातन हो चुके ये कुएं भी काफी उपयोगी हैं। कभी इन कुओं को ‘इनार’ या ‘इनारा’, यानी वर्षा के देवता इंद्र का इंद्रासन भी कहा जाता था। बढ़ते जल संकट, जल स्तर के निरंतर नीचे होते जाने को ध्यान में रखते हुए कुओं के साथ-साथ ढेकुल, रहट जैसे उपकरणों की वापसी वांछनीय जान पड़ती है। दरअसल, आज प्रौद्योगिकी की कोख से मानव श्रम को विस्थापित करने वाले पैदा हो रहे अलग-अलग यंत्रों के बरक्स श्रम आधारित इन पुराने उपकरणों की वापसी कम से कम जल संकट से निपटने के लिए जरूरी लगती है।

इस बार इस सुखद अनुभूति के साथ गांव से लौटा कि गांवों के अभिन्न अंग रहे कुओं को न मिटने देने की एक छोटी-सी मुहिम मेरे निखती कला गांव में आकार लेने लगी है। सचमुच नई तकनीक के अंध मोह में पड़ कर, जिसे पुराना समझ कर मिटा देने में हम विकास की गति देख रहे हैं, उस पुराने में अब भी काफी दमखम है। जरूरत है उसकी वांछनीयता से नई पीढ़ी को अवगत कराया जाए।


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