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यों ही नहीं उमड़ा नरेंद्र मोदी का बौद्ध प्रेम PDF Print E-mail
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Monday, 01 September 2014 09:57



पुण्य प्रसून वाजपेयी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्योतो के प्रसिद्ध तोजी व किंकाकुजी बौद्ध मंदिर यों ही नहीं पहुंचे। इस साल नवंबर में होने वाले सार्क सम्मेलन के लिए वे नेपाल जाएंगे तो काठमांडौ के बौद्धनाथ या स्वयंभूनाथ स्तूप के दर्शन करने भी यों ही नहीं जाएंगे। भूटान यात्रा करने भी वे यों ही नहीं गए। ध्यान दें तो बौद्ध धर्म का जहां-जहां प्रचार प्रसार हुआ और जहां-जहां की सरकारें बौद्ध धर्म से प्रभावित रही हैं, मोदी उन सभी के साथ एक नया रिश्ता बना रहे हैं और इसमें सेतू का काम बौद्ध धर्म कर रहा है। 

अब यह सवाल नागपुर में आंबेडकरवादियों से लेकर यूपी के मायावती समर्थक दलित वर्ग में भी उठने लगा है कि मोदी के बौद्ध प्रेम के पीछे की कहानी, बौद्ध धर्म से प्रभावित देशों के साथ भारत के रिश्तों को नया आयाम देना है या फिर संघ परिवार के विस्तार के लिए गुरु गोलवरकर के दौर की वह सीख है जिसे राजनीतिक जमीन पर मोदी उतारना चाह रहे हैं। संघ के पन्नों को पलटें तो 1972 में सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ठाणे में पांडुरंग शास्त्री आठवले के निवास पर दस दिन की चिंतन बैठक में इस बात पर जोर दिया था कि संघ परिवार के विस्तार के लिए जातपात, संप्रदाय व भाषा से ऊपर उठकर सभी को साथ लेना जरूरी है। असर इसका यह हुआ कि केरल के दलित चिंतक श्री रंगाहरि आरएसएस के बौद्धिक प्रमुख के पद पर हाल के दिनों तक रहे और इसी कड़ी में विश्व हिंदु परिषद के बालकृष्ण नाईक लंबे समय से दुनिया भर में बौद्ध धर्म को मानने वाले देशों के साथ संपर्क बनाए हुए हैं। 

संघ परिवार के संबंध भूटान, नेपाल, श्रीलंका व जापान समेत दर्जन भर देशों के बौद्ध धर्मावलंबियों के साथ बने हुए हैं लेकिन आजादी के बाद पहली बार संघ परिवार यह महसूस कर रहा है कि अपने बूते भाजपा की सरकार बनी है तो संघ की हर उस धारणा को साकार किया जाए जिसकी कल्पना इससे पहले की जरूर गई लेकिन उसे लागू कैसे किया जाए यह सवाल अनसुलझा ही रहा। चंूकि आरएसएस का प्रचारक रहते हुए मोदी ने भी गोलवरकर का यह पाठ पढ़ा ही होगा कि तो सियासत साधने के लिए वे भी गोलवरकर के मंत्र को राजनीतिक जमीन पर उतारने से चूकेंगे नहीं। यानी महाराष्ट्र में रिपब्लिक पार्टी के नाम पर सियासत करने वाले आंबेडकरवादी हों या आंबेडकर का नाम लेकर दलित राजनीति करने वाली मायवती हों। खतरे की घंटी दोनों के लिए है। 

पहली नजर में लग सकता है कि मायावती की समूची सियासत ही आज शून्य पर आ खड़ी हुई है तो वे प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लेने के लिए जन-धन योजना पर वार करने से चूक नहीं रही हैं। लेकिन मोदी जिस सियासत को साधने के लिए कई कदम आगे बढ़ चुके हैं, उसके सामने अब मायावती या मुलायम के वार कोई मायने रखेंगे नहीं। क्योंकि राष्ट्रीयता की बिसात पर संघ की उसी सोच को आजमाया जा रहा है जिस दिशा में किसी दूसरे राजनीतिक दल ने काम किया नहीं और आरएसएस अपने जन्म के साथ ही इस काम में लग गया। 

वनवासी कल्याण आश्रम जिन क्षेत्रों में सक्रिय है और उस समाज की पिछड़ी जातियों के जितना करीब होकर काम कर रहा है, क्या किसी राजनीतिक दल ने कभी उस समाज में काम किया है? पुराने स्वयंसेवकों से मिलिए तो वे आज भी कहते मिलेंगे कि जेपी के कंधे से राजनीतिक प्रयोग करने वाले बालासाहेब देवरस इंदिरा गांधी के


बाद मोरारजी देसाई को नहीं जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते थे। सिर्फ दलित ही नहीं बल्कि जिस हिंदू शब्द को लेकर सियासी बवाल देश में लगातार बढ़ रहा है उसकी नींव भी कोई आज की नहीं है। जिन मोदी को हिंदुत्व शब्द के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है और अटल बिहारी वाजपेयी का हवाला देकर जिस उदारवादी चेहरे का जिक्र किया जा रहा है, क्या 1974 में लोकसभा में वाजपेयी का दिया भाषण - अब हिंदू मार नहीं खाएगा - किसी को याद नहीं है। संघ परिवार ने तो वाजपेयी के इस भाषण की करोड़ो कापियां छपवाकर देश भर में बंटवाई थीं। यह अलग सवाल है कि 1977 में विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी ने कभी हिंदू शब्द का जिक्र सियासी तौर पर नहीं किया। लेकिन संघ के भीतर का सच यह भी है कि देवरस हों या उससे पहले गोलवरकर या फिर देवरस के बाद में रज्जू भैया। सभी ने वाजपेयी को नेहरू की तर्ज पर देश में सर्वसम्मति का रास्ता तैयार करने को कहा भी और दिशा भी दिखाई। 

क्योंकि हिंदू शब्द तो संघ के जन्म के साथ ही जुड़ा है। हेडगेवार ने खुले तौर पर हिंदू होने की वकालत की। तो गोलवरकर ने तो हेडगेवार के दौर से संघ के प्रतिष्ठित स्वयंसेवक एकनाथ रानाडे को 1971-72 में तब प्रतिनिधि सभा से अलग कर दिया जब उन्होंने विवेकानंद शिला स्मारक पर काम करते वक्त विवेकानंद को इंदिरा गांधी के कहने पर हिंदू संस्कृति की जगह भारतीय संस्कृति का प्रतीक बताया। उस वक्त गोलवरकर यह कहने से नहीं चूके कि राजनीतिक वजहों से अगर हिंदू शब्द को दरकिनार करना पडेÞ तो फिर संघ का अस्तित्व ही संकट में है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। गुरु गोलवरकर के जीवित रहते हुए रानाडे कभी प्रतिनिधि सभा का हिस्सा नहीं बन पाए। लेकिन देवरस ने अपने दौर में राजनीतिक वजहों से ही हिंदू शब्द पर समझौता किया। जनता पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर जब चंद्रशेखर और मधु लिमये ने देवरस को समझाया कि हिंदू शब्द पर खामोशी बरतनी चाहिए क्योंकि यह राजनीतिक जरूरत है तो उस वक्त आरएसएस में बाकायदा निर्देश जारी हुआ कि कोई हिंदू शब्द नहीं बोले। 

संघ परिवार के भीतर हर तबके को साथ जोड़ने की कुलबुलाहट कैसे तेज हुई और कैसे समझौते भी किए गए, यह बुद्ध को लेकर संघ की अपनी समझ के बदलने से भी समझा जा सकता है। एक वक्त आरएसएस ने बुद्ध को विष्णु का अवतार कहा। लेकिन आपत्ति होने पर बुद्ध घर्म को अलग से मान्यता भी दी। लेकिन जैसे ही हिंदू शब्द पर सियासत मुश्किल हुई, वैसे ही राष्ट्रीय तत्त्व की लकीर आरएसएस ने खींचनी शुरू की। असर इसी का है कि संघ के हर संगठन के साथ राष्ट्रीय शब्द जुड़ा। खुद हेडगेवार ने भी हिंदु स्वयसेवक संघ नहीं बनाया बल्कि राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ नाम दिया और हिंदू शब्द को सावरकर के हिंदू महासभा से जोड़कर यह बहस कराई कि सावरकर के हिंदू शब्द में मुसलिम या ईसाई के लिए जगह नहीं है। लेकिन आरएसएस के हिंदू शब्द में राष्ट्रीयता का भाव है और इसमें हर धर्म-संप्रदाय के  लिए जगह है। 

मोदी ने क्योतो के जरिए इस रास्ते को पकड़ा है लेकिन यह रास्ता सियासी तौर पर कैसे दलित राजनीति करने वालों का डिब्बा गोल करेगा और भाजपा को कितना विस्तार देगा, इसका इंतजार करना होगा। 

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