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सरकार का दामन PDF Print E-mail
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Friday, 29 August 2014 11:52

जनसत्ता 29 अगस्त, 2014 : सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर सरकार को दागी नेताओं से मुक्त करने की नसीहत दी है। उसने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ दिया है कि वे किस तरह अपने मंत्रिमंडल से आरोपी नेताओं को अलग करें। करीब साल भर पहले अदालत ने जन-प्रतिनिधित्व कानून की व्याख्या करते हुए व्यवस्था दी थी कि जिन नेताओं को किसी अदालत से दो साल या इससे अधिक की सजा सुनाई जा चुकी हो, उन्हें अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। दरअसल जन-प्रतिनिधित्व कानून में राजनेताओं को यह छूट मिली हुई है कि अगर उन्होंने किसी फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर कर रखी है तो वे अंतिम फैसला आने तक अपने पद पर बने रह सकते हैं। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उस कानूनी प्रावधान को संविधान के समानता के अधिकार और जन-प्रतिनिधित्व कानून की मूल भावना के विरुद्ध करार दिया था। इस पर लगभग सभी दलों ने एतराज जताया था। विचित्र है कि अदालत के फैसले पर राजनीतिक शुचिता की दिशा में कदम बढ़ाने के प्रयास किए जाने के बजाय पक्ष और विपक्ष दोनों ने चुप्पी साधे रखी। नरेंद्र मोदी ने केंद्र की कमान संभाली तो दावा किया था कि उनकी सरकार में दागी नेताओं के लिए कोई जगह नहीं होगी। मगर हुआ इसके उलट। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद कांग्रेस को उन पर हमले का मौका हाथ लग गया है। मोदी सरकार में शामिल सत्ताईस प्रतिशत मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनमें से आठ मंत्रियों के विरुद्ध गंभीर आरोप हैं। अब भाजपा यह कह कर अपना बचाव करना चाहती है कि मोदी सरकार में शामिल मंत्रियों पर मुकदमे अयोध्या आंदोलन से जुड़े हैं और फिर अदालत ने सिर्फ सुझाव दिए हैं, आदेश नहीं। मगर अदालतों के सुझाव भी फैसले से कम नहीं होते।  हालांकि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को फैसला देने से गुरेज नहीं करना चाहिए था। 

यह तर्क भी सही नहीं है कि मोदी सरकार के जिन मंत्रियों के खिलाफ आरोप हैं वे सभी अयोध्या आंदोलन से जुड़े थे। फिर सांप्रदायिक उन्माद फैलाने, लोगों को फसाद के लिए उकसाने और कानून का सहारा लेने के बजाय अपने


तरीके से किसी विवादित स्थल को ध्वस्त कर देने के अपराध को आंदोलन का नाम देकर किसी का बचाव कैसे किया जा सकता है! इससे तो यही जाहिर होता है कि भाजपा को कानून पर भरोसा नहीं है। जिन मंत्रियों के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं, उन पर फैसला वह खुद कैसे सुना सकती है! नितिन गडकरी पर अनियमितता के गंभीर आरोप हैं, जिनके चलते उन्हें दुबारा भाजपा अध्यक्ष बनाने के फैसले पर पार्टी के भीतर ही विद्रोह के स्वर फूट पड़े और उन्हें पीछे हटना पड़ा था। मगर उन्हें मंत्री बनाते समय यह बात दरकिनार कर दी गई। इसी तरह कई मंत्रियों पर रिश्वतखोरी, धमकाने, लोकसेवक को अपनी जिम्मेदारी निभाने से रोकने जैसे गंभीर आरोप हैं। ये बातें छिपी नहीं हैं। खुद इन मंत्रियों ने चुनाव लड़ते समय अपने हलफनामे में ये बातें स्वीकार की थीं। फिर भी उन्हें सरकार में जिम्मेदारियां सौंपने से परहेज नहीं किया गया तो इसे क्या कहें! अब सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री और सभी मुख्यमंत्रियों का ध्यान दागी मंत्रियों की तरफ आकर्षित किया है तो संवैधानिक तकाजा है कि वे इस सुझाव पर गंभीरता दिखाएं। नरेंद्र मोदी ने सरकार की कमान संभालने के बाद कहा था कि वे जल्दी ही दागियों की पहचान कर लेंगे। मगर जो मामले अदालतों में लंबित हैं, उन पर फैसला आने में वक्त लगेगा। अगर वे सचमुच बेदाग सरकार के पक्षधर हैं तो उन्हें दागी मंत्रियों के बारे में फिर से विचार करना चाहिए। 


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