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धर्मांतरण के बहाने PDF Print E-mail
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Friday, 29 August 2014 11:52

जनसत्ता 29 अगस्त, 2014 : उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ से तीस किलोमीटर दूर असरोई नामक जगह पर एक गिरजाघर को शिव मंदिर में बदल देने और छह दर्जन लोगों को ईसाई से हिंदू धर्म में वापस लाने की घटना कई सवाल छोड़ गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे हिंदू संगठनों ने इसे धर्मांतरण के बजाय ‘घर वापसी’ कहा है। लेकिन देश में धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए जैसी आक्रामक कवायदें चल रही हैं, उसमें इसके निहितार्थ समझना मुश्किल नहीं है। गौरतलब है कि असरोई में जहां धर्मांतरण की ताजा घटना हुई है, उसमें शामिल सभी बहत्तर लोग हिंदू समाज के दलित तबके और वाल्मीकि जाति से थे और उन सबने लगभग दो दशक पहले ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था। हालांकि हिंदू धर्म से किसी और मजहब को स्वीकार करने की यह कोई अकेली घटना नहीं है और ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं। दिलीप सिंह जूदेव ने छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके आदिवासियों को फिर से हिंदू बनाने के लिए बाकायदा अभियान चलाया था, जिसे ‘घर वापसी’ का नाम दिया गया था।

भारत में धर्मांतरण की घटनाओं में दूसरे धर्म को ग्रहण करने वाले ज्यादातर लोग हिंदू समाज की दलित-वंचित जातियों के या फिर आदिवासी रहे हैं। हिंदू समाज में निचले पायदान पर रखी गई जातियों की सामाजिक हैसियत और अपेक्षया उच्च कही जाने वाली जातियों का उनके साथ व्यवहार किसी से छिपा नहीं है। शोषण और दमन या बहिष्कार पर आधारित सामाजिक बर्ताव उनकी गरीबी, अशिक्षा और अभाव से भरी जिंदगी को और ज्यादा दुखद बनाता रहा है। ऐसे में अगर किसी दूसरे मत या धर्म के प्रचारकों की ओर से उन्हें यह उम्मीद दिलाई जाती है या उन्हें खुद भी लगता है कि कोई खास मजहब स्वीकार करने से इस सामाजिक त्रासदी से मुक्ति और बेहतर, सम्मानजनक जीवन-स्तर मिल सकता है, तो दमित वर्गों का उनकी ओर आकर्षित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पूर्वोत्तर भारत या दूसरी कई जगहों पर ईसाई धर्म के प्रचारकों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी काम से हिंदू समाज के हाशिये की जातियों को प्रभावित किया।


इसके अलावा, सामाजिक अपमान जैसी स्थितियों से त्रस्त कमजोर तबकों के हिंदुओं ने भी बौद्ध या ईसाई धर्म की ओर रुख किया। 

संविधान भी सभी लोगों को अपने विवेक से अपनी पसंद के मजहब को मानने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन हिंदुत्व की राजनीति करने वालों ने इसे जबरन धर्मांतरण के रूप में प्रचारित किया। इस क्रम में छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा और गुजरात में आदिवासियों के धर्मांतरण के मसले पर सामाजिक टकराव भी सामने आए। विडंबना है कि हिंदुत्व के लिए फिक्रमंद रहने वाले इसे मुद्दा तो बनाते हैं, लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं। ‘शुद्धिकरण’ की प्रक्रिया के बाद ‘घर वापसी’ कर जो दलित या आदिवासी हिंदू धर्म ग्रहण करते हैं, उनकी सामाजिक हैसियत और उससे जुड़ी त्रासदियों पर विचार करना भी उन्हें जरूरी नहीं लगता। बीते लोकसभा चुनावों के दौरान जिस तरह देश के कुछ हिस्सों में धार्मिक भावनाएं भड़का कर या दंगे की जमीन तैयार कर अपने पक्ष में मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश की गई, वह बेहद चिंताजनक है। उपचुनाव वाले इलाकों में भी वैसे ही प्रयास जारी हैं। अगर यह प्रवृत्ति भारतीय राजनीति के एक स्थायी चरित्र में तब्दील होने की ओर बढ़ी तो इससे नफा-नुकसान चाहे जिन राजनीतिक दलों को हो, देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बहुत नुकसान पहुंचेगा। 


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