मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
कोलाबा PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Friday, 29 August 2014 11:46

प्रयाग शुक्ल

जनसत्ता 29 अगस्त, 2014 : मेरे झोले की एक चेन खराब हो गई है। चेन या जिप, जो भी कहिए, उसके बाहरी हिस्से में जो पॉकेट है, उसकी है। कई बार यह भूल कर कि वह खराब है, उसमें कोई चीज रख देता हूं। वह गिर जाती है। सोच रहा हूं उसे ठीक करा लूं तो अच्छा रहेगा। यों कह इसे झोला रहा हूं, पर यह झोला चौकोर बैग की शक्ल में है, जिन्हें ‘ऑफिस बैग’ भी कहा जाता है। यह जूट का है। कभी एक सांस्कृतिक संस्था के कार्यक्रम में मिला था भेंट में। इस बार यात्रा में इसे ही साथ रख लिया। दो-एक किताबें और लिखने-पढ़ने के सामान के साथ दो-चार छोटी-मोटी चीजें रख लेने पर भारी नहीं लगता। सोचिए तो हर चीज का अपना एक संसार होता है। वह चीज किसने बनाई, कब इस्तेमाल में आई, लोगों ने उस पर क्या प्रतिक्रिया दी आदि से लेकर वह कहां-कहां घूमी-फिरी है, कहां और कब गुम गई जैसे उसके न जाने कितने किस्से होते हैं।

बहरहाल, अभी तो मसला इसकी चेन का है। मैं मुंबई के कोलाबा वाले इलाके के फुटपाथ पर चल रहा हूं, जहां दिन के पौने ग्यारह के करीब फुटपाथी दुकानें अभी सजनी शुरू ही हुई हैं। उनके सामान को झाड़ा-पोंछा जा रहा है। पैंट में बांधने वाले बेल्ट से लेकर, स्टेशनरी और बैग आदि बेचने वाली दुकानें हैं। उन्हें स्टॉल भी कह सकते हैं। इन फुटपाथों पर पहले भी कई बार चला हूं- मुंबई या यात्राओं में, कला-दीर्घाओं में जाने के लिए। इस बार भी गंतव्य वही है। पर अभी तलाश रहा हूं एक ऐसा ठिकाना, जहां इस बैग की चेन का पुनरुद्धार हो सके। एक बैग की दुकान के एक सज्जन सलाह देते हैं कि इसे मोची ठीक कर देगा। मोची का ठिकाना भी वे बता देते हैं। जहां जाकर खड़ा होता हूं, वह फुटपाथी दुकान है, पर उस छोटी-सी दुकान का अपना ढांचा है। छत है। शटर है। उसमें जूतों से लेकर अन्य चीजों को ठीक करने वाले कई औजार फैले हुए हैं। उसके मालिक हैं माधो। वे बताते हैं, दुकान 1972 से उनके पास है। तब महानगर पालिका पांच रुपए महीना लेती थी, अब किराया दो सौ रुपए है। कोई साठ वर्ष के होंगे। मराठी भाषी हैं। गठा हुआ शरीर है। सिर के बाल सफेद हैं। उनकी सलाह है कि मैं क्लिप बदलवा लूं, जिप ठीक है। मैं प्रसन्न होकर कहता हूं- जैसे भी हो इसे ठीक कर दें। कोई मोल-भाव नहीं करता कि सौ-दो सौ तो वे मांग नहीं लेंगे।

मैं उन्हें काम करते हुए देख रहा हूं। वे जिप को एक किनारे से खोल देते हैं, धागों को उधेड़ कर एक औजार से। उस औजार का नाम उनसे पूछता हूं। वे कहते हैं कि मराठी में हम इसे ‘रैपी’ कहते हैं। जिप को खोलने-बंद करने वाली क्लिप जैसी चीज


को वे एक तरफ रख देते हैं। फिर एक गोल डिब्बे के ढक्कन को खोल कर उसे उलट देते हैं, तो उससे बीसियों क्लिपें झर पड़ती हैं। उनमें से मेरे झोले की जिप में फिट होने वाली क्लिप वे मुझे दिखाते हैं और कहते हैं- ‘यह नई लगा रहा हूं।’ उसके फिट हो जाने पर वे जिप को कई बार खींचते-बंद करते हैं। मेरी ओर देख कर मुस्कराते हैं। मानो कह रहे हों- ‘ठीक हो गई न!’ मैं प्रसन्न होता हूं। उनका मेहनताना अदा करके उनसे विदा लेता हूं।

देखता हूं कि धीरे-धीरे सड़कों-फुटपाथों पर लोगों और वाहनों की भीड़ बढ़ रही है। ‘साझे’ वाली टैक्सियों से लोग चढ़-उतर रहे हैं। अपने को संभालते हुए सभी अपने-अपने लिए जगह बनाते हुए एक-दूसरे के पास से गुजर रहे हैं। ठहरते, ठिठकते, थमते, चलते हुए लोगों का हुजूम आमतौर पर हमारा ध्यान नहीं बंटाता, खासतौर पर तब जब हम भी उसका हिस्सा हों। पर अगर थोड़ी देर के लिए दूर खड़े रह कर देखें तो गतिविधियां, नाटकीय, विचित्र और कुछ विस्मय पैदा करने वाली हो सकती हैं। खासतौर पर तब जब किसी इलाके में चलने या गति पकड़ने का दबाव बढ़ रहा हो। कोलाबा और विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन का इलाका ऐसा ही है। यह पुराना है। ब्रिटिशकालीन इमारतों का है।

दोपहर बाद इसी इलाके में ‘द गिल्ड’ गैलरी में सुपरिचित चित्रकार सुधीर पटवर्धन से मिलने पहुंचा। मिलने की बात पहले से तय है। संयोग से कागज पर बड़े आकार में एक्रिलिक रंगों से बनाए गए उनके तीन रेखांकन देखने को मिलते हैं। स्याह-सफेद में। उनमें रास्ता पार करते लोग हैं। एक में एक ओर चाय पीते एक स्टॉल पर बैठे कुछ लोग हैं, शेष उनके पास से गुजर रहे हैं। एक में चार हिस्सों में विक्टोरिया टर्मिनल के दृश्य हैं। चौंक कर पहचानता हूं कि कितने सुंदर तरीके से उन्होंने हर व्यक्ति के अपने स्पेस को भीड़ में अपने लिए रास्ता बनाते और दूसरे को रास्ता देते ‘भाव’ को रेखांकित किया है। भीड़ में हम अपने में डूबे होकर भी किस प्रकार दूसरों से जुड़ते हैं, इसी के वे रेखांकन हैं।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta  


आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?