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मार्ग और मार्गदर्शक PDF Print E-mail
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Thursday, 28 August 2014 11:13

जनसत्ता 28 अगस्त, 2014 : भाजपा संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन पर स्वाभाविक ही चर्चा शुरू हो गई है। जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को संसदीय बोर्ड में न शामिल कर मार्गदर्शक मंडल में रखा गया है, उससे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। भाजपा का कहना है कि वह बुजुर्ग नेताओं के बजाय युवा नेतृत्व को जिम्मेदारी सौंपने की नीति पर चल रही है। मगर इतना होता तो शायद किसी को आलोचना का मौका नहीं मिलता। अमित शाह ने भाजपा की बागडोर संभाली, तभी तय हो गया था कि पार्टी के फैसले नरेंद्र मोदी से अलग नहीं होंगे। अटल बिहारी वाजपेयी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी नहीं कर पाते, मगर यही बात लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के मामले में सही नहीं है। उनकी उम्र जरूर अधिक हो चली है, पर पार्टी में उनकी सक्रियता लगातार बनी रही है। दोनों पार्टी के गठन के दिन से ही महत्त्वपूर्ण फैसलों में साझीदार रहे हैं। इस बार भी वे लोकसभा चुनाव जीत कर आए हैं। इसलिए उन्हें संसदीय बोर्ड से बाहर रखना चौंकाता है। 

यह कयास अकारण नहीं है कि आडवाणी और जोशी को नरेंद्र मोदी के विरोध का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो लालकृष्ण आडवाणी ने खुल कर विरोध किया था। यहां तक कि उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। इसी तरह मुरली मनोहर जोशी ने नरेंद्र मोदी के लिए अपनी बनारस की लोकसभा सीट छोड़ने से मना कर दिया था। इसकी खुन्नस नरेंद्र मोदी को होगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार बनने के बाद इसके संकेत भी मिलने लगे थे। जोशी को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई तो आडवाणी को लोकसभा अध्यक्ष पद से वंचित रखा गया। पार्टी में वरिष्ठ नेता होने के बावजूद उन्हें संसद में प्रधानमंत्री के पास वाली कुर्सी नहीं दी गई। यह सब उन्हें सम्मान देने का सूचक नहीं कहा जा सकता। अगर पार्टी सचमुच सत्तर पार


के लोगों को सरकार या फिर पार्टी की जिम्मेदारियां सौंपने से परहेज करने की नीति पर चल रही होती तो बयासी वर्ष के कल्याण सिंह को राज्यपाल बनाने से भी गुरेज करती। 

अब यह छिपी बात नहीं है कि नरेंद्र मोदी अपनी परिधि में ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं रखना चाहते, जो उनका विरोधी रहा हो या विरोध कर सकता हो। यह अलग बात है कि संघ भी आडवाणी के विद्रोही तेवर से नाराज चल रहा था और वह उन्हें किनारे करने का कोई उपाय तलाश रहा था। सो, अमित शाह ने इसके लिए सही मौका तलाश लिया। नहीं तो और कोई वजह नहीं हो सकती कि लगातार अस्वस्थ रहने और सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी को राजग का अध्यक्ष बनाए रखा गया और आडवाणी-जोशी को मार्गदर्शक मंडल में भेज कर नीति निर्धारण संबंधी अधिकारों से दूर कर दिया गया। मार्गदर्शक मंडल जैसी कोई व्यवस्था भाजपा के संविधान में नहीं है, इसलिए उनसे कितना मार्गदर्शन लिया जाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। ये दोनों नेता कई मौकों पर भाजपा के अंदरूनी कामकाज में संघ के हस्तक्षेप का प्रतिकार करते आए हैं। अब उन्हें दूर करके भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह उसी तरह संचालित होगी, जिस तरह संघ चाहेगा। विरोध की गुंजाइश नहीं होगी। मगर इस तरह भाजपा का आंतरिक लोकतंत्र कितना सुरक्षित रह पाएगा!


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