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खाद्यान्न सुरक्षा और वैश्विक विसंगतियां PDF Print E-mail
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Thursday, 28 August 2014 11:11

धर्मेंद्रपाल सिंह

 जनसत्ता 28 अगस्त, 2014 : अपने खाद्य सुरक्षा अधिकार की रक्षा के लिए भारत के कड़े रुख के कारण विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के आका अमीर देश भले नाराज हों,

लेकिन अब हमारे समर्थन में कुछ देश और संगठन खुल कर सामने आए हैं। पहले पड़ोसी चीन ने समर्थन दिया और अब संयुक्त राष्ट्र के इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (आइएफएडी) के अध्यक्ष ने भारत के पक्ष में पैरवी की है। आइएफएडी अध्यक्ष के अनुसार किसी भी राष्ट्र के लिए अन्य देशों में रोजगार के अवसर सृजित करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम अपनी जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है। भारत भी यही चाहता है। जिनेवा में जब डब्ल्यूटीओ वार्ता फिर शुरू होगी तब निश्चय ही चीन और आइएफएडी के समर्थन से भारत को अपना पक्ष मनवाने में मदद मिलेगी। 


भारत के लिए खाद्य सुरक्षा कानून कितना जरूरी है, यह जानने के लिए विश्व भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) पर दृष्टि डालना जरूरी है। इसके अनुसार भूख के मोर्चे पर जिन उन्नीस देशों की स्थिति अब भी चिंताजनक है उनमें भारत एक है। रिपोर्ट में कुपोषण की शिकार आबादी, पांच साल से कम आयु के औसत वजन से कम बच्चों की संख्या और बाल मृत्यु दर (पांच साल से कम आयु) के आधार पर दुनिया के एक सौ बीस देशों का ‘हंगर इंडेक्स’ तैयार किया गया और जो देश बीस से 29.9 अंक के बीच में आए उनकी स्थिति चिंताजनक मानी गई है। भारत 21.3 अंक के साथ पड़ोसी पाकिस्तान (19.3), बांग्लादेश (19.4) और चीन (5.5) से भी पीछे है। शिक्षा के अभाव, बढ़ती सामाजिक-आर्थिक खाई और महिलाओं की बदतर स्थिति के कारण भारत में विशाल कंगाल (गरीबी रेखा से नीचे) आबादी है। 

इसीलिए भारत ने डब्ल्यूटीओ की जिनेवा बैठक में कड़ा रुख अपनाया, जिससे अमेरिका, यूरोपीय देश और आस्ट्रेलिया बिलबिलाए हुए हैं। भारत ने बैठक में साफ कर दिया कि जब तक उसे अपनी गरीब जनता की खाद्य सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी तब तक वह व्यापार संवर्धन समझौते (टीएफए) को लागू नहीं होने देगा। मनमोहन सिंह सरकार ने पिछले साल संसद में खाद्य सुरक्षा कानून पारित किया था, जो देश की लगभग अस्सी करोड़ आबादी को सस्ता अनाज मुहैया करने की गारंटी देता है। 

इस कानून के अंतर्गत जरूरतमंद लोगों को तीन रुपए किलो की दर पर चावल, दो रुपए किलो गेहंू और एक रुपया किलो के हिसाब से मोटे अनाज (बाजरा, ज्वार आदि ) प्रदान करना सरकार की जिम्मेदारी है। नया कानून लागू हो जाने पर सरकार को करोड़ों रुपए की सबसिडी देनी पड़ रही है। इस साल के बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के लिए एक सौ पचास लाख करोड़ रुपए का प्रावधान रखा है। 

डब्ल्यूटीओ के कृषि करार (एओए) के अनुसार किसी भी देश का सबसिडी बिल उसकी कुल कृषि पैदावार का दस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। पिछले साल बाली (इंडोनेशिया) की डब्ल्यूटीओ बैठक में भारत ने जब इस दस फीसद पाबंदी का प्रबल विरोध किया तो उसे चार साल तक की छूट दे दी गई। छूट के बदले अमीर देशों ने इस वर्ष 31 जुलाई से टीएफए लागू करने की शर्त रखी थी। टीएफए पर अमल का सबसे ज्यादा लाभ अमीर देशों को होगा, इसलिए वे इसे जल्दी से जल्दी लागू कराना चाहते हैं। भारत की मांग है कि टीएफए लागू करने से पहले कृषि सबसिडी विवाद का स्थायी हल खोजा जाना चाहिए। उसे डर है कि टीएफए लागू हो जाने से उसके हाथ बंध जाएंगे। चार साल की छूट खत्म हो जाने के बाद अमीर देश दस फीसद खाद्य सबसिडी की शर्त उस पर थोप देंगे। 

दुनिया में आज दो तरह की खाद्यान्न सबसिडी चालू है। पहली सबसिडी किसानों को दी जाती है। यह सरकार द्वारा सस्ता उर्वरक और बिजली-पानी मुहैया कराने और न्यूनतम फसल खरीद मूल्य तय करने के रूप में दी जाती है। दूसरी सबसिडी उपभोक्ताओं को मिलती है। 

राशन की दुकानों से मिलने वाला सस्ता गेहूं-चावल इस श्रेणी में आता है। भारत में दोनों तरह की सबसिडी दी जा रही है और उसका सबसिडी बिल कुल खाद्यान्न उपज के दस प्रतिशत से अधिक है। डब्ल्यूटीओ समझौते के अनुसार अगर कोई देश करार का उल्लंघन करता है तो उसे अपना खाद्यान्न भंडार अंतरराष्ट्रीय निगरानी में लाना पड़ेगा। प्रतिबंधों की मार झेलनी पड़ेगी, सो अलग। भारत ऐसे इकतरफा नियमों का विरोध कर रहा है। 

डब्ल्यूटीओ का कोई भी समझौता सदस्य देशों की सर्वानुमति से लागू हो सकता है। विकसित देश भारत पर आरोप लगा रहे हैं कि विश्व व्यापार के सरलीकरण के लिए जरूरी टीएफए की राह में वह रोड़े अटका रहा है। भारत के नकारात्मक रवैए के कारण उनके निर्यात को भारी नुकसान पहुंचेगा। उनका मानना है कि टीएफए लागू हो जाने से विश्व व्यापार में दस खरब डॉलर की वृद्धि होगी और 2.1 करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा। 

सच यह है कि अमेरिका और यूरोपीय देश अभी तक मंदी की मार से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। अपना माल बेचने के लिए उन्हें भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे विकासशील देशों के विशाल बाजार की दरकार है। टीएफए लागू हो जाने से करों की दरें कम होंगी और खर्चे घटेंगे। इससे दुनिया की मंडियों में उनका माल कम कीमत पर मिलेगा। 

भारत और उसके समर्थक विकासशील देशों का मत है कि बड़े देशों को रास आने वाले टीएफए पर अमल से पहले उन्हें अपनी जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। हिंदुस्तान पर बाली में बनी सहमति से पलट जाने का आरोप लगाने वाले अमीर देश यह भूल जाते


हैं कि अपना हित साधने के लिए उन्होंने 2005-2006, 2008-2009 और 2013 में कैसे-कैसे अड़ंगे लगाए थे। विश्व बिरादरी की भावनाओं की उपेक्षा कर अमेरिका आज भी अपने किसानों को हर साल बीस अरब डॉलर (बारह खरब रुपए) की सबसिडी देता है और इसी के बूते खाद्यान्न निर्यात कर पाता है। 

आंकड़े गवाह हैं कि देश की 17.5 फीसद आबादी कुपोषण की शिकार है और चालीस प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। बाल मृत्यु दर भी 6.1 फीसद है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार अगर कोई सरकार ‘इंक्लूसिव ग्रोथ’ मॉडल को ईमानदारी से अपनाए तो विकास दर में जितने फीसद वृद्धि होगी उसकी आधी दर से कुपोषण में कमी आएगी। उदाहरण के लिए, अगर विकास दर में चार प्रतिशत के हिसाब से बढ़ोतरी होती है तो कुपोषण दो प्रतिशत के हिसाब से कम होना चाहिए। हमारे देश में 1990-2005 के बीच औसत विकास दर 4.2 प्रतिशत रही, लेकिन इस दौरान कुपोषण में कमी आई महज 0.65 फीसद। इसका अर्थ यही है कि खुली अर्थव्यवस्था अपनाने का लाभ गरीब और कमजोर वर्ग को न के बराबर मिला है।

आज जहां एक ओर करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं है, वहीं दूसरी तरफ बेवजह खाकर मोटे हो रहे लोगों का बढ़ता आंकड़ा देश और दुनिया में गरीबों-अमीरों के बीच चौड़ी होती खाई को उजागर करता है। फिलहाल पूरी दुनिया में कुपोषण के शिकार अस्सी करोड़ लोग हैं, जबकि मोटापे की शिकार आबादी एक अरब है। भारत में भी संपन्न तबके में वजन बढ़ने का चलन एक महामारी बन चुका है। 

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया में खाद्यान्न की भरपूर पैदावार होने से पिछले साल गेहूं के मूल्य में सोलह प्रतिशत, चावल में तेईस प्रतिशत और मक्का में पैंतीस प्रतिशत कमी आई थी। तब मानसून की मेहरबानी से भारत में भी खाद्यान्न की पैदावार बढ़ी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब देश और दुनिया में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है फिर कुपोषण की शिकार आबादी कम क्यों नहीं हो रही? 

हाल ही में आई पुस्तक ‘फीडिंग इंडिया: लाइवलीहुड, एंटाइटेलमेंट ऐंड कैपैबिलिट’ में इसका उत्तर खोजा जा सकता है। पुस्तक के लेखकों के अनुसार समस्या पैदावार की नहीं, बल्कि पैदावार जरूरतमंदों तक पहुंचाने से जुड़ी है।

खाद्य सुरक्षा विधेयक के पैमाने पर इसे कस कर देखने से भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। न्यूनतम खरीद मूल्य के तहत सरकार को गेहूं की कीमत औसत चौदह रुपए प्रति किलो पड़ती है। इसमें परिवहन, मंडी कर, भंडारण, अनाज बोरों में भरने, कमीशन, प्रशासनिक खर्च और ब्याज को जोड़ दिया जाए तो लागत लगभग दोगुना हो जाती है। सरकार के अनुसार भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के कारण राशन का तीस से चालीस प्रतिशत अनाज जनता तक पहुंच ही नहीं पाता है। अगर इस चोरी को भी जोड़ दिया जाए तो लागत आंकड़ा और ऊपर हो जाएगा। 

घोर गरीबी के कारण देश की लगभग एक चौथाई जनता बीमारी, बेरोजगारी और अकाल का मामूली-सा झटका झेलने की स्थिति में भी नहीं है। समस्त सरकारी दावों के बावजूद करोड़ों गरीबोें को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा नहीं जा सका है। 

दूसरी तरफ देश में अरबपतियों की संख्या में लगातार हुआ इजाफा हमारे नीति निर्माताओं की पोल खोलता है। ग्लोबल वैल्थ रिपोर्ट के अनुसार भारत में अभी छियासठ हजार अरबपति हैं और 2018 आते-आते उनकी संख्या बढ़ कर 3.02 लाख हो जाएगी। देश में अरबपतियों की संख्या में इजाफे की रफ्तार छियासठ प्रतिशत है, जो अमेरिका (41 प्रतिशत), फ्रांस (46 प्रतिशत), जर्मनी (46 प्रतिशत), ब्रिटेन (55 प्रतिशत) और आस्ट्रेलिया (48 प्रतिशत) से भी अधिक है। 

डब्ल्यूटीओ को लगता है कि भारत के खाद्य सुरक्षा कानून से दुनिया के अनाज बाजार में अस्थिरता आएगी और अंतत: खाद्यान्न की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव होगा। सवा अरब की आबादी का पेट भरने के लिए भारत को भारी मात्रा में गेहंू-चावल और अन्य खाद्यान्न की आवश्यकता है। फिलहाल खाद्यान्न के मोर्चे पर देश आत्मनिर्भर है, लेकिन भविष्य में सूखे या बाढ़ से अगर पैदावार घट गई तो भारत को भारी मात्रा में गेहूं-चावल आयात करना पड़ेगा। निश्चय ही तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें आसमान छूने लगेंगी। लेकिन इस लचर तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता। किसी भी देश की सरकार की पहली जिम्मेदारी अपनी जनता के प्रति होती है और जनता के भोजन का इंतजाम करना उसका उत्तरदायित्व है। इस उत्तरदायित्व पर सवाल उठाने का अधिकार किसी देश या अंतरराष्ट्रीय संगठन को नहीं दिया जा सकता। 

भारत का मानना है कि डब्ल्यूटीओ के अधिकतर नियम खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार विकसित देशों के हित में हैं। अपने बाजार को विस्तार देने के लिए वे दुनिया के गरीब मुल्कों को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं। लेकिन कोई भी विकासशील या गरीब देश अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। भारत ने बलि का बकरा बनने से इनकार कर बहुत अच्छा काम किया है। 


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