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स्क्रीन से बाहर PDF Print E-mail
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Thursday, 28 August 2014 11:05

संज्ञा उपाध्याय

जनसत्ता 28 अगस्त, 2014 : उसका पूरा ध्यान मोबाइल में था। आसपास से एकदम बेखबर। आंखें भावहीन, पथराई-सी। मोबाइल की पूरी स्क्रीन पर नजर फिराने भर की नामालूम-सी हरकत पुतलियों की न होती, तो यह एक निर्जीव, निर्विकार चेहरा था। मैं उससे बात करने को बेचैन थी। छह साल की बच्ची का चेहरा क्या ऐसा होना चाहिए? उसका ध्यान मोबाइल स्क्रीन से बाहर खींचने के मैं दो-तीन विफल प्रयास कर चुकी थी। न मेरे शब्द उसे छू रहे थे और न उसकी छोटी-सी चोटी को शरारत से लपेटती-घुमाती मेरी अंगुलियां उसे खिझा रही थीं। वह सब अहसासों से दूर थी। मोबाइल रख देने का अपनी मां का आदेश उसने अनसुना नहीं किया था। वह सुन ही कहां रही थी कुछ! मां ने मोबाइल छीनने का प्रयास किया, तो उसने उसे दृढ़ता से पकड़े रखा। कोहनियों और बाजुओं से मां के आगे बढ़ते हाथों को धकियाया। इस सबके बीच उसकी अंगुलियां बिना रुके मोबाइल के बटनों पर नाचती रहीं, नजर और ध्यान स्क्रीन से हट कर जरा भी न भटके।

उसकी मां, मेरी दोस्त, झल्ला कर रसोई में चाय बनाने चली गई। मैं पत्रिकाएं उलट-पलट सकती थी या अपनी दोस्त के पास रसोई में जाकर गपिया सकती थी। पर मुझे तो उससे बतियाना था! कमरे में सन्नाटा पसरा था। मैंने उसके पास बैठ मोबाइल की स्क्रीन में झांका। एक लड़का तेज गति से दौड़ता सीढ़ियों पर चढ़ा जा रहा था। दाएं-बाएं कोई फल, टॉफी, केक प्रकट होता। ‘यह क्या कर रहा है?’ मैंने पूछा। मेरी आवाज में जिज्ञासा का भाव शायद उसे सच्चा लगा। उसने स्क्रीन से नजर हटाए बिना कहा- ‘ये सब इसे खिलाना होता है।’ मैंंने कहा- ‘इतना सब खा लेता है यह?’ मेरे मजाक पर उसे हंसी नहीं आई, लेकिन मेरी कमअक्ली पर तरस जरूर आया। उसके होंठों के कोने पर जो खिंचाव पैदा हुआ, उससे मैं जान गई और कहा- ‘यों ऐसा ही खेल मैं अपने घर की सीढ़ियों पर रोज खेलती हूं। बड़ा मजा आता है! तुम्हारे घर में सीढ़ियां हैं?’

वह शायद थक गई थी या बोर हो गई थी। उसने गहरी सांस छोड़ कर मोबाइल रख दिया। यह सांस उस खेल में दौड़ते लड़के की तेजरफ्तारी के कारण शायद अब तक कहीं अटकी थी। इत्मीनान की सांस लेते हुए उसने मेरी तरफ देखा- ‘हां, हैं।’ उसने कमरे से बाहर की ओर इशारा किया, जहां सीढ़ियां थीं। ‘खेलें?’ मेरे उत्साह भरे स्वर पर उसने मुझे संदेह से देखा।

वह अपने संदेह और असमंजस के साथ मुझे लेकर सीढ़ियों तक आई और थोड़ी देर में ही हम सीढ़ियों पर भागती चढ़-उतर रही थीं। दाएं-बाएं कूदने, दो सीढ़ियां फलांगने, एक पैर से कूद कर


सीढ़ी चढ़ने और यह सब करने से चूक जाने पर सजा मिलने के नियम वह झटपट बना रही थी। मेरे हारने पर तालियां बजाती हंसती। मेरे जीतने पर खीझ कर नए नियम गढ़ खेल मेरे लिए मुश्किल बनाती। लगातार हंसने, चिल्लाने, बोलने, दौड़ने, चढ़ने-उतरने के कारण हम पसीने से तर थे। मैं थक रही थी, पर उसका उत्साह बढ़ता जा रहा था। आखिर हम हंसी से दोहरे होते, अपनी सांसें संभालते सीढ़ियों पर ही बैठ गए। हम बोल नहीं पा रहे थे। बस एक-दूसरे की ओर देखते और हंस पड़ते।

मेरी दोस्त पानी, मेरी चाय और उसके लिए हॉर्लिक्स बिस्कुटों की प्लेट के साथ सीढ़ियों पर ही यह कहते हुए रख गई- ‘दोनों पागल हो!’ हमने एक-दूसरे को देखा और फिर हंस पड़ीं। अब हम एक सीढ़ी पर थीं। बराबर सट कर बैठीं। वह मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने दोस्तों से मिला रही थी। अपने स्कूल की सैर करा रही थी। अपने राज मुझसे साझा कर रही थी। मेरे पसंदीदा कार्टून के बारे में पूछ रही थी। होमवर्क न करने की मेरी बचपन की आदत पर हैरान हो रही थी। मुझे मिली सजाओं पर दुखी हो रही थी। ‘टुथ फेयरी’ को बड़ों का झूठ बता कर वह मुझे एक कहानी सुना रही थी, जिसकी नायिका वह खुद थी। कहानी के दुख, सुख, खुशी, भय, आश्चर्य- सब उसकी आंखों, उसके चेहरे के भावों और आवाज के उतार-चढ़ावों में समाए थे। बीच-बीच में कुछ क्षण रुक कर वह मेरा चेहरा पढ़ सुनिश्चित करती कि उसकी बात मुझ तक ठीक से पहुंच रही है या नहीं। मेरे चेहरे पर घटना के अनुकूल भाव पा संतुष्ट होती और कहानी आगे बढ़ाती।

तत्काल गढ़ी जाती, मगर पूरे मन से लिखी जाती उसकी कहानी उसकी आंखों में तैर रही थी। चेहरे का हर रग-रेशा जिंदा था। उसकी आवाज का जादू चारों ओर फैला था। आसपास पूरी दुनिया धड़क रही थी।


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