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न्याय में आरक्षण PDF Print E-mail
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Wednesday, 27 August 2014 12:10

जनसत्ता 27 अगस्त, 2014 : न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक का स्वागत करते हुए मायावती ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में अनुसूचित जाति और अन्य वंचित वर्गों के हितों का खयाल रखना चाहिए। उन्होंने इन नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान लागू करने की मांग भी की। यह सच है कि वंचितों को न्याय मिलना हमारी व्यवस्था में आज भी सपना लगता है, जबकि भारतीय संविधान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के साथ-साथ जाति, क्षेत्र, लिंग या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करने का भी निर्देश देता है। पिछड़े वर्गों को बराबरी के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई, जो जरूरी है वरना एक असमान व्यवस्था में समान वितरण भी असमानता का ही पोषण करता है। लेकिन मायावती की न्यायाधीशों की नियुक्तियों में आरक्षण की मांग के पीछे धारणा यह भी है कि दलितों और वंचितों को न्याय तभी मिलेगा जब उस वर्ग से न्यायाधीश बनेंगे वरना नहीं। यदि यह सच्चाई है तो न्याय व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी है। मतलब यह कि गैर दलित और वंचित वर्ग के न्यायाधीश दलितों के साथ न्याय नहीं करते या करने लायक नहीं हैं। क्या केवल दलित को न्यायाधीश बनाने से उन्हें न्याय मिल जाएगा?

कुछ हद तक सच होने के बावजूद यह पूरी तरह प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। अभी तक के अनुभव में क्या दलित वर्ग के उच्च पदों पर आसीन सदस्यों ने धन या अन्य प्रलोभनों में आकर उच्च और बलशाली के पक्ष में दलितों को उनके हक से वंचित नहीं किया? क्या किसी ने कभी किसी करोड़पति दलित को न्याय से वंचित होते हुए देखा है? या गरीब सवर्ण को न्याय पाते? ‘दाम कराए सब काम’ की धारणा भी तो गलत नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़ कर अनुभव यह भी दर्शाते हैं कि उच्च पदों पर आसीन होते ही दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग अपने वर्ग से दूर होने लगते हैं या वे बहुत जल्दी उच्च वर्ग के नजदीक जाकर उसमें समाहित (कोआप्ट) होने लगते हैं। 

सत्तर के दशक में मध्यप्रदेश के खंडवा में महाविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना के गांव में लगे शिविर के दौरान दलित वर्ग के लोगों ने बताया कि ठाकुर साब उन्हें कुएं से पाना नहीं भरने देते। छात्रों सहित हम प्राध्यापकों ने देखा कि दलित वर्ग के लोग उसी बावड़ी से पानी भर रहे थे जहां गाय, कुत्ते, सुअर और अन्य जानवर भी पानी पी रहे थे। गांव में दस दिन रह कर यह देखना तकलीफदेह तो था ही। किसी तरह का आंदोलन या विरोध सरकारी नौकरी में रह कर कर नहीं सकते थे इसलिए


मन मसोस कर रह गए। शिविर में एक दिन विधायक महोदय आए जो स्वयं दलित वर्ग के थे। हम उन्हें भी बावड़ी के पास ले गए, वहां से पानी लेने वालों से बात कराई। विधायकजी उस समय व्यथित हुए, विपक्षी दल के थे इसलिए सरकार को जी भर कर कोसा। बात आई-गई हो गई। 

कुछ माह बाद चुनाव हुए, सरकार बदल गई और संयोग से वे विधायकजी मंत्री बन गए। हमें लगा कि मंत्रीजी चूंकि प्रत्यक्ष रूप से उस गांव में जाकर समस्या देख चुके थे इसलिए बड़ी उम्मीद से उनसे मिलने सर्किट हाउस गए। उन्होंने छात्रों को और हमें पहचान तो लिया पर यह अहसास भी करा दिया कि पहचान कर हम पर कितना बड़ा अहसान किया है। सरकारी नौकर होने के कारण उनके अहसान के बोझ से दबे होने के चलते हमारी आवाज की ताकत वैसे ही कम हो गई। हमने अनुनय-विनय की शैली में मंत्रीजी को उस गांव के दलितों की वह समस्या बताई जो वे स्वयं भी देख कर उस समय व्यथित हुए थे। उन्होंने हमें फटकारते हुए कहा कि क्या फालतू की बातें कर रहे हो? आपने किताबों में ऊलजलूल पढ़कर अपना दिमाग खराब कर लिया है और हमें किताबी बातें बता रहे हैं। आप लोगों को गांव की, समाज की हकीकत तो मालूम होती नहीं, चले जहर घोलने। बंद करिए अपनी यह बकवास और जाकर ठीक से पढ़ाइए। लगभग धमकाते हुए कहा कि इन बच्चों के दिमाग में जहर मत घोलिए। दलित समस्या पर एक दलित नेता से डांट खाकर और व्यवस्था का सच समझ कर अपना मुंह लटकाए पिटे हुए प्यादे की तरह वापस आकर हम अपने काम में लग गए। हालांकि एक घटना से कोई सामान्यीकरण करना उचित नहीं होता, फिर भी यह अनुभव भी समाज की हांडी का ही चावल तो है ही।

श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल


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