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सत्ता के सगे PDF Print E-mail
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Wednesday, 27 August 2014 12:09

जनसत्ता 27 अगस्त, 2014 : पूर्व नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक विनोद राय सही कहते हैं कि ‘सत्ता में रहने के लिए सब कुछ दांव पर नहीं लगाया जा सकता और न ही गठबंधन-राजनीति की वेदी पर शासन की बलि दी जा सकती है।’ बात पहले कही गई या बाद में, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। बात बेबाकी से कही गई है, यह महत्त्वपूर्ण है। पहले कहते तो शायद उन्हें इसका खमियाजा भुगतना पड़ता। 

राय के खुलासे से साफ हो गया है कि सत्ता की भूख/ पिपासा कैसे व्यक्ति को जोंक की तरह सत्ता के साथ चिपके रहने को मजबूर करती है। सत्ता से चिपके रहने की यह भूख उससे उचित-अनुचित, मूल्य-इतर, नाजायज आदि सब-कुछ करवाती है। आशा की जानी चाहिए कि वर्तमान सरकार अपने शासन-काल में ऐसा कुछ होने


नहीं देगी।   

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर


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