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कोयले की कालिख PDF Print E-mail
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Wednesday, 27 August 2014 12:06

जनसत्ता 27 अगस्त, 2014 : कोयला खदानों के आबंटन पर सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला सरकारों के लिए सबक होना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों के आबंटन और उपयोग को विवेकाधिकार पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट नीति बननी चाहिए। यूपीए सरकार के समय नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक ने कोयला खदानों के आबंटन में हुई अनियमितताओं का खुलासा किया तो विपक्षी भाजपा ने खासे तीखे तेवर अपनाए। इसे लेकर लंबे समय तक संसद की कार्यवाही बाधित रही। मगर कांग्रेस दलील देती रही कि उसने खदानों के आबंटन में वही प्रक्रिया अपनाई, जो उसकी पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने अपनाई थी। मगर भाजपा इस तर्क को मानने से इनकार करती रही। सीबीआइ ने पीछे तक जाकर जांच की और जो रिपोर्ट पेश की, उसी के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि 1993 से 2010 के बीच दो सौ अठारह कोयला खदानों के आबंटनों में पारदर्शिता नहीं बरती गई। सारे आबंटन नीलामी के बजाय जांच समितियों की संस्तुति पर किए गए। इस तरह अपने करीबी लोगों को लाभ पहुंचाया गया। इस मामले में नरसिंह राव, देवगौड़ा से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक किसी ने भी प्राकृतिक संसाधनों के आबंटन में पारदर्शिता लाने की कोशिश नहीं की। मनमोहन सिंह सरकार के समय जरूर सबसे अधिक खदानों का आबंटन किया गया, जिसमें खुले तौर पर मनमानी की गई, जबकि कोयला मंत्रालय खुद प्रधानमंत्री के हाथ में था। जब मामले की जांच शुरू हुई तो तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने की भी कोशिश की गई। अगर यह जांच प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में न चली होती तो शायद सरकार इस मामले पर परदा डालने में कामयाब भी हो जाती। 

मनमोहन सिंह सरकार के समय बड़े पैमाने पर कोयला खदानों का आबंटन इसलिए किया गया कि बिजली, सीमेंट, इस्पात आदि उद्योग से जुड़ी कंपनियों का भारी दबाव था। चूंकि सरकार का जोर उद्योग-धंधों के विस्तार पर था, खासकर बिजली उत्पादन बढ़ाने को लेकर वह अधिक जल्दबाजी में थी इसलिए कोयले का उत्पादन बढ़ाने की गरज से उसने थोक में खदानों के आबंटन किए। उसमें ऐसे लोगों को भी खदानें बांट


दी गर्इं, जिनका इस क्षेत्र में पहले से कोई अनुभव नहीं था। ऐसा ही अविवेकपूर्ण रवैया दूरसंचार स्पेक्ट्रम आबंटन को लेकर अपनाया गया। हालांकि खदानों और स्पेक्ट्रम के आबंटन में खुली नीलामी की प्रक्रिया अपनाने की सलाह कई मंत्री और अधिकारी दे चुके थे, ताकि इन क्षेत्रों में कारोबारी पारदर्शिता आए और राजस्व की तार्किक उगाही हो सके। मगर आबंटन मामले से जुड़ी जांच समितियों के सदस्यों और संबंधित मंत्रालयों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इस तरह अपने करीबी लोगों को खुलेआम उपकृत किया गया। प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, उनके अंधाधुंध दोहन की अविवेकपूर्ण छूट देने का नतीजा यह होगा कि आने वाले समय में ऊर्जा और विनिर्माण आदि मामलों में गहरे संकट का सामना करना पड़ेगा। मगर सरकारों की अदूरदर्शिता का आलम यह है कि वे कोयला, सीमेंट, लौह अयस्क आदि तमाम खनिज पदार्थों की खदानों का आबंटन बगैर सोचे-समझे, महज अपने करीबी लोगों को उपकृत करने या राजस्व की भूख मिटाने की गरज से करती रहती हैं। पर इसका नतीजा पर्यावरण से जुड़ी गंभीर समस्याओं के रूप में भी सामने आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से बिजली, सीमेंट, इस्पात आदि के उत्पादन पर बुरा असर पड़ने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। मगर आर्थिक विकास के तर्क पर राष्ट्रीय संपदा की खुली लूट को छूट नहीं दी जा सकती। इस मामले में पारदर्शी और व्यावहारिक नीति बननी ही चाहिए। 


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