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संवेदना का परदा PDF Print E-mail
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Wednesday, 27 August 2014 12:00

नीकी नैनसी

जनसत्ता 27 अगस्त, 2014 : जब अपने अनुभव आपको किसी प्रगतिशील विचारधारा का ढिंढोरा पीटने वालों के बारे में सोचने पर मजबूर करते हैं तो शायद उस वक्त खुद को संभाल पाना थोड़ा मुश्किल होता है। हाल में एक ऐसे ही निजी अनुभव से दो-चार होना पड़ा, जिसने मुझे उन पुरुषों के प्रति अपने सोच को बदलने पर मजबूर किया, जो महिला अधिकारों और उनके सशक्तीकरण के मसले पर न केवल खूब लिख-पढ़ रहे हैं, बल्कि समाज में अपनी यह छवि बनाने की कोशिश में हैं कि उनसे ज्यादा महिलाओं के भले के लिए कोई और सोच ही नहीं सकता! अगर कोई व्यक्ति बिना किसी झूठ या आवरण के महज अपने स्वाभाविक रूप में सामने आता है तो आपको उसके हिसाब से प्रतिक्रिया देने का मौका मिलता है और आप स्पष्ट निर्णय ले पाते हैं। लेकिन अगर विचारों, सिद्धांतों का झूठा लबादा ओढ़ कर कोई आपको पहले अपनी धारा में बहा कर ले जाए और फिर बीच मंझधार में अपना असली रूप दिखा दे, तब उसका सामना करना मुश्किल हो जाता है। मैं एक ऐसे ही पुरुष के दंभ का शिकार हुई जो दोहरे व्यक्तित्व का शिकार रहा और उसके तमाम वैचारिक दोषों की सजा मुझे किसी न किसी रूप में झेलनी पड़ी। अब मुझे ऐसा लगता है कि शायद आजकल पुरुषों का एक ऐसा वर्ग भी सामने आ रहा है जो कहीं न कहीं स्त्री के आज के उभरते और बदलते स्वरूप को आत्मसात न कर पाने के कारण अंदर से आक्रांत है। और पुरुष जब अपने परिवेश से आक्रांत रहता है, तो वह भीतर के दबाव से उपजे असंतुलन का निशाना स्त्री को बनाने की कोशिश करता है।

ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया अब एक नए और छिपे रूप में स्त्रीवादी और प्रगतिशील होने की आड़ में सामने आ रही है। इन हालात में स्त्री विमर्श के किसी गंभीर पहलू पर जब ऐसे लोग सवाल उठाते भी हैं तो वे किसी सार्थक बहस का हिस्सा नहीं लगते, सिवाय इसके कि उसमें भी उनका कोई स्वार्थ निहित होता है। ऐसे सवालों में बाहरी तौर पर प्रगतिशील और अंतर्द्वंद्वों को समझने की कोशिश होती है, तो उसके निष्कर्ष पुरातनपंथी, फासीवादी और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के समर्थक लगते हैं। इसमें स्त्री विरोध मुखरता से अभिव्यक्त होता है। लोग निजी कुंठाओं का सामान्यीकरण करके स्त्री को लांछित करने की कोशिशों में रत हो जाते हैं।

समाज के हर तबके में स्त्री के प्रति एक आम रवैया कायम रहा है। लेकिन अब, जब स्त्री ने खुद को समझने की कोशिश शुरू की तो पुरुष वर्ग ने संवेदना और सहानुभूति जैसे उपकरणों को आजमाना शुरू किया, जिससे स्त्री का समर्थन आसानी से मिल जाता है। लेकिन सवाल है कि संवेदना और सहानुभूति का विभेद पुरुषों


के लिए आखिर कितना महत्त्व रखता है? स्त्रियों के बीच जब चर्चा होती है तो संवेदनशीलता का पाला उनकी ओर रहता है और यह स्वाभाविक भी लगता है। स्त्रीत्व का उत्सव इस तथ्य में निहित है कि अमानुष बनाए जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद स्त्रियां ज्यादातर पुरुषों से शायद ज्यादा मनुष्य होती हैं। लेकिन पुरुष शायद संवेदना और सहानुभूति को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं और उसका जिम्मा आमतौर पर वे खुद उठा लेते हैं। अब जिन पुरुषों की मानसिकता सहानुभूति पर आधारित हो, वे स्त्री के हकों की लड़ाई में कैसे अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं? दरअसल, पुरुष की सहानुभूति इस दंभ पर आधारित होती है कि समाज उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन स्त्री से अगर कभी कोई चूक हुई तो सबके किए-धरे का ठीकरा उसके सिर ही फूटता है। 

अब वैसे पुरुषों को किस श्रेणी में रखा जाए जो ऊपर से नारीवादी और सकारात्मक दृष्टिकोण रखने का दावा करते हैं, लेकिन मौका मिलने पर स्त्री का हर तरह से शोषण करने से बाज नहीं आते। थोड़े समय पहले जब बलात्कार के मसले पर मुलायम सिंह यादव सहित देश के कई नेताओं के विवादास्पद बयान आए तो उन्हें मैंने इस आलोक में देखा कि सत्ता-व्यवस्था के स्तर पर भी दोहरा चरित्र रखने वाले कथित प्रगतिशील पुरुषों के प्रतिनिधि बैठे हुए हैं। परंपरावादी और दक्षिणपंथ की राजनीतिक धारा से जुड़े लोगों के बारे में तो सब जानते हैं कि वे किस तरह स्त्री को गुलाम बनाए रखने के प्रत्यक्ष-परोक्ष हिमायती रहे हैं। लेकिन प्रगतिशील राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग भी जब खुलेआम स्त्रियों के खिलाफ बातें करते हैं तो यह पाखंड ज्यादा परेशान करता है। बहरहाल, अगर पुरुष कागज के पन्नों पर सहानुभूति दर्ज करने के बजाय, सचमुच संवेदनशील हो जाएं तब कोई दिक्कत ही नहीं! सवाल आखिर घूम-फिर कर वहीं आ जाता है कि क्या शिक्षित और अपने भरोसे जीने वाली स्त्री के लिए यह दुनिया सचमुच कहीं बदली है!


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