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महामहिम का पद PDF Print E-mail
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Tuesday, 26 August 2014 11:59

जनसत्ता 26 अगस्त, 2014 : महाराष्ट्र के राज्यपाल के. शंकरनारायणन के इस्तीफे के बाद स्वाभाविक ही एक बार फिर राज्यपालों की नियुक्ति को लेकर बहस शुरू हो गई है। केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली  राजग सरकार आने के साथ ही यूपीए सरकार के समय नियुक्त राज्यपालों को हटाने की कवायद शुरू हो गई थी। उनमें सबसे पहले शंकरनारायणन को फोन कर अपने पद से हटने को कहा गया था। मगर उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। उसके बाद उन पर लगातार दबाव बना हुआ था। बीते शनिवार को उनका तबादला मिजोरम कर दिया गया, जिससे आहत होकर उन्होंने पद त्याग दिया। कांग्रेस इस कदम को राजनीति से प्रेरित बता रही है। मगर उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि इस परंपरा की शुरुआत उसी के समय हुई थी। यूपीए की सरकार बनी तो राजग के समय नियुक्त सभी राज्यपालों को हटा कर अपने लोगों को जिम्मेदारी सौंप दी गई। अब यह रिवायत-सी बन गई लगती है कि जब भी केंद्र में सरकार बदलती है, दूसरे दलों की तरफ से नियुक्त राज्यपालों को सबसे पहले हटाया जाता है। हर राजनीतिक दल मंत्रिपरिषद में शामिल किए जाने से रह गए अपने वरिष्ठ नेताओं को राजभवन में भेज कर उपकृत करने की कोशिश करता है। नरेंद्र मोदी सरकार ने भी वही किया। मगर इस प्रवृत्ति पर लंबे समय से अंगुलियां उठती रहने के बावजूद शायद किसी राजनीतिक दल ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि राज्यपालों को मोहरे की तरह इस्तेमाल करने से संघीय व्यवस्था के मूल उद्देश्य को नहीं बचाए रखा जा सकता। इस तरह राज्यपाल पद की गरिमा और उस पद का निर्वाह कर रहे व्यक्ति के सम्मान की परवाह भी नहीं की जाती। जबकि भाजपा खुद यूपीए सरकार के समय राज्यपालों को राजनीति से प्रेरित होकर हटाए जाने का विरोध करती रही। 

भाजपा के एक नेता बीपी सिंहल ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि कार्यकाल पूरा होने से पहले राज्यपालों को उनके पद से हटाया जाना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। इस पर 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बगैर किसी वाजिब वजह के राज्यपाल को सिर्फ केंद्र में सरकार बदलने या दूसरे दल से राजनीतिक


जुड़ाव के कारण नहीं हटाया जाना चाहिए। अलबत्ता राज्यपाल अपने पद पर राष्ट्रपति की अनुकंपा तक ही बने रह सकते हैं, लेकिन अगर उन्हें मनमाने ढंग से हटाया जाता है तो यह न्यायिक समीक्षा का विषय हो सकता है। पर नरेंद्र मोदी सरकार ने खुद इस फैसले पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। कमला बेनीवाल से लेकर शंकरनारायणन तक सभी राज्यपालों को हटाने के पीछे कोई उचित कारण नहीं बताया गया। यही वजह है कि उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर जानना चाहा था कि कैसे केंद्र के गृहसचिव को फोन कर किसी राज्यपाल का तबादला करने या उसे पद से हटने को कहने का अधिकार मिल जाता है। अच्छी बात है कि शंकरनारायणन ने राष्ट्रपति के फैसले का सम्मान करते हुए उसे चुनौती देना जरूरी नहीं समझा। नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के साथ भरोसा दिलाया था कि वे कांग्रेस की तरह शासन नहीं चलाएंगे, पर जल्दी ही वे इस बात को भूल गए। अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने के मकसद से राज्यपालों की नियुक्ति भला किस तरह संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कर सकती है। सरकारिया आयोग ने बहुत पहले सिफारिश की थी कि राज्यपाल राजनीतिक रूप से निष्पक्ष व्यक्ति को बनाया जाना चाहिए, उसका संबंध न तो केंद्र में सत्तारूढ़ दल से हो न संबंधित राज्य के। मगर संघीय ढांचे की दुहाई देने वाली भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार ने उस सिफारिश को भी नजरअंदाज कर दिया। 


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