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रिचर्ड एटनबरो PDF Print E-mail
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Tuesday, 26 August 2014 11:58

जनसत्ता 26 अगस्त, 2014 : भारत में उन्हें एक ऐसे महान फिल्मकार के तौर पर जाना जाता है, जिसने अपनी फिल्म ‘गांधी’ के जरिए यहां के लोगों के जेहन में आजादी के आंदोलन की यादों को और गहरा किया और नई पीढ़ी को महात्मा गांधी के जीवन से रूबरू कराया। लेकिन निर्माता-निर्देशक और अभिनेता रिचर्ड एटनबरो दरअसल ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने फिल्मी दुनिया की अपनी उपलब्धियों और इस कला की गहरी समझ के बूते करीब छह दशक तक हॉलीवुड सिनेमा पर राज किया। एटनबरो के पिता लिसेस्टर के यूनिवर्सिटी कॉलेज में प्रिंसिपल थे। दिलचस्प है कि शिक्षण की पृष्ठभूमि वाले परिवार से आने के बावजूद एटनबरो की पढ़ाई-लिखाई का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा। वे नाटकों में काम करके संतोष पाते थे। महज बारह साल की उम्र में उन्होंने अभिनय करना शुरू किया था। अठारह साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला पेशेवर नाटक खेला। इस दौरान 1935 में एटनबरो एक बार जब अपने पिता के साथ लंदन घूमने गए तो वहीं उन्होंने चार्ली चैपलिन अभिनीत फिल्म ‘द गोल्ड रश’ देखी और तभी तय किया था कि अभिनय ही उनका कॅरियर होगा। फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और उनकी पहली फिल्म ‘इन विच वी सर्व’ 1942 में आई। 1949 में दर्शकों ने उन्हें ब्रिटेन के छठे सबसे लोकप्रिय अभिनेता के रूप में पसंद किया था। इसके बाद वे ब्रिटेन में अगले तीन-चार दशकों तक लगातार गंभीर विषयों से लेकर हास्य पर केंद्रित फिल्में बनाते रहे। उन्होंने ‘ब्राइटन रॉक’, विश्वयुद्ध पर बनी फिल्म ‘द ग्रेट एस्केप’ सहित भारतीय फिल्मकार सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘जुरासिक पार्क’ जैसी मशहूर फिल्मों में काम किया। 

उनकी फिल्मों के नायक आमतौर पर सत्ता-संस्थानों के सामने चुनौती पेश करते थे। लेकिन उनके लिए यह केवल परदे का मामला नहीं था। वे ‘एक्टर्स चैरिटेबल ट्रस्ट’ के मुखिया भी रहे, जो वृद्ध हो चुके अभिनेताओं और उनके बच्चों की मदद करता है। अपनी पत्नी के साथ मिल कर उन्होंने दृश्य कला केंद्र और 2004 के सुनामी में मारी गई अपनी बेटी की याद में स्वाजीलैंड के


वाटरफोर्ड काम्लाबा में जेन हॉलैंड क्रिएटिव सेंटर फॉर लर्निंग की स्थापना की थी। वे रंग, नस्ल, पंथ या धर्मों के बीच किसी भी तरह के भेदभावरहित शिक्षा के पैरोकार थे। एक बार हाउस ऑफ लार्ड्स में दिए गए लंबे भाषण में उन्होंने कला की उपेक्षा करने के लिए तीखी आलोचना की थी। भारत के पद्म भूषण सहित दुनिया के कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित एटनबरो फिल्मों के अलावा फुटबॉल क्लब चेल्सी एफसी के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे। एटनबरो अपनी जिंदगी में अमूमन हरेक चीज को लेकर बेहद संवेदनशील थे, वह चाहे परिवार हो, दोस्त, देश या फिर अपना कॅरियर। किसी भी काम को जब वे शुरू करते थे तो उसमें उनका जुनून देखने लायक होता था। यह जुनून दरअसल, उनके सरोकारों से संचालित होता था। गांधीजी के व्यापक व्यक्तित्व को तीन घंटे में समेट सकने का काम शायद एटनबरो ही कर सकते थे। ब्रिटेन का नागरिक होने के बावजूद उन्होंने जिस निष्पक्ष तरीके से गांधी को परदे पर उतारा, उसकी तुलना शायद ही किसी और कृति से की जा सके। जब 1983 में बेन किंग्सले अभिनीत ‘गांधी’ फिल्म को आॅस्कर पुरस्कार मिला तो सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार लेते हुए उन्होंने कहा था कि सही मायनों में इसके जरिए गांधी को सम्मानित किया गया है, जो लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत थे। 


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