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सस्ती चीज नहीं मांगता PDF Print E-mail
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Tuesday, 26 August 2014 11:51

विष्णु नागर

जनसत्ता 26 अगस्त, 2014 : यों इसकी चर्चा पहले से ही है, मगर हाल ही में टाटा मोटर्स के एक वरिष्ठ अधिकारी गिरीश वाघ ने भी इसकी पुष्टि की कि अन्य कारण अपनी जगह हैं, मगर नैनो कार का दुनिया की सबसे सस्ती कार होने का प्रचार ही उसे वास्तव में डुबा गया। इस कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नैनो को खूब चर्चा तो मिली और कई और कार निर्माता घबरा कर ऐसी कार बनाने का इरादा भी जाहिर करने लगे, मगर यह कार जब बाजार में आई और पिट गई तो दूसरे कार-निर्माता पीछे हट गए। 2012-13 में केवल 53,848 नैनो कारें बिकी थीं, जबकि 2013-14 में इससे करीब ढाई गुना कम, यानी 21,219 कारें बिकीं। जबकि शुरुआत में उम्मीद की गई थी कि कम से कम ढाई लाख नैनो प्रतिवर्ष तो बिकेंगी ही। वाघ दरअसल उन लोगों में हैं, जिन्होंने इस कार को डिजाइन करने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसकी कंपनी टाटा मोटर्स सबको चौंकाने, बल्कि हतप्रभ करने वाले अपने इस देसी आविष्कार पर मुग्ध थी। बहरहाल, सारी व्यावसायिक रणनीति धरी रह गई और सबसे ज्यादा प्रचारित भारतीय कार बाजार में ठहर नहीं पाई।

इस विडंबना की ओर पता नहीं कितनों का ध्यान गया होगा कि आर्थिक उदारीकरण ने किस तरह खाते-पीते उपभोक्ता के दिमाग को विकृत किया है कि वह कोई भी ऐसी चीज नहीं खरीदना चाहता, जिसके बारे में यह प्रचारित हो कि यह सस्ती है। वह सस्ती हो, मगर यह प्रचारित न हो तो वह खरीद लेगा। ऐसा नहीं है कि यह वर्ग सस्ती चीजों की तरफ नहीं लपकता। मगर किसी को यह पता नहीं होना चाहिए कि ये सस्ती चीजें खरीदते हैं। हालांकि जिनकी निगाहें अपने और आपके दिखावे पर रहती हैं, वे फौरन जन्नत की हकीकत जान जाते हैं, क्योंकि वे भी इसी लोक में दिन-रात रहते हैं। बहरहाल, इस कार को उन लोगों ने भी नहीं अपनाया, जो आज भी स्कूटर या मोटरसाइकिल पर चलते हैं। कुछ मोटरसाइकिलें तो कार से भी ज्यादा महंगी मिलती हैं और उन पर चलना दूसरों को उनकी हैसियत बताने का जरिया है। 

दरअसल, यह वर्ग अपने ही वर्ग के और दूसरों को उनकी हैसियत बताने के घटियापे में व्यस्त रहता है और जो इस प्रतियोगिता से खुद को बाहर कर चुका है, वही दरअसल सुखी है। यों दिल्ली के प्रगति मैदान में हर साल नवंबर में लगने वाले मेले के अंतिम दिन इसी वर्ग के लोग जाते हैं, इस उम्मीद में कि उस दिन उनकी नजर में चढ़ी हुई कोई चीज सस्ती मिल जाएगी। यहां तक कि साप्ताहिक हाट में रात को दस बजे इसी वर्ग के लोग जाते हैं और सबसे सस्ती और बची-खुची सब्जी खरीद कर घर लाते हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनमें ‘सेकेंड हैंड’ चीजों को खरीद कर शान बघारना भी शामिल है।


महंगी और बड़ी कार घर में चाहे शोभा की चीज बन कर खड़ी रहे, मगर खरीदेंगे वही, ताकि खास मौकों पर अपनी हैसियत दिखाई जा सके। सस्ती प्रदर्शनप्रियता खाते-पीते वर्गों की खास पहचान बन गई है। इनमें से ज्यादातर के दिमाग में गोबर भरा है (जिसके उपले भी नहीं बन सकते), ज्यादातर भयानक रूप से संस्कृति-सभ्यताविहीन और अपने आचरण में फूहड़ हैं। मगर इस पर यह वर्ग कभी शर्मिंदा नहीं होता। संसद की बैठक में शामिल होने के लिए सुबह हवाई जहाज से आकर रोज शाम को वापस लौट जाने वाले, महंगी-महंगी पार्टियां देने के लिए मशहूर साहब सरकारी बैंकों का पैसा आराम से डकार जाएंगे, इसमें कभी शर्म नहीं आएगी, लेकिन बाहरी शान में फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

बहरहाल, यह प्रदर्शनप्रियता ज्यों-ज्यों बढ़ रही है, साधारण कामगारों-दुकानदारों और लोगों का जीना मुहाल हुआ जा रहा है। भले नकली हो, मगर ‘ब्रांड’ होना चाहिए। इससे हमारे तमाम कारीगर, जो छोटा-मोटा काम करके गुजारा कर रहे थे, उनका जीना मुश्किल होता जा रहा है। या तो ब्रांडेड कपड़े होने चाहिए या उन्हें सिलने वाला दर्जी ब्रांडेड होना चाहिए। हमारे जीवन से वे सस्ते पेन गायब हो गए हैं, जिनमें स्याही फिर से भरी जा सकती थी, उनकी रिफिल खरीदी जा सकती थी। अब उन्हें काम में लो और फेंको, यही विकल्प है। कंप्यूटर-टीवी जैसी न जाने कितनी चीजों को एक समय के बाद फेंकना पड़ता है। अब तो वाटर प्यूरीफायर बनाने वाली एक कंपनी एक ‘भारत रत्न’ जी के माध्यम से अपने ही पुराने ब्रांड को बेशर्मी से गरियाती और कहती है- ‘हमारा यह नया माल खरीदो’ और ‘भारत रत्न’ जी को ऐसे काम के लिए पूरी फुर्सत है। किसी दो साल पुरानी चीज के पुर्जे भी अब बाजार में नहीं मिलते, क्योंकि कंपनियां यह नहीं चाहतीं कि आप दो साल पुरानी चीज को भी ठीक करके इस्तेमाल करें। स्कूल-कॉलेज से लेकर चावल, दाल, आटा, नमक, पानी तक ब्रांडेड! यह माहौल देश के सबसे बड़े वर्ग के रूप में गरीबों को कितना कुंठित कर रहा है, इसका कोई अहसास नहीं करना चाहता।


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