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शीला दीक्षित की दिल्ली वापसी की आहट से कांग्रेस में खलबली PDF Print E-mail
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Tuesday, 26 August 2014 10:03



मनोज मिश्र

नई दिल्ली। केरल की राज्यपाल और दिल्ली की लगातार 15 साल मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित इन दिनों दिल्ली में हैं। चर्चा है कि देर सवेर केंद्र सरकार उनसे भी राज्यपाल पद से इस्तीफा देने को कहे। इस्तीफे के बाद जाहिर है कि वे दिल्ली के फिरोजशाह रोड के फ्लैट में रहने लगें, जहां वे चुनाव हारने के दो महीने बाद रहने गई थीं। यूपीए सरकार ने उन्हें लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले केरल का राज्यपाल बनाया था। 

विधानसभा चुनाव के बाद उनके घोर विरोधी जयप्रकाश अग्रवाल को हटाकर शीला मंत्रिमंडल के सदस्य अरविंदर सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। कांग्रेस विधायक दल का नेता भी उनके मंत्रिमंडल के दूसरे सहयोगी हारुन यूसुफ को बनाया गया। बाकी विधायक इससे नाराज हैं। उनपर आरोप है कि वे भाजपा और आप से मिलकर सरकार बनवाने में असफल होने पर उन्हीं में से दो विधायक मतीन अहमद और आसिफ मोहम्मद खान ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर दिल्ली कांग्रेस की कमान शीला दीक्षित को सौंपने की मांग की। उस समय हाई कमान ने कोई सिग्नल नहीं दिया। लेकिन शीला दीक्षित के दिल्ली लौटने की संभावना से ही उनकी पार्टी के नेताओं के पसीने आने लगे हैं।  

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह ने इस पर सीधी टिप्पणी नहीं की। उनका कहना था कि यह तय करना पार्टी नेतृत्व का काम है। दीक्षित तो उनकी नेता रही हैं, उनके साथ उन्होंने लंबे समय तक काम किया है। दीक्षित विरोधी नेताओं, पूर्व विधायक भीष्म शर्मा ने दीक्षित को दिल्ली की राजनीति में फिर से सक्रिय करने का यह कह कर विरोध किया कि उनके ही चलते कांग्रेस चुनाव हारी। उन्होंने इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखा। पूर्व विधायक ब्रह्मपाल समेत कई नेताओं ने शर्मा का समर्थन किया था। 

शीला दीक्षित के दिल्ली की राजनीति में सक्रिय करने न करने के बहस के साथ यह भी सही है कि कांग्रेस का बुरा हाल एक दिन में नहीं हुआ है। सालों सत्ता सुख भोगने वाले कांग्रेस नेताओं का कार्यकर्त्ताओं से कोई संपर्क नहीं रह गया है। बड़े नेता कार्यकर्ताओं से मिलना तो दूर उनके फोन सुनने तक को राजी नहीं हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस में कार्यकर्ता बनाने का काम बंद है। कांग्रेस में सत्ता सुख भोगने वाले नेता हर जगह काबिज हैं। कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता उपेक्षित हैं। इस हालात को बदलने का अब तक नाटक ही होता रहा है। कांग्रेस में गणेश


परिक्रमा की परंपरा बढ़ी है।  

पूर्वी दिल्ली लोकसभा चुनाव हार कर 1998 में शीला दीक्षित जब प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनी तब लुंजपुंज पड़ी कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हार रही थी। लगातार तीन विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीतने का अनोखा रिकार्ड शीला दीक्षित के समय ही बना। अपने तीसरे कार्यकाल में वे अति आत्मविश्वास की वजह से हार गईं। वे अपने सलाहकारों तक सिमटी रहीं। सुधार के हर सलाह को उन्होंने खारिज किया। न तो टीम बदली और न सलाहकार इसका परिणाम हुआ कि 2006 में दिल्ली का परिसीमन कांग्रेस के हिसाब से होने के बावजूद कांग्रेस चुनाव हार गई। कांग्रेस हाईकमान तो उनके और तब के प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल के झगड़े पर आंखे मूंदे रहा। इसी ने आम आदमी पार्टी (आप) को जगह दी। आप नेता अरविंद केजरीवाल के आक्रामक चुनाव प्रचार ने कांग्रेस की बुरी गत बना दी।

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव और पिछले दिनों हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साबित किया कि करीब दो साल पहले बनी आप ने कांग्रेस को ज्यादा और भाजपा को कम नुकसान पहुंचाया। उसे विधानसभा चुनाव में जो 29 फीसद वोट मिले उनमें कांग्रेस के करीब 16 फीसद, भाजपा के आठ फीसद और बसपा के करीब पांच फीसद वोट शामि थे। कांग्रेस को 24.50 फीसद और भाजपा को 33 फीसद वोट मिले। दिल्ली के अल्पसंख्यकों ने गलतफहमी में विधानसभा चुनाव कांग्रेस को वोट दिया, जो लोकसभा में आप को मिला। यह साबित हो गया कि अगर विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों का साथ न होता तो कांग्रेस आठ सीटें भी नहीं जीत पाती। 75 पार की दीक्षित अब 1998 जैसी सक्रिय तो हो नहीं पाएंगी अब उनकी भूमिका सलाहकार या मार्गदर्शक की ही हो सकती है। इससे ज्यादा उनकी भूमिका तब ही होगी जब हाई कमान पहले की तरह उन्हें फिर से हर फैसला लेने के लिए खुली छूट दे। 

अरविंदर सिंह अभी तक अपनी टीम तक नहीं बना पाए हैं। जबकि कहा जा रहा है कि हाईकमान ने उन्हें फ्री हैंड दे रखा है। लगता नहीं कि उन जैसे नेता आसानी से किसी और को अपना अधिकार लेने देंगे। अभी तो सबकुछ भविष्य के हाथ में है। लेकिन दिल्ली कांग्रेस पर एकछत्र राज करने वाली दीक्षित केरल से वापस आकर हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठेंगी। 

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