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दूर के ढोल PDF Print E-mail
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Monday, 25 August 2014 12:06

जनसत्ता 25 अगस्त, 2014 : ‘ट्रेन की चपेट में आई बस, पंद्रह बच्चे मरे’ (जनसत्ता, 25 जुलाई) दिल दहला देने वाली इससे लोमहर्षक खबर और क्या हो सकती है? जैसा कि इस त्रासदी के लिए रेलवे को जिम्मेवार ठहराया जा रहा है, हो सकता है कि विद्यालय प्रबंधन पर आंच आए, पर जरा सोच कर देखें कि इन दोनों के साथ-साथ क्या अंगुलियां किसी और पर नहीं उठनी चाहिए? औपचारिक विद्यालयी शिक्षा-व्यवस्था की ओर और अभिभावकों की उस सोच पर जिसके रहते वे अपने आसपास के सरकारी विद्यालयों की उपेक्षा कर गुणवत्ता परक शिक्षा की चाहत के लिए बच्चों को घर से अच्छी-खासी दूरी वाले निजी विद्यालयों में भेजने से हिचकिचाते नहीं हैं।

रेलवे और बस चालक की लापरवाही पर सवाल उठाने के साथ-साथ हमें यह भी सवाल करना चाहिए कि आखिर अभिभावकों को अपने बच्चों को इतनी दूर भेजने की जरूरत क्यों आन पड़ी? हमारे देश में ‘सर्वशिक्षा अभियान’ जैसे कार्यक्रम की दुदुंभि बजे एक दशक से ऊपर हो चला है। इस कार्यक्रम का उद््देश्य न केवल विद्यालयों की उपलब्धता, बल्कि आवश्यक और अनिवार्य बुनियादी सुविधाएं, मौज-मस्ती भरा सिखने-सिखाने का माहौल प्रदान करना भी था, पर चूंकि सरकारी विद्यालय यह सब देने में नाकाम साबित हो रहे हैं और प्रशासन भी महज आंकड़े जुटाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पा रहा, इसलिए मामूली आमदनी वाले अभिभावकों की भी चाहत यही रहती है कि उनके बच्चे प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ने जाएं, भले ही वे घर से कितना भी दूर क्यों न हो? 

हालांकि यह भी एक भ्रम ही है कि इन विद्यालयों में सिखने-सिखाने का माहौल उत्कृष्ट कोटि का होता है। दरअसल आज की ब्रांडवादी संस्कृति में स्कूली शिक्षा के भी ‘ब्रांड’ बन गए हैं। न जाने कहां से हवा बहने लगती है कि ‘फलां विद्यालय सबसे अच्छा है।’ बस इतना भर सुना नहीं कि अभिभावक ‘फलां’ विद्यालय में अपने बच्चे को


प्रवेश दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं और दाखिला मिल जाने पर अपने को गौरवांवित महसूस करते हैं। नाम सिर्फ निजी विद्यालयों का ही नहीं, बल्कि एक तबके विशेष में सरकारी विद्यालयों का भी चलते देखा है, जिन्होंने मेहनत से अपनी साख बनाई है। इसी ‘साख’ के चलते तो दिल्ली में यमुना नदी में बच्चों से भरी बस गिरने का हादसा हुआ था। 

प्रश्न तो यह है कि क्या हम दोषारोपण करते रहे या फिर दुर्घटना के मूल में जाकर स्कूलों की भी सुध लें। घर के पास का विद्यालय कब अभिभावकों को आकर्षित कर पाएगा? कब इस तरह के हादसे होने बंद होंगे? हम ऐसा क्यों नहीं कर पाते कि अपने आसपास के विद्यालय को ही उत्कृष्ट बनाएं। आखिर अपने बच्चे की विद्यालय की हर प्रक्रिया पर निगरानी रखना हमारी जवाबदेही भी है और जिम्मेदारी भी, जब ऐसा करने लगेंगे सभी अभिभावक तो स्कूल क्यों नहीं सुधरेगा? और फिर बच्चों को पास के विद्यालयों में भेजने से बच्चों की ऊर्जा, वहन पर खर्च होने वाले र्इंधन की भी तो बचत होगी। 

शारदा कुमारी, आरकेपुरम्, नई दिल्ली


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