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यूआर अनंतमूर्ति PDF Print E-mail
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Monday, 25 August 2014 12:03

जनसत्ता 25 अगस्त, 2014 : उनकी व्यापक पहचान भले कन्नड़ रचनाकार के रूप में बनी रही, पर सही अर्थों में वे सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे। भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीति से लगातार वे संवाद करते रहे। अपनी यथार्थपरक रचनाशीलता से जहां उन्होंने वैश्विक और स्थानीय के बीच निरंतर एक सेतु बनाए रखा, जिसमें स्थानीय का पक्ष हमेशा चमकदार दिखता रहा तो अपने साहसिक निर्णयों, अडिग विचारों, सामाजिक प्रतिबद्धताओं के जरिए अन्याय, संकीर्णता, विसंगति के विरुद्ध विरोध का स्वर ऊंचा किए रखा। यूआर अनंतमूर्ति, जिनका पूरा नाम उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति था, ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए, पारंपरिक ढंग से शिक्षा की शुरुआत की, पर उन संस्कारों में वे बंध नहीं पाए तो इसके पीछे बड़ा कारण उनमें सामाजिक विसंगतियों के प्रति विद्रोह भाव था। उन्हें साधारण मनुष्य की पीड़ा हमेशा मथती रही। उन्होंने विदेशी संस्थानों में शिक्षा पाई, अंगरेजी में निष्णात थे, पर लेखन के लिए अपनी मातृभाषा को चुना तो इसका कारण भी उनका स्थानीयता से अविचल मोह था। वे गांधीवादी समाजवादी विचारों के कायल थे। समाज के हाशिये पर पड़े अंतिम मनुष्य तक उनकी नजर जाती थी। उनकी इस वैचारिक और सामाजिक प्रतिबद्धता के कई उदाहरण मौजूद हैं। नव्या आंदोलन शुरू करने के पीछे भी यह मकसद था कि साहित्य के जरिए आम इंसान के सुख-दुख को उभारा-उकेरा जाए। उनकी कहानियों में आधुनिक मनुष्य के द्वंद्व को जिस बारीकी से उभारा गया है, वह अतुलनीय है। वे अंगरेजी के बजाय भारतीय भाषाओं को ज्यादा श्रेष्ठ मानते थे। उनका मानना था कि अंगरेजी मनुष्य को एक कृत्रिम दुनिया में ले जाती है, जहां अकेलापन ही हासिल होता है। वह अपनी जड़ों से कट जाता है। भारतीय भाषाएं स्थानीय जीवन के ऊर्जस्वित, रसमय वातावरण में पहुंचाती हैं। देश-विदेश की तमाम यात्राओं के बावजूद अगर उन्हें अपना पैतृक गांव मोहता था तो यह उनका भारतीय संस्कृति और स्थानीयता के प्रति अनुराग ही था। 

अनंतमूर्ति ने ‘संस्कार’, ‘भारतीपुर’, ‘अवस्थ’, ‘दिव्या’ जैसे उपन्यासों; ‘इंदेदु मग कथे’, ‘मौनी प्रश्ने’, ‘आकाश मत्तू’ आदि कहानी संग्रहों; ‘पदग्यालु’, ‘मिथुना’, ‘अज्जाना हेगला सुक्कुगलु’ आदि कविता संग्रहों और अनेक निबंध संग्रहों और आलोचना ग्रंथों के माध्यम से न सिर्फ कन्नड़ साहित्य, बल्कि पूरे भारतीय


और कई विदेशी भाषाओं के साहित्य का भी ध्यान आकर्षित किया। उनके उपन्यासों पर कन्नड़ और हिंदी में फिल्में बनीं और खूब सराही गर्इं। इस तरह अनंतमूर्ति न सिर्फ गंभीर साहित्य चिंतकों के बीच, बल्कि सामान्य जनसमुदाय में भी समान रूप से समादृत रहे। साहित्य के अलावा वे लगातार सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। अपनी राजनीतिक पक्षधरता को कभी छिपाया नहीं, बल्कि कई मौकों पर बेखौफ जाहिर किया। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किए जाने पर उनकी तीखी टिप्पणी और फिर उस पर अराजक प्रहार का उदाहरण अभी हाल का है। उन्होंने अनेक संस्थाओं के प्रमुख पदों की जिम्मेदारी निभाई, जिनमें महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति, साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष और फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष पद उल्लेखनीय हैं। इन तमाम संस्थाओं की जिम्मेदारी संभालना उनके लिए सिर्फ जीविका का आधार नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति के विभिन्न हिस्सों से संवाद कायम करने का जरिया था। वे प्रखर वक्ता, कुशल कथावाचक, सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषक और बड़े यारबाश थे। उनके योगदान के लिए भारत के तमाम महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया गया। वे पहले भारतीय रचनाकार थे, जिन्होंने अपनी मातृभाषा में लिख कर दुनिया की सारी श्रेष्ठ भाषाओं का ध्यान खींचा। फ्रेंच, जर्मन, अंगरेजी में उनकी रचनाओं के अनुवाद हुए और सराहे गए। उनका जाना पूरे भारतीय साहित्य-जगत को गमगीन कर गया है। 


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