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आत्म-मोह का धुंधलका PDF Print E-mail
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Monday, 25 August 2014 12:01

कनक तिवारी

 जनसत्ता 25 अगस्त, 2014 : क्या  है इस आत्मकथा में? पूर्व नौकरशाह, मंत्री, राजनयिक नटवर सिंह की लगभग चार सौ पृष्ठों की आत्मकथा

‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’ अनावश्यक रूप से विवादास्पद और महत्त्वपूर्ण बना दी गई। यह आत्मकथा होने के बदले यादध्यानी डायरी के पृष्ठों का संग्रह है। आत्मकथा आत्मावलोकन का दूसरा नाम होता है। लेखक ने अपने विकास, उपलब्धियों, विफलताओं और जय-पराजय को अपने आंतरिक संदर्भ में देखने की रचनात्मक कोशिश नहीं की है। सूचनाओं से अटी पड़ी किताब में देश-विदेश की कई हस्तियों के प्रसंगों पर टिप्पणियों का कोलाज है। किसी घटना का बयान करते नटवर सिंह सहसा पटाक्षेप कर देते हैं। समझ नहीं आता कि उक्त घटना का क्या भावार्थ या निहितार्थ लेखक के अनुसार है। 


पुस्तक का कालखंड नटवर सिंह ने अपने जन्म 1931 से लेकर 2014 तक विस्तृत तो किया है, बीसवीं सदी के महत्त्वपूर्ण दौर की गतिविधियों, संलिष्टताओं, विरोधाभासों और विचित्रताओं का सार-संक्षेप भी देने की कोशिश नहीं है। समृद्ध सामंतवादी कुल में जनमे, साधारण लोगों की जिंदगी से बेखबर तथा भारत और इंग्लैंड के बेहतर शिक्षा संस्थानों में पढ़ कर भारतीय विदेश सेवा में चयनित नटवर सिंह का ब्याह भी अपेक्षाकृत धनाढ्य पटियाला के महाराजा की बेटी से हुआ। उनका दृष्टिकोण इन वजहों से आसमान से धरती की ओर देखने का रहा है। पुस्तक में साधारण व्यक्तियों, जन समस्याओं, प्रशासनिक अत्याचारों, न्यायिक अनुपलब्धियों, जनोन्मुख राजनीतिक आग्रहों, लोक आंदोलनों और व्यापक नागरिक समाज की उपस्थिति नहीं है। 

नटवर सिंह कहते हैं कि वे अल्पकालीन-निराशावादी और दीर्घकालीन-आशावादी हैं। उसका सामाजिक अर्थ यह भी है कि मौजूदा भारतीय समय अनुकूल न हो, तब भी देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। वैसे यह जुमला बहुत घिसा-पिटा है। पुस्तक की भूमिका कहती है कि नैतिक पतन, संस्थाओं का क्षरण, कार्य-अपसंस्कृति, गहराता उपभोक्तावाद और थोक में भ्रष्टाचार जैसे कारण प्रगति का रास्ता रोकते हैं। सार्वजनिक महत्त्व के इन मुद््दों को नटवर सिंह गंभीर और वैचारिक आत्मकथा के शिल्प में भी दे सकते थे। क्या ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ के मसीहा या अपने भाषणों और लेखों में अपना जीवन कहते विवेकानंद और खुद नेहरू की कृति ने मानवीय चुनौतियों का तात्त्विक विश्लेषण ‘बहुजन हिताय’ अर्थों में नहीं किया है? 

पुस्तक कनफुसिया करती है कि लेखक विश्व के बड़े राजनयिकों, संस्कृतिकमिर्यों, लेखकों और प्रशासकों की आत्मीय सोहबत में रहा है। दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में उसने पुस्तक को विश्वसनीय और विक्रय-योग्य बनाने के लिए कई रंगीन चित्र भी शामिल किए हैं। पाठकों को केवल चित्र देख कर बूझना चाहिए कि नटवर सिंह इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ, मार्गरेट थैचर, रोनाल्ड रीगन, जॉर्ज बुश, डेंग जिआओ पिंग, फिदेल कास्त्रो, यासिर अराफात, नेल्सन मंडेला, गोर्बाच्येव, जेआर जयवर्धने, जियाउल हक और जुल्फिकार अली भुट््टो सहित मशहूर लेखकों ग्रैबियल गार्सिया मारक्वेज, अहमद अली, मुल्कराज आनंद, आरके नारायण आदि से लगभग अंतरंग रूप से परिचित रहे हैं।       

यह किताब कोई घनीभूत विचार श्रृंखला नहीं बुनती। आधे से ज्यादा पृष्ठों में तो नेहरू-गांधी परिवार की शासकीय और निजी निकटता का वितान है। जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी नटवर के उपचेतन के मुख्य कब्जेदार हैं। खुद को भारत-चीन मैत्री के प्रमुख शिल्पकारों में बताते नटवर सिंह ने माओ त्से तुंग और चाउ एन लाई को भी विस्तार में रेखांकित करने का प्रयास किया है। वे भूमिका में एक वरिष्ठ और अनुभवी बुद्धिजीवी होने का आश्वासन देते बार-बार फिसल जाते हैं। तब उनकी सुविचारित गढ़ी हुई सूक्तियां जीवन की गंभीरता का गायन करने के बदले चटखारों में लहलहाने लगती हैं।

इसके बावजूद आत्मकथा को नटवर सिंह ने दिलचस्प ढंग से कहने का प्रयत्न तो किया है। उसमें किस्सागोई का तराशा हुआ फन है। सामंती पालन-पोषण, बौद्धिक विकास और सांसारिक उत्कर्ष का संयुक्त अक्स आत्मकथा में आना तो चाहता है, लेकिन कथा-द्वार पर अनिश्चय की मुद्रा में बैठे आशंकित नटवर सिंह उन सबको प्रवेश देकर भी बार-बार बेदखल कर देते हैं।

इस पुस्तक की शुरुआत में ही नटवर सिंह ने महान ग्रीक विचारक प्लेटो का यह कथन उद्धृत किया है कि अपरीक्षित जीवन जीने के लायक ही नहीं है। इस आप्त कथन का पुस्तक के कथाविन्यास से कोई रिश्ता उद्घाटित नहीं होता। उन्होंने खुद को जांचने-परखने या आत्मपरीक्षित करने की जरूरत नहीं समझी। जवाहरलाल नेहरू की तारीफ में कुछ विशेषणों के कसीदे काढ़ने के बाद नटवर सिंह नेहरू की तीन बुनियादी गलतियों का खुलासा मनोयोग और विस्तार से करते हैं। खुद को किसी जमाने में नेहरूवादी घोषित करने वाले नटवर सिंह ने नेहरू के योगदान को लेकर कोई वैचारिक तर्कमहल अज्ञात कारणों से खड़ा नहीं किया। 

नटवर सिंह जैसे वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ से कुछ महत्त्वपूर्ण प्रस्थापनाओं की उम्मीद भी उत्सुक पाठक करना चाहते होंगे, लेकिन वैसा कोई खुलासा या तफसील नहीं है। मसलन ईरान, पाकिस्तान, अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, रूस आदि देशों से भविष्य की कूटनीति को पुराने अनुभवों के आधार पर किस तरह संयोजित किया जाए इसका कोई संकेत नहीं है। नटवर सत्य और साहस के स्वघोषित पुजारी हैं। पुस्तक में तथ्यों का विवरण किसी बड़े नैसर्गिक सत्य की ओर ले जाने का प्रयास लेकिन नहीं करता। उनके खुद के विवरण में कई बार साहसिक हो जाने की संभावनाएं दर्ज हैं, पर हकीकत में उनसे बच निकलने के दृष्टांत हैं। 

किताब का सबसे पठनीय अंश उसकी भूमिका है। पुस्तक पत्नी हेम को समर्पित है। उनके बिना


वे अपना अस्तित्व अधूरा समझते हैं। पत्नियों को तो लगभग आधे से अधिक लेखकों ने अपने-अपने ग्रंथ समर्पित किए हैं। दिलचस्प है कि पत्नी का बहुत संक्षिप्त उल्लेख ही नटवर सिंह ने किया है। वे निजी कुलीनता को सामाजिक क्रियाशीलता में अंतरित करने की गुहार लगाते हैं। यह उन्होंने अपने जीवन में तो नहीं किया है। वे चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए। जीवन की तमाम उपलब्धियोंं और श्रेष्ठि वर्ग के अविभाज्य अंग बने रह कर वे अब तक रजत चटुई चूसते ही रहे हैं। उनकी किताब में गरीब का पसीना, झोपड़पट्टियों के आसपास बहती मोरियों की बदबू, सांप्रदायिक दंगों में चीखती आवाजें़, सरहद पर सिर कटाते जवानों का बहता लहू, निस्संग या ब्याह का दुख बयान करती औरतें, होटलों में जूठी प्लेटें उठाते नाबालिग बच्चे, आत्महत्या करते किसान, अस्पताल के दालान में मौत से लड़ते सहमे मरीज, राशन दुकानों की कतारें, रोजगार-कार्यालयों के आगे बेरोजगारों के जत्थे- इन सबका कहीं अता-पता नहीं है। 

लिखने में संकोच हो रहा है, लेकिन नटवर सिंह की किताब में कूटनीतिक स्तर की बैठकें, तमाम देशों की यात्राएं, वातानुकूलित कमरों के वार्तालाप, हवाई जहाज या मोटरगाड़ियों की दौड़ती धमक, तरह-तरह के यंत्रों से चालित दुनिया की गहमागहमी, कभी-कभी श्रेष्ठ संस्कृतिकर्मियों, लेखकों से स्मरणीय मुलाकातें वगैरह ठीकठाक वर्णित हैं। वे भारतीय राजनयिकों में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों में शुमार हैं। उनका लेखक-मित्र परिवार बहुत बड़ा है। वह श्रेष्ठतम प्रकृति का भी है। नटवर सिंह गुणग्राहक और पुस्तक-संग्राहक भी हैं। वे विविध कलाओं के बारे में जानकारी रखने वाले प्रबुद्ध व्यक्ति हैं। 

बौद्धिक प्रगल्भता के चलते नटवर सिंह रूसो के महान कथन ‘प्रत्येक मनुष्य आजाद ही पैदा होता है’ को मौजूदा हालात में संशोधित कर देना चाहते हैं। रूसो का कालजयी वाक्य संशोधन-योग्य नहीं है क्योंकि वह नटवर सिंह के संभावित सुझाव को पहले से अंतर्निहित किए हुए है। थॉमस कार्लाइल ने दुनिया के इतिहास को केवल महापुरुषों के जीवन का समानार्थी बताया था। नटवर उसे भी सुधारना चाहते हैं। कार्लाइल का कथन अलगनी पर फैलाया हुआ धुला कपड़ा नहीं है जिस पर नटवर की इस्तरी चल सके। फिर भी लेखक नटवर सिंह के तर्क स्वायत्त हैं। प्रत्येक लेखक के होते हैं। वे जिरह मांगते हैं। उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। 

इतिहास नटवर सिंह का प्रिय विषय है। वहां वे वामपंथी डीडी कोसांबी, इरफान हबीब और रोमिला थापर की त्रिमूर्ति को स्थापित करते हैं। बुद्ध, अशोक, गुरुनानक, अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, नेल्सन मंडेला उनके प्रेरक हैं, मैकियावली और मार्क्स नहीं। नटवर ने पूरी जीवन कथा में खुद को अमेरिका-विरोधी प्रचारित किया है। यहां तक कि राजीव गांधी की मंत्रिपरिषद में उन्हें शामिल किए जाने को लेकर अमेरिका ने अड़ंगे लगाए थे। कहते हैं कि उन्होंने कई बार अपने दोस्तों को धता बताई, क्योंकि दोस्तों ने भी उन्हें नीचा दिखाया। उन्होंने समय-समय पर अर्जुन सिंह और जयराम रमेश को सोनिया के कोप से बचाने का भी दावा किया है। यह हैरत की बात है कि लालबहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व से नटवर सिंह बेरुख रहे। 

एक जगह नटवर सिंह ने लिखा है कि सोनिया और प्रियंका उन्हें संकेत देने आई थीं कि 2004 में सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री बनने से इनकार करने की पृष्ठभूमि का खुलासा न किया जाए। नटवर सिंह ने लेखकीय स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया। पर उनका तथाकथित खुलासा ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ से ज्यादा कुछ नहीं है। एक पुत्र ने अपनी मां को भावनात्मक आधार पर प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया तो क्या पुत्र प्रेम भी मां की अंतरात्मा का हिस्सा नहीं हो सकता? यह शोशा छोड़ कर उन्होंने भाजपा-साम्राज्य के निकट जाने का प्रयास किया है ऐसा आरोप लग सकता है। उनकी बहुचर्चित और स्वप्रचारित आत्मकथा खत्म करते हुए दिमाग के सीडी प्लेयर पर लोकप्रिय फिल्मी गीत बजने लगता है ‘अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू कहां खतम, ये मंजिलें हैं कौन सी, न वो समझ सके न हम।’ यहां ‘वो’ से अर्थ पाठकों से है। 

नटवर सिंह की किताब में आत्मप्रशंसा की हिचकियां लेती भुरभुरी है। आलोचनाएं निंदा की परिधि तक निस्संकोच चली जाती हैं। गणित के सूत्रों की तरह कई निष्कर्ष निकाले गए हैं। वहां साधन के गलत हो जाने के कारण साध्य तक पहुंचने का भ्रम भी है। अंतर्विरोध, असंगतियां, विरोधाभास और अस्पष्टताएं भी महान साहित्यिकता का लक्षण हो सकती हैं, अगर उनमें मानवीय उदात्तता की छौंक लगा दी जाए। नटवर सिंह कई बार ऐसा जोखिम उठाते तो हैं लेकिन एक प्रामाणिक लेखक होने के बदले भावनाओं के उद्रेक में बह कर उसे ही आत्मा का बयान समझ लेते हैं।


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