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वे उनचास दिन PDF Print E-mail
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Monday, 25 August 2014 11:57

अजेय कुमार

जनसत्ता 25 अगस्त, 2014 : दिल्ली के चांदनी चौक में अक्सर बहुत भीड़ होती है। वहां जाने के लिए आमतौर पर ऑटो वाले राजी नहीं होते। मैंने हिचकिचाते हुए एक आॅटो वाले से पूछा- ‘चांदनी चौक चलोगे?’ उसने ‘हां’ कहा तो मैंने पूछा- ‘कितने पैसे लोगे?’ बोला- ‘आप बैठिए तो चचा, पैसे भी आ जाएंगे।’ बैठने के बाद देखता हूं, ड्राइवर ने अरविंद केजरीवाल की फोटो ऊपर शीशे के पास लगा रखी है, जहां हनुमान, दुर्गा या मक्का-मदीना की तस्वीर देखने को मिलती है। मैंने ड्राइवर से पूछा- ‘आपने केजरीवाल की तस्वीर...!’ इससे पहले कि मेरा वाक्य पूरा हो, वह बोल उठा- ‘उसका नाम मत लो!’ मैंने कहा- ‘अरे भाई, ऐसा क्या कर दिया उसने?’

कड़वे लहजे में उसने कहा- ‘भाग गया! हमने उसे क्या इसलिए वोट दिया था...! एक आॅटो वाले ने जो तमाचा उसकी गाल पर जड़ा था, उसने सही किया था! वह इसी के लायक था!’ मैंने कहा- ‘बाद में उसने माफी भी तो मांगी थी!’ ‘जी, वह भी ठीक किया उसने।’ कुछ समय बाद ड्राइवर ने फिर चुप्पी तोड़ी- ‘कुछ भी कहो, आदमी था बहुत नेक। उन दिनों किसी ट्रैफिक वाले ने हमें तंग नहीं किया। हमने गलत किया तो चालान काटा, लेकिन अपनी जेब नहीं भरी।’ मैंने पूछा- ‘अब क्या हो रहा है?’ उसने कहा- ‘उनके तो अच्छे दिन आ गए हैं। ट्रैफिक वाले बेधड़क पैसे मांगते हैं। अब तो वे मुंह भी ज्यादा खोलने लगे हैं। हमारे लिए तो चचा बुरे दिन ही अच्छे थे!’

मैंने हैरानी जताई- ‘तुम्हें लगता है भ्रष्टाचार बढ़ा है?’ ड्राइवर ने जवाब दिया- ‘लगता नहीं साब, हमलोग तो रोज भुगतते हैं। मेरा बाईस गज का प्लॉट है। सोचा मकान बना लूं। बच्चा जवान हो रहा है। शादी-ब्याह के बाद कहां रहेगा! छत डालने का रेट मालूम है आपको?’ मैंने कहा- ‘नहीं।’ वह आगे बोला- ‘कॉलोनी में जब भी कोई छत डालता है तो पुलिस वाले आ धमकते हैं। मेरे पड़ोसी ने जब अपना मकान बनवाया था, आज से पांच साल पहले, तब वे दस हजार ले गए थे। मुझसे उन्होंने बीस हजार झटक लिए। मैंने कांस्टेबल के सामने हाथ-पांव जोड़े तो कहने लगा कि मुझे तो एक हजार ही मिलने हैं, बाकी तो ऊपर वाले ले जाते हैं। उसने एक बात और बताई कि उस थाने में कमाई अधिक होने के कारण एसएचओ ने रिश्वत देकर अपनी नियुक्ति वहां करवाई थी। अब उसकी भी मजबूरी है कि वह दो नंबर की कमाई करे। मैंने जब मकान बनाना शुरू किया था तो दिल्ली में केजरीवाल की सरकार थी। अभी छत पड़ी नहीं थी कि जनाबे-आली भाग खड़े हुए!’

जब मैंने पूछा कि तो इसलिए उसके भागने का


दुख है आपको, तब उसने कहा- ‘मुझे ही नहीं, मुझ जैसे लाखों को। मेरा बड़ा भाई सलीम जाफराबाद में रेहड़ी-पटरी पर केले बेचता है। जब केजरीवाल की सरकार थी, तो मजाल है कि पुलिस वाले कुछ कह जाएं। मेरा भाई उन दिनों पुलिस वालों से मजाक में कहता था कि साहब और कुछ न सही, बच्चों के लिए केले ही ले जाओ। लेकिन उन दिनों केले तो दूर, एक पैसे की भी रिश्वत उन्होंने नहीं ली। अब फिर से उनकी वसूली चालू है। हर दुकानदार या रेहड़ी वाले से न केवल अब के, बल्कि जिन उनचास दिनों तक केजरीवाल की सरकार थी, उसकी बकाया भी उन्होंने वसूल ली।’

मैंने बात आगे बढ़ाई- ‘ई-रिक्शा बंद होने से तो आप आॅटो वालों को फायदा हुआ होगा?’ उसने कहा- ‘हम किसी की रोजी-रोटी छिनने से खुश क्यों होने लगे? दो पैसे उन्हें मिल रहे थे, जैसे-तैसे गुजर हो रही थी, अब इस महंगाई में वे कैसे परिवार का पेट पाल रहे होंगे? मेरा छोटा भाई यही बैटरी-रिक्शा चलाता था। अब मनहूस घर बैठा है। उसे और उसके परिवार को भी मुझे देखना पड़ता है।’ मैंने आखिर में पूछा- ‘दिल्ली में चुनाव हों तो किसे वोट दोगे?’ वह केजरीवाल की फोटो की तरफ देखते हुए बोला- ‘इसी को!’

कहीं पढ़ा था कि जिनसे आप बहुत प्यार करते हैं, वही आपको दुख भी पहुंचाते हैं। चांदनी चौक आ गया था। मीटर से पचपन रुपए बनते थे, मैंने साठ रुपए दिए और कहा- ‘पांच रुपए रख लो।’ उस खुद्दार ने मुस्कराते हुए पांच रुपए का सिक्का मेरे हाथ पर रख दिया। उसका वह मुस्कराता चेहरा आज भी मेरी आंखों के सामने है। सोचता हूं कि एक आम आदमी किस तरह दिल में परिवर्तन की चाह लिए एक ईमानदार जुझारू राजनीतिक नेतृत्व से जुड़ाव महसूस करने लगता है। असली प्रश्न उसका विश्वास हासिल करने और उसे कायम रखने का है।


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