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FILM REVIEW: फिल्मी पर्दे पर रानी है 'मर्दानी' PDF Print E-mail
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Monday, 25 August 2014 11:43


निर्देशक-प्रदीप सरकार

लाकार- रानी मुखर्जी, जिसू सेनगुप्ता, ताहिर भसीन


प्रेम बहुत कुछ कराता है। जिसमें एक ये हो सकता है कि वो प्रेमिका (जो पत्नी बन चुकी हो) को किसी फिल्म की हीरोइन बनाने के लिए अपने प्रॉडक्शन हाउस का रिवाज बदल दे।असल में ऐसा ही हुआ है। ‘यशराज फिल्म्स’ अब तक मोटे तौर पर रोमांटिक और पारिवारिक फिल्में बनाता रहा है। लेकिन इस बार आदित्य चोपड़ा ने अपनी पत्नी रानी मुखर्जी के लिए जिस ‘मर्दानी’ फिल्म का निर्माण किया है इसमें ऐसी बोल्डनेस है जो बॉलीवुड में कम ही पाई जाती है। इसीलए ये वयस्क सर्टिफिकेट वाली है और जिसमें ऐसे दृश्य और संवाद हैं जो बच्चों और परिवार के लिए तो बिलकुल नहीं है। पर साथ ये भी एक सोदेश्य फिल्म है और एक ऐसी समस्या को सामने लाती है जो कई कानूनों के बावजूद विकराल रूप धारण कर रही है।

रानी मुखर्जी ने इसमें शिवानी शिवाजी राय नाम के एक ऐसी महिला पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार निभाया है जो लड़कियों के अवैध कारोबार करनेवाले गिरोह का न सिर्फ भंडाफोड़ करती है बल्कि अपनी जान की बाजी लगाकर उसके सरगना तक पहुंच जाती है। शिवानी पुलिस महकमें में काम करते हुए जो पुलसिया-भाषा बोलती है उसमें गाली गलौच वाले शब्द भी होते हैं लेकिन उसके अंदर एक ऐसा दिल है जो एक अनाथ लड़की प्यारी को सहारा देता है। और जब इसी प्यारी का अपहरण हो जाता है तो वो जी-जान लगाकार उस गिरोह से जुड़ी तमाम पहेलियों को सुलझाती हुई तारे तंत्र को छिन्न भिन्न करती है। हालांकि पुलिस महकमे के लोग उसके साथ होते हैं लेकिन ये शिवानी के भीतर का जज्बा है तो इन


अपराधियों के पास पहुंच जाता है जो बेरहम तो हैं ही साथ ही चालाक और धूर्त हैं।

फिल्म में बताया गया है इसकी कहानी एक वास्तविक कहानी से प्ररित है। हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि ये विजया शांति की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘तेजस्विनी’ से प्रेरित है जिसके एक गाने में मर्दानी शब्द का इस्तेमाल हुआ था। गाने के बोल इस तरह से थे ‘बन कर आंधी तूफानी, लड़ती जा जुलुम से मर्दानी’। वैसे मर्दानी शब्द सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘झांसी की रानी’ में शायद सबसे पहले आया है। खैर कही से भी प्रेरित हो,‘मर्दानी’ में ‘ दबंग’ और ‘सिंहम’ जैसा वजन है जो क्रमश; सलमान  खान और अजय देवगन की मुख्य भूमिका वाली फिल्में हैं और जो पुलिस वाले किरदार को केंद्र में रखकर बनाई गई हैं।

 निर्देशक प्रदीप सरकार ने इसे ऐसी फिल्म के रूप में बनाया है जिसमें फिल्मी मसाले कम हैं। सिर्फ एक गाना है वो भी आखिर में आता है। फिल्म में खलनायक भी ऐसे रखे गए हैं जो पारंपरिक खलनायकों की छवि से अलग हैं और जो समाज में सामान्य नागरिक की तरह रहते हैं। उनका खलनायकों जैसा कोई मैनरिज्म नहीं है। रानी मुखर्जी अब अपने जीवन के उस दौर में हैं जब कोई रोमांटिक भूमिका न करना चाहें। आखिर वे बॉलीवुड के सबसे बड़े निर्माता की पत्नी हैं। इसीलिए अब उनके लिए ऐसी भूमिकाएं लिखी जा रही हैं जो हीरोइनों की जानी पहचानी भूमिकाओं से अलग है और दमदार हैं।

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