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प्रकृति की चेतावनी PDF Print E-mail
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Friday, 22 August 2014 11:29

जनसत्ता 22 अगस्त, 2014 : इन दिनों पहाड़ी राज्यों और उनसे सटे मैदानी हिस्सों में बादल फटना, भूस्खलन, बाढ़ आदि का कहर अपने चरम पर है। कहने को तो भले ही इसे आसमानी सुनामी करार दिया जा रहा है लेकिन गहराई से देखा जाए तो इसके लिए प्रकृति कम इंसान अधिक जिम्मेदार है। दरअसल विकास की धारा बहाने के चक्कर में प्रकृति के संतुलन की परवाह नहीं की गई। बांध बनाने के लिए नदियों की धारा मोड़ने-रोकने, नदियों के बहाव क्षेत्र (पेटा) में होटल, रेस्टोरेंट, बहुमंजिले फ्लैटों का निर्माण, वनों का अंधाधुंध विनाश, सड़क निर्माण, वैध-अवैध खनन के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल, आदि के कारण पहाड़ी इलाकों का संतुलन भंग हो गया। जो बरसाती नदियां बारिश की पानी की निकासी के लिए अहम होती थीं, उनके पाटों पर कब्जा कर घर बना दिए गए। इससे कई बरसाती नदियां हमेशा के लिए लुप्त हो गर्इं। इसी का नतीजा है कि नदियों में पानी का सैलाब पल भर में तबाही मचा देता है। 

आज दुनिया नदियों के किनारे बने घरों और होटलों को ढहते, लोगों को बाढ़ के पानी से जद्दोजहद करते और डूबते हुए देख रही है; लेकिन यहां सबसे अहम सवाल है कि पहाड़ी क्षेत्रों और नदियों के किनारे ऐसे विनाशकारी निर्माण की अनुमति क्यों दी जाती है जबकि सब जानते हैं कि बारिश के दिनों में नदियां उफान मारेंगी ही। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्षों पहले राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वे गंगा नदी के दोनों ओर 200-200 फीट तक किसी भी तरह के निर्माण कार्य की अनुमति न दें। लेकिन राज्य सरकारों ने इन निर्देशों को नहीं माना। अब जब नदियां खुद प्राकृतिक तरीके से अतिक्रमण हटा रही हैं तो अफरातफरी मच गई है। देखा जाए तो यह अतिक्रमण के विरुद्ध प्रकृति की चेतावनी है कि अब भी विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़ बंद नहीं की गई तो इसके भयावह नतीजे सामने आएंगे।

नदियों के प्राकृतिक बहाव को तटबंधों से रोकने की राज्य सरकार की कवायद भी बाढ़ की विभीषिका को बढ़ा रही है। इस नीति पर योजना आयोग भी सवाल उठा चुका है। आयोग ने राज्य सरकारों


को चेतावनी दी थी कि ऐसे निर्माण नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में न सिर्फ बाधा डालते हैं, बल्कि इनसे प्राकृतिक तौर पर बनने वाले डेल्टा और बाढ़ के पानी की निकासी के रास्ते बंद हो जाते हैं। योजना आयोग राज्य सरकारों को बार-बार आगाह कर चुका है कि उन्हें ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे नदियों को खुद का बहाव तंत्र तैयार करने में बाधा न आए। लेकिन विकास की धारा बहाने में जुटी राज्य सरकारों ने इस दूरगामी सुझाव को कूड़ेदान में फेंक दिया।   

प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है कि जैसे-जैसे उसके संतुलनकारी ढांचे को तहस-नहस किया जा रहा है वैसे-वैसे प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती जा रही है। ऐसे में आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत बनाने के साथ-साथ हमें यह भी देखना होगा कि विकास के साथ प्रकृति का सामंजस्य बना रहे। पहले तालाब, कुएं, पेड़-पौधे, नदी आदि जीवन का अभिन्न अंग हुआ करते थे, लेकिन आधुनिकता की होड़ में इन्हें अनुपयोगी मान लिया गया। उदाहरण के लिए, पेड़ बारिश के पानी को स्पंज की तरह सोख लेते थे लेकिन वे तेजी से कट रहे हैं। इसी का नतीजा है कि जरा-सी बारिश से नदियां उफन जाती हैं और रेल लाइनें और  सड़कें पानी में डूब जाती हैं। स्पष्ट है, समूची विकास नीति पर पुनर्विचार का समय आ गया है।

रमेश कुमार दुबे, मोहन गार्डन, दिल्ली


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