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विरोध और मर्यादा PDF Print E-mail
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Friday, 22 August 2014 11:23

जनसत्ता 22 अगस्त, 2014 : कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किसी भी कार्यक्रम में शामिल न होने का फैसला देश के संघीय ढांचे और लोकतंत्र की मर्यादा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। हरियाणा के कैथल में प्रधानमंत्री की सरकारी सभा में मंच पर उपस्थित मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड््डा का जिस तरह लोगों ने तीखा विरोध किया, वह निस्संदेह दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे पहले पिछले हफ्ते महाराष्ट्र के सोलापुर में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में वहां के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के साथ भी लोगों ने ऐसा ही व्यवहार किया। इन घटनाओं से आहत होकर दोनों मुख्यमंत्रियों ने एलान कर दिया कि वे प्रधानमंत्री के किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने भी अपने सभी मुख्यमंत्रियों को ऐसा ही करने का निर्देश दे डाला। उसने दूसरे विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों से भी अपील की है कि वे प्रधानमंत्री के किसी कार्यक्रम में शरीक न हों। इसके बाद गुरुवार को झारखंड के मुख्यमंत्री के साथ भी प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में वही सिलसिला नजर आया। प्रधानमंत्री के जिन कार्यक्रमों में संबंधित मुख्यमंत्रियों के साथ सभा में उपस्थित लोगों ने अपमानजनक व्यवहार किया, वे सरकारी आयोजन थे, किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम नहीं। मगर विचित्र है कि इस तकाजे को दोनों पक्ष ने समझने की जरूरत नहीं समझी कि सरकारी कार्यक्रम को राजनीतिक आयोजन बनाने से बचा जाए। 

हरियाणा में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। इसलिए वहां प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के राजनीतिक रूप ले लेने की आशंका पहले से थी। पर न तो मुख्यमंत्री ने इस बात का ध्यान रखा कि सरकारी कार्यक्रम के मंच को वे अपनी उपलब्धियां गिनाने का जरिया बनाने से बचें और न भाजपा नेताओं ने इस मर्यादा का पालन किया। जब लोग शोर मचा कर मुख्यमंत्री का विरोध कर रहे थे, तब प्रधानमंत्री ने भी उन्हें ऐसा करने से नहीं बरजा, मुस्करा कर शांत रहने की हल्की औपचारिक अपील भर की। वे भले अपने दल के प्रमुख नेता हैं, पर सरकारी कार्यक्रम में उनसे दलगत भावना से ऊपर उठ कर व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। संघीय ढांचे में मुख्यमंत्रियों के सहयोग के बगैर केंद्रीय कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी भी कह


चुके हैं कि वे सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मिल कर विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाएंगे। मगर जिस तरह भाजपा समर्थकों के व्यवहार के चलते यह संकल्प बाधित होता नजर आने लगा है, वह किसी गलत परंपरा का रूप न ले ले, उससे बचने के लिए प्रधानमंत्री को भी अपने सरकारी कार्यक्रमों की मर्यादा निर्धारित करनी होगी। सरकारी मंच के सियासी इस्तेमाल की आशंका को ध्यान में रखते हुए ही बिहार के मुख्यमंत्री ने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था कि उन्हें चुनाव वाले राज्यों में अपने सरकारी कार्यक्रमों से बचना चाहिए। 

यह पहली बार नहीं है, जब केंद्र सरकार को राज्यों में दूसरे दलों की सरकारों के साथ तालमेल बिठा कर चलना पड़ रहा है। सरकारी धन के आबंटन और योजनाओं आदि को लेकर दोनों के बीच टकराव की स्थितियां भी पैदा होती रही हैं, मगर प्रधानमंत्री के सरकारी मंच को राजनीतिक या चुनावी मंच बनाने की कोशिश इस तरह कभी नहीं देखी गई। इस मामले में दोनों पक्षों से सतर्कता और विनम्रता बरतने की अपेक्षा की जाती है। जिस तरह कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों के बहिष्कार का निर्देश दिया है, उससे गलत परंपरा पड़ सकती है। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री का उपस्थित रहना लोकतांत्रिक शिष्टाचार के तहत जरूरी होता है। लोकतंत्र और संघीय ढांचे का तकाजा यही है कि सरकारी कार्यक्रमों में दलगत टकराव की स्थितियों को टालने के उपाय तलाशे जाएं। 


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