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बीकेएस आयंगार PDF Print E-mail
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Friday, 22 August 2014 11:23

जनसत्ता 22 अगस्त, 2014 : उनका बचपन जानलेवा बीमारियों से ग्रस्त रहा और उनके बारे में डॉक्टरों ने घोषणा कर दी थी कि वे ज्यादा से ज्यादा बीस साल की उम्र तक जी पाएंगे, मगर उन्होंने योग के बल पर इस भविष्यवाणी को गलत साबित कर दिया। बेल्लूर कृष्णमाचार सुंदरराजा आयंगार को उनके पिता ने बीमारियों से उबरने के लिए योग सीखने पुणे भेज दिया था। फिर योग ही उनके व्यक्तित्व का सबसे अहम हिस्सा हो गया, जो आखिरी सांस तक उनके साथ रहा। उनकी जिंदगी में योग क्या महत्त्व रखता था, इसके बारे में उन्होंने कभी कहा था कि बीस साल के बाद का उनका जीवन योग से मिला हुआ बोनस है। लेकिन आयंगार ने अपने जीवन के लिए अहम साबित हुए योग को खुद तक समेट कर नहीं रखा। आज से पांच-छह दशक पहले योग को भारत से बाहर ले जाकर ख्याति दिलाने वाले लोगों में आयंगार का नाम सबसे ऊपर है। 

योग की कक्षाओं को लेकर बेहद सख्त और अनुशासनप्रिय रहे आयंगार ने एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखीं, जिनमें ‘लाइट आॅन योग’ को दुनिया भर में योग का बाइबिल माना जाता है। इस मामले में आयंगार दुनिया भर में इस कदर प्रसिद्ध हुए कि आॅक्सफर्ड डिक्शनरी में आयंगार संज्ञा का अर्थ ‘अष्टांग योग की एक शाखा’ की तरह दर्ज कर दिया गया। दरअसल, उन्होंने जिस अष्टांग योग की विभिन्न अवस्थाओं पर आधारित शिक्षा हासिल की थी, वही अब ‘आयंगार योग’ के नाम से जाना जाता है। अपनी इसी खास शैली की वजह से आयंगार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि मिली और आज सत्तर से ज्यादा देशों में उनके शिष्यों की तादाद लाखों में है। हालांकि उन्हें खुद भी नहीं पता था कि उनके शिष्यों की संख्या इतनी बड़ी है। तीन साल पहले जब वे चीन गए तो खुद को अपने अनुयायियों से घिरा पाकर वे हैरान रह गए थे। उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि चीन में उनके लगभग तीस हजार अनुयायी हैं और उनकी तमाम किताबों की अनूदित प्रतियां सभी जगह आसानी


से मिल रही थीं। शायद यही देख कर उन्होंने कहा था कि अगर चीन योग के क्षेत्र में भारत से आगे निकल जाए तो उन्हें आश्चर्य नहीं होगा। 

उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहले से ही योग की जानकारी रखने वाले वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन ने खुद को आयंगार का शिष्य घोषित किया और कहा था कि ये मेरे वही गुरु हैं, जिनका वे इंतजार कर रहे थे। बताया जाता है कि उन्होंने बेल्जियम की महारानी को अस्सी साल की उम्र में शीर्षासन सिखाया था। पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित होने और इतनी ऊंचाई तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपने भीतर की संवेदनशीलता और उदारता को हमेशा बचाए रखा। लेकिन इन सबके अलावा उनका महत्त्व इस बात में भी है कि उन्होंने योग को किसी खास धर्म की पहचान से आजाद कराया और वर्ग या जाति के बजाय योग तक सबकी पहुंच को आसान बनाया। कभी भी इसे व्यवसाय नहीं बनाया, जैसे आज कई योगगुरु करते देखे जाने लगे हैं। अब आयंगार नहीं हैं, लेकिन भारत में योग को एक खास धर्म के प्रतीक और राजनीति के लिए जिस तरह कुछ बाबा या राजनीतिक दल इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें आयंगार से सीखना चाहिए। 


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