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विपक्ष की जगह PDF Print E-mail
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Thursday, 21 August 2014 11:34

जनसत्ता 21 अगस्त, 2014 : आखिरकार लोकसभा अध्यक्ष ने कांग्रेस की यह मांग ठुकरा दी कि सदन में उसके नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रतिपक्ष के नेता की मान्यता दी जाए। उनका यह निर्णय परिपाटी के अनुरूप भले हो, हमारी संसदीय प्रणाली की मजबूती के लिए ठीक नहीं है। फिर, वैधानिक दृष्टि से भी इस फैसले को पूरी तरह उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। लोकसभा में विपक्ष के नेता-पद का मुद्दा बजट सत्र की शुरुआत से ही कांग्रेस और सत्तापक्ष के बीच तनातनी का विषय बना रहा है। लिहाजा, लोकसभा अध्यक्ष ने इस मामले में निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले महाधिवक्ता की भी राय ली। खबर है कि सुमित्रा महाजन ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर कांग्रेस की मांग नामंजूर करने केपीछे दो खास कारण बताए हैं। एक यह कि कांग्रेस लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष की दावेदारी की शर्त पूरी नहीं करती। उन्होंने परिपाटी का हवाला देते हुए बताया है कि इस पद के लिए लोकसभा में संबंधित पार्टी के पास कम से कम दस फीसद सीटें होना जरूरी है। पांच सौ तैंतालीस सदस्यीय लोकसभा में कांग्रेस के चौवालीस सदस्य हैं। यह आंकड़ा लोकसभा की कुल सदस्य-संख्या के दस फीसद से कम है। सुमित्रा महाजन ने दूसरे कारण के तौर पर महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी की राय का उल्लेख किया है। रोहतगी ने भी पिछले दिनों यही तर्क पेश किया था कि नेता-प्रतिपक्ष के दर्जे के लिए कम से कम दस प्रतिशत सीटें होना जरूरी है। 

जाहिर है, महाधिवक्ता ने भी परिपाटी को ही अपने सुझाव का आधार बनाया है। लेकिन 1977 में बने नेता-प्रतिपक्ष के वेतन-भत्तों और अन्य सुविधाओं से संबंधित कानून ने इस चलन को ढीला करने की गुंजाइश पैदा की। इस कानून में लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता को नेता-प्रतिपक्ष मानने की बात कही गई है, इसमें न्यूनतम दस फीसद सीटों का कोई प्रावधान नहीं है। विडंबना यह है कि आज कांग्रेस अपने पक्ष में इस कानून की दुहाई दे रही है, पर उसने खुद इसका पालन नहीं किया। राजीव गांधी को चार सौ पंद्रह सीटों के साथ अपूर्व बहुमत मिला था। तब भी विपक्ष की कोई पार्टी दस फीसद सीटों तक नहीं पहुंच पाई थी। उस समय लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी


पार्टी तेलुगू देशम थी और इसी आधार पर वह सदन में अपने नेता पी उपेंद्र को नेता-प्रतिपक्ष का दर्जा देने का आग्रह करती रही। लेकिन उसकी मांग अनसुनी कर दी गई। तब भी लोकसभा अध्यक्ष और सत्तारूढ़ पार्टी का रुख समान था। तब उस कानून को क्यों नजरअंदाज कर दिया गया जो पहले बन चुका था? लेकिन कांग्रेस ने जो खराब मिसाल पेश की थी, भाजपा या मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष को उसका अनुसरण क्यों करना चाहिए? नेता-प्रतिपक्ष का होना हमारी अनेक महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की साख के लिए भी जरूरी है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, सीबीआइ निदेशक, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति में उसकी राय लेना अनिवार्य बनाया गया है। लोकपाल और प्रस्तावित न्यायिक नियुक्ति आयोग के दो न्यायविद सदस्यों के चयन में भी उसकी राय ली जानी है। 

नेता-प्रतिपक्ष का होना जहां हमारी संसदीय प्रणाली की मजबूती के लिए आवश्यक है, वहीं इन संस्थाओं में सत्तापक्ष की बेजा दखलंदाजी के अंदेशे से निपटने के लिए भी। लोकसभा अध्यक्ष ने अपने निर्णय की बाबत संसदीय परिपाटी का सहारा लिया है, मगर 1977 का नेता-प्रतिपक्ष से संबंधित कानून भी तो संसद से ही पारित हुआ था! फिर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के प्रावधान की अनदेखी क्यों कर दी गई? सुमित्रा महाजन ने कहा है कि सदन चाहे तो परिपाटी और नियम बदले जा सकते हैं। जरूर बदले जाने चाहिए। अच्छा होता कि अपना फरमान सुनाने से पहले उन्होंने इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाई होती। 


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