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परिवहन की तस्वीर PDF Print E-mail
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Thursday, 21 August 2014 11:33

जनसत्ता 21 अगस्त, 2014 : हमारे देश में परिवहन व्यवस्था की जिम्मेदारियां अलग-अलग महकमों में बंटी हुई हैं और उनके बीच आपसी तालमेल ठीक नहीं रहा है। इसके चलते अक्सर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। फिर बदलती स्थितियों के मुताबिक मोटर वाहन अधिनियम में अपेक्षित बदलाव न हो पाने के कारण सड़कों पर पैदा होने वाली समस्याओं को रोकना मुश्किल बना हुआ है। वाहनों के पंजीकरण, वाहन चलाने का लाइसेंस जारी करने आदि में इस कदर भ्रष्टाचार है कि आरटीओ यानी क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय उगाही के अड्डे बन गए हैं। ये बातें खुद केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने स्वीकार करते हुए परिवहन-प्रशासन में सुधार का इरादा जताया है। उन्होंने आरटीओ को समाप्त कर लाइसेंस देने जैसे अधिकतर काम ऑनलाइन संपन्न कराने और यातायात पुलिस, परिवहन निगम, नगर निगम सहित सभी संबंधित एजेंसियों को भू-परिवहन प्राधिकरण नामक एक नए महकमे के अधीन लाने की घोषणा की है। 

आरटीओ के कामकाज पर लंबे समय से अंगुलियां उठती रही हैं। वाहन चलाने का लाइसेंस जारी करने और वाहनों के पंजीकरण आदि में खुली रिश्वतखोरी चलती है। बिना यह जांचे कि किसी व्यक्ति को ठीक से वाहन चलाना आता है या नहीं, कोई व्यक्ति भारी वाहन चलाने के योग्य है या नहीं, बिचौलियों के जरिए या सीधे रिश्वत लेकर उसे लाइसेंस जारी कर दिया जाता है। यह काम कराने वाले कई बिचौलिए तो विज्ञापन देकर ग्राहकों को लुभाने की हद तक चले जाते हैं। यह गोरखधंधा पुराने वाहनों को अतिरिक्त समय तक चलाने का प्रमाणपत्र जारी करने   में भी देखा जाता है। इसी का नतीजा है कि अनाड़ी चालकों और सड़क पर चलने के लायक नहीं रह गई गाड़ियों की तादाद बढ़ती जाती है, जो सड़क-दुर्घटनाओं की एक बड़ी वजह है। बसों में निर्धारित क्षमता से अधिक सवारियों को चढ़ाना और ट्रकों में ज्यादा सामान लादना, तय सीमा क्षेत्र से बाहर तक चले जाना फितरत बन गई है। ‘अघोषित नियम’ के तहत आरटीओ और यातायात पुलिस को कुछ ले-देकर इन मामलों का आसानी से निपटारा हो जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में हर ट्रक चालक साल में


करीब अस्सी हजार रुपए रिश्वत देता है। यानी करीब बाईस हजार करोड़ रुपए हर साल इस तरह घूस में जाते हैं। ऐसे में परिवहन व्यवस्था को सुधारने में आरटीओ को समाप्त करने का फैसला एक अच्छा कदम हो सकता है। 

विदेशों की नकल पर हमने तेज-रफ्तार गाड़ियों के चलने लायक सड़कें, उपरिगामी सेतु, सुरंगी सड़कें आदि तो बनाना शुरू कर दिया है, पर गाड़ी चलाने और यातायात नियमों, मोटर वाहन कानूनों के पालन का सलीका चलन में नहीं ला पाए हैं। यही वजह है कि सड़क दुर्घटनाओं के मामले में हमारा देश दुनिया में पहले नंबर पर है। विकसित देशों में भारी वाहन चलाने का लाइसेंस हासिल करना खासा कठिन होता है, मगर हमारे यहां कोई भी ट्रक और बस का चालक बन जाता है। ऐसे चालकों की भी कमी नहीं है, जो बिना लाइसेंस के बेरोकटोक वाहन चलाते हैं। आरटीओ को भंग करने से इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की उम्मीद की जा सकती है। प्रस्तावित महकमे की जिम्मेदारी केवल लाइसेंस, परमिट आदि जारी करने के अलावा सड़कों की देखभाल, मरम्मत, कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई, परिचालन पर निगरानी आदि की भी होगी। मगर पूरी योजना का खाका अभी साफ तौर पर सामने आना बाकी है। इसलिए फिलहाल कहना मुश्किल है कि परिवहन-प्रशासन का सिर्फ ढांचा बदलेगा या उसका चरित्र भी।   


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