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भाव अभाव PDF Print E-mail
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Thursday, 21 August 2014 11:22

संजीव चंदन

जनसत्ता 21 अगस्त, 2014 : उन्नीसवीं सदी में बंगाली भद्रलोक ने अपनी महिलाओं के ‘भदेस महिलाओं’, यानी निम्नवर्गीय-जातीय महिलाओं से संपर्क खत्म या सीमित करने के कदम उठाए। ऐसा उन्होंने अपनी महिलाओं को अंग्रेज महाप्रभुओं की महिलाओं की तरह ‘सुसंस्कृत’ करने के प्रयास स्वरूप किया। इस क्रम में कथित निम्न जाति की महिलाओं के गीत, नाच चिह्नित कर उनसे परहेज का अभियान निर्दिष्ट हुआ। यह महिलाओं के आपसी सख्य पर प्रहार था। जाति संकीर्णता से जकड़ी महिलाएं भी ‘यजमानी’ से जुड़ी महिलाओं के संपर्क में होती थीं, उनके घर मालिनों, नाइनों, धोबनों, चुल्हारण (चूड़ी, बिंदी टिकली बेचने वाली) और अन्य पिछड़ी जाति की हिंदू या पसमांदा मुसलमान महिलाओं का आना-जाना होता था। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक जरिया भी था।

मगध के गांवों में बीते बचपन के दिनों में अनुभूत यह सख्य आज स्मृति का हिस्सा है। अब कभी-कभी गांव जाने पर विच्छिन्न संबंध का आभास होता है। यह आवाजाही, आपसी सख्य अगर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, तो सीमित जरूर हो गए हैं। शहरों में तो दोस्ती और संबंध के व्यावसायिक और वर्गीय दायरे शहर की विशेषता हैं। नानी के घर एक मुसलमान महिला आती थीं, चूड़ी, टिकली, बिंदी, और महिलाओं के अन्य उपयोगी सामान लेकर। मां और मौसियां उन्हें बुआ कहती थीं। मेरी वे नानी थीं। उनके आने पर आसपास से अलग-अलग जातियों की मेरी कई नानियां, मामियां और मौसियां भी इकट्ठा हो जाती थीं, उनसे कुछ न कुछ खरीदने। रोजे के दिनों में भी वे आती थीं। तब सारी महिलाओं का उनके प्रति आदर भाव बढ़ जाता था और भूखी-प्यासी सामान बेचने की उनकी मजबूरी के प्रति के करुणा भी।

नानी के घर पर ठाकुरवाड़ी था, जिसके लिए मालिन महिलाएं नियमित घर आती थीं। उनके बगीचे में कार्तिक में नवमी के दिन खाने-पीने के आयोजन स्मृति के हिस्से हैं। उससे ज्यादा मां और मौसियों के साथ मालिन स्त्रियों का सखी भाव दर्ज है। वहां दूध-दही, मट्ठा, सब्जी या फल बेचने आती स्त्रियों का मैं प्रिय नाती था, जिसे वे अपनी ओर से दूध-दही खिलाना नहीं भूलतीं थीं। थोड़ी सब्जी मेरे नाम की भी मिल जाती थी। अगर घर के किसी सदस्य के साथ उनके घर जाना हो जाता, तो मेरे प्रति उनका लाड़ और उमड़ता था। नानी का इनसे सखियापा देखते बनता था। उनकी कोशिश होती कि नियमित अंतराल पर आने वाली इन महिलाओं को कुछ खिला-पिला कर ही भेजें या कुछ विशेष दें। अनाज, आम के मौसम में आम या गुड़ के मौसम में गुड़, खासकर उन्हें, जिनके घर ये सब नहीं होते थे। यानी जिनके


पास खेत नहीं थे। दस सालों तक अपनी नानी के घर में उनका इकलौता नाती होने के कारण मेरा दुलार कुछ ज्यादा ही था। पड़ोस की गीता मौसी हो या माधो मामी, सबका स्नेह मुझे उतना ही मिलता था, जितना कि ब्राह्मण और अपनी रिश्तेदार महिलाओं का।

कुछ दूरी भी थी, अघोषित दूरी, जो तब मुझे समझ में नहीं आती थी। लेकिन अब यह दूरी चुभती है। मसलन, अनुकूलन की शिकार वे महिलाएं खुशी-खुशी अपना बर्तन खुद धोती थीं, अगर कभी खाना खाया तब। या पूजा करतीं, खाना खातीं ब्राह्मण स्त्रियों को छूने से वे बचतीं। धीरे-धीरे बड़ा होने और शहर में रहने लगा था तो गांव आने पर, जब उन महिलाओं से मैं मिलता तो उन्हें ‘प्रणाम’ कहता। उनके चेहरे पर खुशी तो होती, लेकिन वे प्रणाम करने से मुझे मना करतीं। कुछ तो हंसते हुए कहतीं- ‘धर्म का बिगाड़ देव बाबू!’

इस चुभने वाले जाति दंश से वे इतना अनुकूलित हो चुकी होतीं कि उन्हें यह सब सहज लगता। यहां अनुकूलन दोतरफा था, जिससे सवर्ण स्त्रियां भी बंधी थीं। इसके साथ उनका सख्य सामाजिक-सांस्कृतिक सख्य भी बनाता था। सवर्ण घरों में विवाह के अवसर पर गाया जाने वाला झूमर या खेला जाने वाला डोमकच इस आपसी सख्य का ही प्रतिफल है। अब तो बंगाल की तरह गांवों में भद्र-भदेस का यह बंटवारा बढ़ता जा रहा है। उससे ज्यादा दुखद है, गांवों में उन महिलाओं के ऊपर भी भद्रता का थोपा जाना, जो सवर्ण महिलाओं की तरह घरों में कैद नहीं थीं। जिन घरों में पैसे की आमद हुई है, उनमें पुरुषों की भद्रता के अभियान के क्रम में महिलाओं की परदादारी सुनिश्चित की जा रही है। यह स्त्री अध्ययन या समाजशास्त्र के विभागों के लिए शोध का विषय है। फिलहाल हमारे लिए खत्म होता सख्य टीस पैदा करता है।


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