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दूरंदेशी से दूर PDF Print E-mail
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Wednesday, 20 August 2014 11:41

जनसत्ता 20 अगस्त, 2014 : पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने हुर्रियत के नुमाइंदों को मुलाकात का न्योता ऐसे वक्त क्यों दिया, जब कुछ ही दिन बाद दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत तय थी? जाहिर है यह भारत सरकार को रास नहीं आ सकता था। मगर नाराजगी में उसने जैसी प्रतिक्रिया की, उसे अतिरंजित ही कहना होगा। उसने दोनों तरफ के विदेश सचिवों की वह बैठक रद््द कर दी, जो इस्लामाबाद में 25  अगस्त को होनी थी। भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की प्रक्रिया कई बार मुल्तवी हुई है। मसलन, नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने समग्र वार्ता के सिलसिले को जहां का तहां रोक दिया था। वह बहुत असाधारण परिस्थिति थी। ताजा फैसले के पीछे वैसा कोई ठोस आधार नहीं दिखता। ऐसा पहले कई बार हुआ है जब पाकिस्तानी उच्चायुक्त या पाकिस्तान से आए नेताओं और प्रतिनिधिमंडल ने हुर्रियत के लोगों से मुलाकात की। उनकी भेंट उस दौरान भी हुई जब दोनों देशों के बीच काफी अहम बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। 1995 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फारूक लेघारी सार्क की बैठक के लिए दिल्ली आए तो हुर्रियत नेताओं से भी मिले थे। तब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान भी यह सिलसिला जारी रहा। 

जुलाई 2001 में पाकिस्तान के तब के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने शिखर वार्ता के लिए आगरा रवाना होने से पहले हुर्रियत नेताओं से भेंट की थी। वाजपेयी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विभिन्न समूहों से बातचीत का दौर भी चलाया, जिसमें हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने  भी शिरकत की थी। पाकिस्तान जाकर भी हुर्रियत के प्रतिनिधि वहां की सरकार के मंत्रियों और अन्य राजनीतिकों से मिलते रहे हैं। मोदी सरकार इन तथ्यों से अनजान नहीं होगी। अगर उसे पाकिस्तानी उच्चायुक्त से हुर्रियत की मुलाकात पर नाराजगी जतानी ही थी, तो विदेश सचिवों की बैठक में यह मसला उठाया जा सकता था। पर बैठक रद्द कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल उस नीति की निरंतरता को चोट पहुंचाई है जो वाजपेयी सरकार के समय भी जारी रही, बल्कि उस पहल को भी पलीता लगाया है जो उन्होंने पदभार संभालते ही की


थी। उनके शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ भी शरीक हुए थे। विदेश सचिव स्तर की वार्ता की सहमति तभी बन गई थी। अलबत्ता तब से पाकिस्तान के अंदरूनी हालात में फर्क आया है। शरीफ अपने खिलाफ इमरान खान और ताहिर उल-कादरी के विरोध-प्रदर्शनों से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थितियों को पाकिस्तान की सेना सरकार के फैसलों में दखल देने के लिए ज्यादा अनुकूल पाती है और मनमानी से बाज नहीं आती। 

संघर्ष विराम के उल्लंघन की ताजा घटनाओं से भी यह जाहिर होता है। पर बातचीत का दरवाजा बंद करना किसी समस्या का समाधान नही है। बैठक से कुछ हासिल होता या नहीं, बातचीत का क्रम चलने से पाकिस्तान की लोकतांत्रिक शक्तियों और कूटनीतिक प्रकियाओं को बल मिलता है। कम विवादास्पद मसलों पर कुछ प्रगति होती है और ज्यादा संवेदनशील मामलों के भी बातचीत से सुलझने की उम्मीद जगती है। जबकि बातचीत बंद कर देने से कट््टरपंथी ताकतों को ही बल मिलता है। यह बात दोनों तरफ लागू होती है। नवाज शरीफ की मां के लिए मोदी की तरफ से भेजे गए उपहार पर शिवसेना ने कैसा तंज कसा था! क्या बैठक रद््द करने के पीछे संघ परिवार को खुश करने की मंशा रही होगी? क्या पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आने की मुद्रा अख्तियार कर आगामी विधानसभा चुनावों में उसे भुनाने का गणित भी काम कर रहा होगा? भाजपा की रणनीति जो हो, बैठक रद््द करना दूरंदेशी भरा कदम नहीं है।


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