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बेतुके बोल PDF Print E-mail
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Wednesday, 20 August 2014 11:40

जनसत्ता 20 अगस्त, 2014 : रविवार को मुंबई में विश्व हिंदू परिषद के समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व इसकी पहचान है। उनके इस बयान के चलते एक बार फिर यह सवाल उठा है कि आखिर संघ की मंशा क्या है। भारतीय राष्ट्र की अवधारणा आजादी की लड़ाई के दिनों में विकसित हुई थी, जिसमें सभी धर्मावलंबियों ने भाग लिया था। इसी के अनुरूप, आजादी मिलने के बाद जब देश का संविधान बना तो भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया, जिसका मतलब है कि धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा और कानून की निगाह में सभी नागरिक समान हैं। भागवत के बयान से ऐसा लगता है कि उन्हें संविधान की परवाह नहीं है। वे भारतीय नागरिकता को एक खास धर्म के आधार पर परिभाषित करना चाहते हैं। सऊदी अरब, ईरान जैसे कई देशों ने अपनी राष्ट्रीयता की ऐसी ही बुनियाद रखी है। क्या भारत को भी उसी रास्ते पर चलना चाहिए? इससे हफ्ते भर पहले भागवत ने कहा था कि अगर अमेरिका में रहने वाले अमेरिकन हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन, तो हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों न कहे जाएं! उनकी इस बात पर विवाद भी उठा और उसका मखौल भी उड़ा। अमेरिकन या जर्मन होना किसी खास धर्म के अनुयायी होने की सूचना नहीं देता, संबंधित नागरिकता और उसके भूगोल को बताता है। इसी तरह भारत में रहने वाले सभी लोग भारतीय हैं। हिंदू वही हैं जो हिंदू धर्म को मानते हैं। वे भारत से बाहर रहने वाले लोग भी हो सकते हैं, जैसे कि नेपाल के तमाम लोग और बाहर जा बसे बहुत-से भारतवंशी हैं। यह कहना कि हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं या हिंदुत्व ही हिंदुस्तान की पहचान है, दुष्प्रचार के सिवा और कुछ नहीं है। 

यह सही है कि भारत में अधिकतर लोग हिंदू धर्मावलंबी हैं, पर भारतीयता के दायरे में अन्य धर्मावलंबी भी आते हैं। फिर, संघ ने यह कैसे मान लिया कि हिंदू कहे जाने वाले सभी लोग अपनी नागरिकता को धर्म


के चश्मे से देखते हैं? भागवत ने रविवार को यह भी कहा कि हिंदुत्व सभी धर्मों को समा सकता है। यही बात अन्य धर्मावलंबी भी अपने धर्म की व्यापकता के बारे में कह सकते हैं; क्या वह भागवत को स्वीकार्य होगा? किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान क्या है इसे तय करने का अधिकार उसी को है। यही नहीं, दुनिया में जहां भी लोकतंत्र है और मानवाधिकार हासिल हैं, हर व्यक्ति को यह आजादी है कि वह अपने को किस धर्म का माने। होना तो यह भी चाहिए कि कोई चाहे तो परंपरागत पहचानों के बगैर रह सके। भागवत ने जो कुछ कहा है कि उसके पीछे एक मौलिक अधिकार के प्रति असहिष्णुता फैलाने, विविधता और सौहार्द को चोट पहुंचाने और एक कृत्रिम एकरूपता थोपने का इरादा ही लगता है। क्या यही संघ की विचारधारा है? इस्लाम, बौद्ध, सिख, जैन आदि धर्मों को मानने वालों को हिंदुत्व में समाने के लिए कैसे बाध्य किया जा सकता है? विडंबना यह है कि भागवत हिंदुत्व में सबको समा लेने का दम तो भरते हैं, पर संघ के दरवाजे सबके लिए खुले नहीं हैं! देश में धार्मिक ही नहीं, और भी कई तरह की विविधता है। कोई एक पहचान सभी की है तो वह बस भारतीय होने की है। एकता का यह सूत्र सेक्युलर नागरिकता ही संभव करती है।     


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