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कामयाबी हथियाने का खेल PDF Print E-mail
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Wednesday, 20 August 2014 11:38

शीतला सिंह

 जनसत्ता 20 अगस्त, 2014 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम चुनाव में भाजपा को मिली अपूर्व सफलता के लिए अमित शाह को ‘मैन ऑफ द मैच’ कहा है।

वे पार्टी की राष्ट्रीय परिषद द्वारा अध्यक्ष पद पर शाह की नियुक्ति की पुष्टि किए जाने के अवसर पर उनकी प्रशंसा कर रहे थे। पार्टी के दूसरे नेताओं ने भी शाह की तारीफ में कसीदे पढ़े। इन सब टिप्पणियों से ऐसा लग रहा था मानो शाह चुनाव में सक्रिय न होते तो भाजपा सत्ता में न आ पाती। लेकिन दूसरी ओर संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इन टिप्पणियों पर अपनी असहमति व्यक्त की है। उनका कहना है कि इसके पहले पार्टी भी थी और ये नेता भी थे, लेकिन चुनावों में अनुकूल परिणाम क्यों नहीं आ पाए। उनके मुताबिक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली जबर्दस्त सफलता का श्रेय अगर किसी को दिया जाना चाहिए तो वह इस देश की जनता को, जो बदलाव के लिए आतुर थी। परिवर्तन की जन-आकांक्षा ने ही भाजपा को इस मंजिल तक पहुंचाया। इसलिए यह सफलता व्यक्तिपरक नहीं मानी जा सकती। 

जहां तक चुनाव परिणामों का संबंध है, 1989 के बाद यह पहला अवसर है, जब किसी एक पार्टी को बहुमत मिला है और उसने सरकार बनाई है। लेकिन मोदी को मिले बहुमत को अपरिमित उत्साह का परिचायक नहीं कहा जा सकता। यह तो माना जा सकता है कि हिंदीभाषी प्रदेशों में मोदी के अभियान का खासा प्रभाव पड़ा है। इसके अलावा असम और पूर्वोत्तर के कुछ अन्य राज्यों में भाजपा को पहली बार विजय हासिल हुई है। बंगाल और तमिलनाडु में भी उसका खाता खुला है, जहां पहले भाजपा की मौजूदगी नाममात्र को थी। केरल में इस बार भी भाजपा को कोई सीट नहीं मिल पाई है। लोकसभा की पांच सौ तैंतालीस सीटों में से भाजपा को कुल दो सौ बयासी सीटें मिलीं, यानी बहुमत से दस अधिक, लेकिन इसे इतिहास की शान और गुमान वाली बात नहीं कहा जा सकता।

पर भाजपा के अपने रिकार्ड के लिहाज से देखें तो ये चुनाव नतीजे जरूर ऐतिहासिक थे। भाजपा पहले भी केंद्र में एक बार सरकार बना चुकी है, मगर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी वह सरकार करीब दो दर्जन दलों के गठबंधन से ही संभव हो पाई थी। इस बार भी राजग के रूप में भाजपा की अगुआई वाला गठबंधन मौजूद है, पर मोदी सरकार लोकसभा में बहुमत के लिए किसी अन्य पार्टी की मोहताज नहीं है। क्या इसे शाह के करिश्मे ने संभव किया? अमित शाह उत्तर प्रदेश के भाजपा के प्रभारी थे, जहां की अस्सी सीटों में भाजपा को इकहत्तर सीटें हासिल हुर्इं। अपना दल की दो सीट जोड़ लें तो यह आंकड़ा तिहत्तर तक पहुंच जाता है। मगर कई दूसरे राज्यों में तो भाजपा को इससे भी ज्यादा सफलता मिली। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, उत्तराखंड की सभी सीटें उसकी झोली में आ गर्इं। फिर शाह को क्यों महिमामंडित किया जा रहा है? 

देश में एक पुरानी कहावत है ‘पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान, भीलन लूटी गोपिका, वहि अर्जुन वहि बान’। इस प्रकार अगर स्वतंत्रता के बाद देश में हुए चुनावों का मूल्यांकन किया जाए तो वह भी यही सिद्ध करता है कि उस समय किन भावनाओं की प्रबलता थी। जब देश आजाद हुआ तो उसका उत्साह चारों ओर था, लेकिन देश के विभाजन और उसके फलस्वरूप हुई मार-काट, हिंसा लोगों को पसंद नहीं थी। शरणार्थियों का आना-जाना और उनके दुख से भी लोग पीड़ित थे, लगता यही था कि इस दुख के आगे लोग स्वतंत्रता से मिलने वाली खुशी खो देंगे। 

जब 1952 में संघ परिवार का राजनीतिक अंग भारतीय जनसंघ गठित हुआ तो उसने अखंड भारत का नारा दिया, क्योंकि उसकी समझ यह थी कि देश इस बंटवारे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है इसलिए यह बड़ा चुनावी मुद्दा होगा, जिसका मुकाबला कांग्रेस नहीं कर पाएगी। 

चुनाव के पहले ही कांग्रेस से सोशलिस्ट पार्टी अलग हो चुकी थी। वह विभिन्न आर्थिक मुद्दों पर अपना अलग संघर्ष चला रही थी। विभाजन के फलस्वरूप और शरणार्थियों की उपस्थिति के कारण सांप्रदायिकता में भी विस्तार हुआ था। उस समय दो और सांप्रदायिक दल पहले से चले आ रहे थे, हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद का गठन हो चुका था। लेकिन चुनाव परिणामों की दृष्टि से देखा जाए तो इन तीनों पार्टियों को मिला कर दस सीटें भी नहीं मिल पाई थीं। कांग्रेस चुनाव भी जीती और उसकी सरकार भी बनी। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि लोगों में स्वतंत्रता के बाद नई व्यवस्था के प्रति कितना उत्साह और कितनी जागरूकता थी और वे यह समझते थे कि जो बदलाव होने जा रहा है वह आम आदमी के हित में ही होगा।

गांधीजी की हत्या देश में बढ़ते हुए संप्रदायवाद के फलस्वरूप स्वतंत्रता-प्राप्ति के छह महीने के भीतर ही हो गई थी। राजा-महाराजा भी अपनी पुरानी हैसियत की बहाली के लिए उत्सुक थे; वे अपने अनुभव का तर्क दे रहे थे कि हम सरकार चलाना जानते हैं, अनाड़ियों के हाथ में सत्ता न सौंपिए। लेकिन उन्हें भी विफलता ही मिली। कुछ गिने-चुने राजा-महाराजा ही जीत पाए और कई तो अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने की सोच कांग्रेस में शामिल होे गए। प्रथम आम चुनाव 1952 में हुआ था। 1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी को बहुमत मिला और वहां पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जिसे कांग्रेस ने


चुनौती माना और उसे बर्खास्त कर पहली बार कई दलों को मिला कर संयुक्त सरकार बनाई। 

वर्ष 1967 में गैर-कांग्रेसवाद का जोर चला और सात राज्यों में कांग्रेस-विरोधी संविद सरकारें बनीं, जिसका अर्थ यही निकाला जाएगा कि लोग कांग्रेस से संतुष्ट नहीं थे, बदलाव चाहते थे। 1971 के पहले कांग्रेस विभाजित हो गई और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विभाजित कांग्रेस का नेतृत्व संभाला। पुरानी कांग्रेस के तमाम दिग्गज एक साथ हो गए, जो यह कह रहे थे कि इस बार इंदिरा गांधी को संसद में विपक्ष का नेता-पद भी नहीं मिल पाएगा। लेकिन इंदिरा गांधी ने समाजवाद का नारा दिया, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, राजाओं का प्रिवीपर्स समाप्त किया, अधिकतम आय पर पाबंदी की ओर आगे बढ़ीं, देहात की खेती और शहरी भूमि की हदबंदी की चर्चा चली, जिसके फलस्वरूप उन्हें 43.68 प्रतिशत वोट और तीन सौ बावन सीटें मिलीं। लेकिन जब वे अपने घोषित लक्ष्य पर नहीं बढ़ पार्इं और चुनाव रद्द होने के बाद जयप्रकाश नारायण के जनांदोलन से घबरा कर उन्होंने आपातकाल लागू किया तो यह उनकी प्रतिष्ठा घटाने का ही कारण बना। 

जब 1977 में आम चुनाव हुए तो दो प्रदेशों को छोड़ कर सारे देश में कांग्रेस हार गई। रायबरेली से अपनी और अमेठी से बेटे संजय की सीट भी नहीं बचा पार्इं। लेकिन तब भी उन्हें एक सौ चौवन सीटें और 34.52 प्रतिशत मत मिले थे। यह माना जा रहा था कि इंदिरा गांधी के प्रति जन्मा उत्साह जनाक्रोश में परिवर्तित हो गया था जिसका सामना वे नहीं कर पार्इं। 1977 में कांग्रेस-विरोधी दलों को मिला कर जनता पार्टी की जो सरकार बनी वह वैचारिक विसंगतियों, सत्ता-मोह और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाई, इसलिए सत्ताईस महीने में ही उसका अवसान हो गया। 1979 के अंत में जब चुनाव हुए तो पुन: कांग्रेस को बहुमत मिल गया।  

वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की उनके सुरक्षाकर्मियों द्वारा ही की गई हत्या के बाद राजनीति से अलग रह कर विमान चलाने वाले राजीव गांधी ने जब सत्ता संभाली तो मां की मृत्यु के प्रति सहानुभूति तो थी ही, लोगों को यह भी लग रहा था कि राजनीति के खेल से परे दिखने वाला यह युवक देश की बिगड़ी हालत को बदलने और अच्छा बनाने के लिए जरूर प्रयत्न करेगा। यही कारण था कि उन्हें संसद में चार सौ पांच सीटें मिलीं और इस बयार में भाजपा महज दो सीट पर सिमट गई। उसके बड़े-बड़े नेता और अटल बिहारी वाजपेयी भी हार गए। लेकिन कांग्रेस के प्रति यह जन-उत्साह पांच वर्षों तक कायम नहीं रह पाया। 1989 के चुनाव में कांग्रेस अल्पमत में बदल गई और एक नया प्रयोग हुआ- भाजपा और वामपंथियों ने मिल कर कांग्रेस के विद्रोही नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। 

लेकिन यह प्रयोग मंडल और कमंडल की लड़ाई की भेंट चढ़ गया। जब पुन: चुनाव हुए, तो उसमें भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया। जोड़-तोड़ के बल पर उसकी सरकार तो बनी, लेकिन वह अपनी राह निर्धारित नहीं कर पाई। 

परिणामस्वरूप बाद के चुनावों में उसे बहुमत नहीं मिला। बाद के दो वर्षों में कांग्रेस समर्थित सरकारें बनीं जिन्हें तीसरे मोर्चे की सरकारें कहा गया। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नाम से सरकार बनी और चली, लेकिन इसकी दिशा और नीति भी लोगों को पसंद नहीं आई। फिर अल्पमत कांग्रेस ने यूपीए के नाम पर सरकार बनाई और पांच वर्ष बाद उसने वापसी भी की। लेकिन इस अवधि में यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, कई बड़े घोटाले उजागर हुए। महंगाई भी बेकाबू बनी रही। 

लिहाजा, इस बार के आम चुनाव उसे लोगों ने अस्वीकार किया। नरेंद्र मोदी ने संप्रदायवाद को अलग रख कर, अपनी पुरानी छवि के विपरीत यह बता कर कि वे वर्तमान विसंगतियों का मुकाबला करेंगे और देश को अच्छे दिनों की ओर ले जाएंगे, भाजपा को असाधारण सफलता दिलाई। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नरेंद्र मोदी को लोगों ने एक स्वयंभू, कारगर, योग्य और भावी नीतियों के वाहक के रूप में स्वीकार कर लिया है। उनके समर्थक पत्रकार भी यही मानते हैं कि उनकी नीतियों की सबसे बड़ी विसंगति निगमित क्षेत्र का हित-पोषण है, जिसका मुख्य लक्ष्य मुनाफा है। और काला धन जो पूरी अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाए बैठा है, चुनावों में जिसकी खास भूमिका होती है उससे निपटना अभी बाकी है, बल्कि सरकार भी इन दोषों को अंगीकार करने का परिणाम है। इसलिए परिवर्तन की अभिलाषा कितनी पूरी होती है, सरकार की नीतियों की स्वीकार्यता भी इसी से तय होगी। इसे व्यक्तिपरक नहीं माना जा सकता।


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