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तनाव की सियासत PDF Print E-mail
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Tuesday, 19 August 2014 12:02

जनसत्ता 19 अगस्त, 2014 : शायद ही किसी दंगे की जांच-रिपोर्ट सर्व-स्वीकार्य रही हो। दंगे प्राकृतिक आपदा नहीं होते कि उनके लिए किसी को दोषी न ठहराया जाए। सांप्रदायिक हिंसा बहुत बार सुनियोजित होती है। जब वह किसी किस्म की तैयारी के बगैर भड़क उठती है तब भी उसमें निहित स्वार्थ सक्रिय हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं की जांच सबको रास आने वाली नहीं हो सकती। सहारनपुर के मामले में यह जरूर कहा जा सकता है कि जांच समिति के गठन में सतर्कता नहीं बरती गई। सपा सरकार ने सहारनपुर दंगे की जांच के लिए लोकनिर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव की अध्यक्षता में समिति गठित की थी, जो मुख्यमंत्री के चाचा भी हैं। समिति के अन्य सदस्यों में ग्राम्य विकास मंत्री, प्राविधिक शिक्षा मंत्री, युवा कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष और मुरादाबाद के सपा के जिलाध्यक्ष शामिल थे। राज्य सरकार ने ऐसी समिति क्यों गठित की, जिसकी निष्पक्षता पर आसानी से सवाल उठाया जा सके? इस तरह उसने खुद भाजपा के बचाव या पलटवार के लिए गुंजाइश छोड़ी है। स्थानीय प्रशासन का दोष रहा होगा, सहारनपुर की घटना अकेली नहीं है। 

जिस तरह पिछले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश में अनेक जिलों में सांप्रदायिक तनाव का लावा फूटा है, उसकी जवाबदेही से राज्य सरकार कैसे पल्ला झाड़ सकती है? रिपोर्ट आते ही विवाद शुरू हो गया है। रिपोर्ट ने जहां स्थानीय प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है वहीं भाजपा के सांसद की भूमिका पर भी अंगुली उठाई है। गौरतलब है कि छब्बीस जुलाई को सहारनपुर के कुतुबशेर इलाके में एक विवादित स्थल पर निर्माण-कार्य को लेकर दो समुदायों के बीच हिंसक टकराव हुआ जिसने देखते-देखते दंगे का रूप ले लिया। तीन लोग मारे गए। रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय प्रशासन ने लापरवाही बरती, हिंसा से पहले वाली रात को विवादित स्थल पर लेंटर डालने की इजाजत दे दी, जो नहीं दी जानी चाहिए थी। प्रशासन ने वहां भीड़ को इकट्ठा होने से भी नहीं रोका, जो कि निहायत अदूरदर्शितापूर्ण रवैया था। भाजपा ने इस रिपोर्ट को राजनीति से प्रेरित करार दिया है, वहीं बसपा ने इसे भाजपा और सपा की मिलीभगत कहा है। इन आरोपों की हकीकत जो हो, इस बात से इनकार नहीं किया


जा सकता कि उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ महीनों में हुए दंगों के पीछे चुनावी लाभ की मंशा रही है। मुजफ्फरनगर के दंगों में जो रुझान दिखा वही इस तरह की बाद की घटनाओं में भी नजर आया। 

भाजपा भी अपने को पाक-साफ बताती है और सपा भी। पर दोनों पार्टियों ने कई आरोपियों को राजनीतिक महत्त्व देने, यहां तक कि उन्हें विधिवत सम्मानित करने में भी संकोच नहीं किया। जहां ऐसा खेल चल रहा हो वहां सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगने की कितनी उम्मीद की जा सकती है? पिछले दिनों केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि इस साल अब तक देश भर में तीन सौ आठ दंगे हो चुके हैं, इनमें से ज्यादातर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में हुए हैं। भाजपा कह सकती है, जो कि वह कहती है कि इनमें से कहीं भी उसकी सरकार नहीं है। फिर उस पर कोई कैसे अंगुली उठा सकता है। लेकिन दंगे अमूमन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का अंग या परिणाम होते हैं। इसके लिए जो माहौल बनाया जाता है वही दंगे का असल कारण होता है। फिर लाउडस्पीकर का इस्तेमाल, किसी चहारदीवारी का निर्माण, छेड़खानी या लड़कों के बीच कहासुनी जैसी कोई भी घटना या कोई अफवाह दंगे में बदलते देर नहीं लगती। लिहाजा, सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारी राजनीति की दिशा क्या है। क्या वह सौहार्द को बढ़ावा दे रही है या उसे पलीता लगा रही है?


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