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लाल किले से जो सुना हमने PDF Print E-mail
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Tuesday, 19 August 2014 12:00

कुमार प्रशांत

 जनसत्ता 19 अगस्त, 2014 : लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन से पहले उसकी हवा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई थी;

संबोधन के बाद उसकी गूंज बनाए रखने की भी ताबड़तोड़ कोशिश जारी है। लेकिन हवा की हवा क्या थी और अब गूंज क्या है, यह मैं न आंक पा रहा हूं न जान पा रहा हूं। 

जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कभी, किसी के लिए ऐसी हवा नहीं बनाई गई थी। नरेंद्र मोदी के लिए बनाई गई क्योंकि उनकी सारी राजनीति ही हवा के बल पर बनी हुई है। और हवा का चरित्र है कि वह टिकती नहीं है और रुकती नहीं है। नरेंद्र मोदी के पक्ष में दो बातें थीं- आजाद भारत में पैदा हुआ पहला प्रधानमंत्री और लंबे समय के बाद अपने बल पर बहुमत से बनी सरकार का मुखिया! दोनों ही कारण मजबूत थे लेकिन इनका रिश्ता लाल किले के भाषण की स्तरीयता से तो जुड़ता नहीं है। फिर भी मुझे यह बात खासतौर पर अच्छी लगी कि मोदी लिखित भाषण नहीं पढ़ेंगे, कि नरेंद्र मोदी पाषाणवत शीशे की दीवार में दुबक कर, देश की बहादुरी को नहीं ललकारेंगे! कितने दरिद्र बना दिए गए हैं हम कि ये सब बातें भी विशिष्टता में गिननी पड़ती हैं! 

प्रधानमंत्री ने दोनों बातें कीं- वे धाराप्रवाह बोले और शीशे की दीवार हटा कर बोले ! पिछले दस सालों से हम जिस बोदे किस्म का संबोधन लाल किले से सुनते (?) आ रहे थे, भाइयो और बहनो, उससे यह एकदम भिन्न था। हमारे सामने एक प्राणवान, ऊर्जावान प्रधानमंत्री खड़ा था जिसके पास अपनी भाषा थी, अपना तेवर था। उसकी गुजराती असर वाली हिंदी में एकाध खांटी गुजराती शब्दों की छौंक मुझे भा रही थी। मैं यह भी देख पा रहा था कि यह एक आदमी है जो सत्ताधारियों के कुनबे से नहीं आया है और उसके भीतर उस जमीन की याद ताजा है अभी, जहां से वह उठा है। मैं यह भी देख पा रहा था कि इस आदमी को पता है कि आज वह सबकी नजर में है और यह भी कि वह नजरों में बने रहने का गुर जानता है। लेकिन... इससे आगे? भाषण खत्म कर जब प्रधानमंत्री चले गए तो एक खोखला सन्नाटा अपनी जगह बनाने में कितनी आसानी से, कितनी जल्दी सफल हो गया! क्यों? क्योंकि प्रधानमंत्री ने कहा कुछ भी नहीं! ऐसा लगा कि वे शब्दों की तोप चलाते रहे और जब शब्द चुक गए तो वे चुप हो गए।   

प्रधानमंत्री ने जिस भारत की तस्वीर खींची उसका सत्त्व, उनके ही कहे मुताबिक बाजार है। वे कहते हैं कि जो देश बाजार में बिकता है और बाजार बनाता है वही सबसे अव्वल होता है, विश्वगुरु बनता है। मोदी के भारत को वहां पहुंचना है। इसकी कीमिया कहां है- मेक इन इंडिया का आमंत्रण और मेड इन इंडिया का साम्राज्य! चुनावी सभाओं में, जिसका नरेंद्र मोदी को खासा अभ्यास है, इस पर तालियां बजेंगी। लेकिन जब हम इस नारे को खोलते हैं तब क्या मिलता है? खाली हवा! 

मान लें कि मोदी की बात मान कर दुनिया भर की कंपनियां भारत में अपने उद्योग लगाने आएं तो हम उन्हें क्या देंगे- सस्ते मजदूर जिनकी सुरक्षा के लिए कोई श्रम कानून नहीं होगा? जमीन जो सरकारी दमन के कारण माटी के मोल मिल जाएगी? बिजली जो अपने देश में कितनी है और किस हाल में है, यह दूसरे किसी से नहीं, पीयूष गोयल से ही पूछ लीजिए? पानी जो बाढ़ और भयंकर जल-जमाव तो ला रहा है लेकिन न सींच पा रहा है न प्यास बुझा पा रहा है? और इन सबका इतना सारा दोहन करके विदेशी कंपनियां जो माल यहां बनाएंगी, वह बिकने और ज्यादा मुनाफा कमाने कहां जाएगा? दूसरे देशों के बाजार में ही न? 

यही मॉडल तो है जो चीन ने अपने यहां बना और चला रखा है। मेक और मेड, दोनों ठप्पों पर आज चीन का जैसा वैश्विक एकाधिकार है वैसा दूसरा किसका है? परचीन के समाज की, नागरिकों की, श्रमिकों की क्या स्थिति है। क्या हम अब वैसे ही समाज को आदर्श मानेंगे? संघ परिवार को चीनी मॉडल से ज्यादा एतराज न हो शायद, क्योंकि वह भी एकाधिकारी समाज में विश्वास करता है। लेकिन महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई के दौरान जिस लोकतंत्र के बीज बोए और आजादी मिलने के बाद से अब तक हमने जिस लोकतंत्र की सार्वजनिक साधना की है, क्या वह हमें चीन जैसा समाज बनाने देगा? इस पर सोचना जरूरी है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि आदर्श गांव बनाए जाएं; और उन्होंने उसकी एजेंसी भी बता दी कि सारे सांसद, विधायक अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में हर साल एक गांव को आदर्श बनाने में लग जाएं। लक्ष्य भी सामने रख दिया- 2019 का चुनाव। 

अगर यह सत्ताकेंद्रित राजनीतिक कीमिया  किसी को रास आए तो भी यह सवाल बचा ही रहता है कि सारे सांसद-विधायक मिल कर आदर्श गांव बनाएंगे तो केंद्र और राज्यों की सरकारें क्या करेंगी? उनका लक्ष्य तो मोदीजी ने पहले ही तय कर दिया है, बजट में उसकी घोषणा भी हो चुकी है कि सौ आधुनिक शहर बसाए जाएंगे। लोग बनाएं आदर्श गांव और सरकार बनाए आदर्श-आधुनिक शहर तो इसमें से कैसे भारत की तस्वीर उभरती है? 

गांव या शहर के रूप में जिन्हें हम देखते हैं वे मिट््टी के लोंदे नहीं हैं कि जिन्हें आप मनचाहा आकार दे लेंगे।


ये मनुष्यों की जिंदा संरचनाएं हैं जिनके पीछे इतिहास-भूगोल-परंपरा-संस्कृति की जिंदा ताकतें काम करती हैं। कैसे इनका तालमेल बिठाएंगे आप? जवाहरलाल भी ताउम्र इसी जाल में फंसे हाथ-पांव मारते रहे लेकिन गांधी के ग्राम स्वराज्य में छिपी आधुनिक भारत की तस्वीर देख और समझ नहीं पाए और नतीजा सामने है कि भारत के गांवों की कब्र पर खड़े हमारे शहर भी गंदगी, कुव्यवस्था, हिंसा, भ्रष्टाचार, मिथ्याचार, अपराध की लड़खड़ाती मीनारें बन गए हैं। दिल्ली में भी, अमदाबाद-वडोदरा में भी, मुंबई-चेन्नई और बंगलुरुमें भी इससे अलग क्या खड़ा हुआ है? समाज बनाने और होटल बनाने में कोई फर्क होता है या नहीं? क्या इनमें से हम कोई समाज बनता हुआ देख पा रहे हैं?  

प्रधानमंत्री ने अपने सामने एक बड़ा सपना यह रखा है कि देश का हर नागरिक बैंक से जोड़ा जाएगा। क्या होगा इससे? हमें इस अतिकेंद्रित बैंकिंग व्यवस्था की गहरी जांच करनी चाहिए। यह बड़े पूंजीवालों के हित में काम करने वाली निहायत ही अकुशल, भ्रष्ट और निजी लूट में संलग्न व्यवस्था है। आखिर जब हमारी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है तो राष्ट्रीयकृत हों कि निजी, इन बैंकों की इमारतें अट्टालिकाओं में कैसे बदल रही हैं, इनके लोगों की तनख्वाहें कहां पहुंच रही हैं, इनकी शाखाओं की चमक-दमक कैसे निखरती ही जा रही है? इनकी अकुशलता और गैर-जिम्मेदारी की अकथ कहानी किसी भी खाताधारक से सुन सकते हैं प्रधानमंत्री। प्रधानमंत्री बस इसका ही हिसाब देश के सामने रखें कि जिन किसानों ने पिछले बीस बरसों में आत्महत्या की है, उनमें से कितनों ने बैकों से कर्ज ले रखा था? 

गांव के सूदखोर महाजन की जगह सामाजिक न्याय में विश्वास करने वाली बैंकिंग व्यवस्था हम बना सके हैं क्या? हम इस राजनीतिक बेईमानी के जाल में न फंसें कि सरकारों ने चुनावों को ध्यान में रख कर किसानों का कब, कितना कर्ज माफ किया है। किसानों की कर्ज-माफी एक तरफ तो राजनीतिक घोटाला है, दूसरी तरफ सामान्य करदाता की बेशर्म लूट। बैंकों के विस्तार का आज एक ही मतलब है कि जिस विकेंद्रित ग्रामीण पूंजी तक सरकार और उद्योगों की पहुंच नहीं है, वह समेट कर शहरों में ले आई जाए और उसका मनमाना दोहन हो। 

लड़कियों-बेटियों को लेकर कितनी चिंता प्रकट की प्रधानमंत्री ने। लेकिन जैसी संरचना की तरफ उनकी दौड़ है, उसमें सारी दुनिया में लड़कियां र्इंधन की तरह इस्तेमाल की जाती हैं। मुनाफा बटोरने वाला बाजार हो या पर्यटन को उद्योग मानने वाली व्यवस्था, अपने हर माल को सेक्स की चासनी में लपेट कर बेचने वाला शहरी उद्योग हो या लड़कियों को रंभा या मेनका मान कर बरतने वाली राजनीति- कहां है जगह बेटियों की? तो नारे वोट ला सकते हैं लेकिन राजनीतिक-सामाजिक-बौद्धिक मान्यताएं बदलने का रास्ता इधर से नहीं गुजरता है।  

सारी उलझन यहीं पर है कि रास्ता क्या है और वह किधर से गुजरता है। चुनाव प्रचार के दौरान मतवाले हुए नरेंद्र मोदी हों कि आज सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री, महात्मा गांधी उन्हें एक ही बात के लिए याद आते हैं- सफाई। 

यह ठीक ही है कि गंगा की सफाई हो कि प्रधानमंत्री कार्यालय के कचरे की, महात्मा गांधी का झाड़ू हर जगह काम करता है, लेकिन प्रधानमंत्री जो भूल रहे हैं वह यह कि महात्मा गांधी का झाड़ू सबसे पहले दिमागी गंदगी की सफाई करता था। उस झाड़ू से सभी पिटे हैं- बिड़ला-बजाज भी, सोहरावर्दी और कांग्रेसी भी, संघ परिवारी और सरदार पटेल भी, सुभाष भी और हिटलर भी। जवाहरलाल से उत्तराधिकार वापस लेने तक गए वे और कांग्रेस को विसर्जित करने की लिखित सलाह तक दे डाली। दलितों की नुमाइंदगी का आंबेडकर का एकाधिकार जिसने कभी स्वीकार नहीं किया, उसी ने आजाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में उनको जगह देने की जोरदार पैरवी की तो उसके पीछे भी दिमागी गंदगी पर झाड़ू चलाने की बात ही थी।

मुसलिम सांप्रदायिकता को संगठित कर राजनीति करने की जिन्ना की रणनीति का आखिरी दम तक विरोध किया उन्होंने तो दूसरी तरफ भारतीय समाज में सभी धर्मावलंबियों की समान हैसियत बनाने के सवाल पर गोली खाई उन्होंने। जयप्रकाश नारायण को कांग्रेस का अध्यक्ष बना कर नेहरू-सरदार पर अंकुश लगाने की कोशिश की उन्होंने तो देश-विभाजन बचाने के लिए यह दुस्साहसी प्रस्ताव भी रखा कि सब कुछ उनके कंधों पर डाल कर कांग्रेस अलग हो जाए! लेकिन तब न कोई संघ परिवारी उनके समर्थन में आगे आया न कोई लीगी, न कोई कांग्रेसी, न कोई साम्यवादी। इस गांधी को भुला कर जिस तरह चलने की कोशिश प्रधानमंत्री कर रहे हैं वह उन्हें लाल किले तक भले पहुंचा दे, हिंसा से लाल हो रही भारत-भूमि को हरीतिमा से भरने का मौका नहीं देगी।


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