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भटकाव का खेल PDF Print E-mail
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Tuesday, 19 August 2014 11:55

संदीप जोशी

जनसत्ता 19 अगस्त, 2014 : जिस देश में कुल सात सौ तिरानवे सांसद हों, मगर मीडिया और सत्ता पक्ष केवल दो मनोनीत सदस्यों के हाजिर-नाजिर न रहने के मुद्दे को तूल दे रहा हो, उसका क्या किया जा सकता है! इसको ‘सबके साथ’ का कोरा विकासवाद भर कहेंगे। ठीक यही हाल इंग्लैंड खेलने गई भारतीय क्रिकेट टीम का हुआ है। राजनीति के बौराए खेल में भटकने से कैसे पीछे रह सकते थे? लार्ड्स के बाद रोस बॉउल और फिर ओल्ड ट्रफर्ड। इंग्लैंड में भारतीय क्रिकेट टीम का दौरा शर्मनाक रहा। दूसरा टेस्ट जीतने के बाद इंग्लैंड ने तीसरे में भारतीय टीम की आरती उतारी और चौथा जीत कर लार्ड्स जीत को पुराना कर दिया। लार्ड्स की जीत के बाद आखिर क्या हुआ कि भारतीय टीम ने ऐसा ऐतिहासिक समर्पण कर दिया!

भारतीय टीम ने इंग्लैंड में पहली बार पांच टेस्ट मैचों की शृंखला खेली। इतनी लंबी जुझारू शृंखला बिना मानवीय टकराव के रोमांचपूर्ण कैसे हो सकती थी? पहले टेस्ट के दूसरे दिन रविंद्र जडेजा और जेम्स एंडरसन के बीच तू-तड़ाक ने क्रिकेट जगत को झंझट में डाल दिया। क्रिकेट के प्रायोजक और मुनाफाखोर खिलाड़ियों को खेल में टकराव दिखाने का नया शिगूफा बताने में लगे रहे। अन्य टकरावों को रोकने के लिए खेल खेले जाने शुरू हुए। एक विशेषज्ञ ने तो क्रिकेट को ‘मर्दों के बीच होने वाला मर्दानगी का खेल’ तक कह दिया। जबकि परंपरा से क्रिकेट एक सौम्य और शांत माहौल में खेला जाने वाला सभ्य खेल माना गया है। इस खेल की शैली बेवजह टकराव के बजाय क्रिकेटीय कला-कौशल और योग्यता रही है।

खैर, मैदान से बाहर जाते हुए हुई नोक-झोंक ने टेस्ट शृंखला में तड़का लगाने का काम किया। आर्थिक होड़ ने खेल राजनीति से हाथ मिलाया। जुझारूपन से अलग और खेल प्रेमियों के अलावा क्रिकेट के धनकुबेरों को उकसाया गया, क्योंकि उनकी रुचि क्रिकेट प्रेम से अलग खेल की सपाट हार-जीत और गैरजरूरी मुद्दों में होती है। उनके लिए टेस्ट क्रिकेट भी एक प्रायोजित मुक्केबाजी का दंगल है। खिलाड़ी खिलौने बना दिए गए और खेल को उसे संचालित करने वालों के हवाले छोड़ दिया गया। ऐसे अनुचित व्यवहार के मुद्दों को मीडिया खोजता रहता है। पांच दिन चलने वाले टेस्ट मैच में खिलाड़ियों के बीच बातचीत होती है और कभी-कभी बुरी-भली बात भी बोल दी जाती है। जो खेल अनिश्चितताओं से भरा हुआ है, उसमें खिलाड़ियों का आपसी टकराव बिल्कुल न हो, ऐसा मानना खेल को नहीं समझना है। आजकल मैदान पर दो अंपायर के अलावा बाहर भी दो अंपायर होते हैं, जो चल रहे खेल पर पैनी नजर रखते हैं। उनके अलावा मैच रेफरी, मैच पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी भी होते हैं। सभी ऐसे ही मौके के लिए खेल से जोड़े जाते हैं। उनके होते हुए भी


बात का बतंगड़ बनता है, क्योंकि मीडिया को मसाला चाहिए।

जो भारतीय टीम अपने क्रिकेट संघ के धन-बल के कारण एंडरसन को नतमस्तक करने पर आमादा थी, उसका ध्यान और मन खेल से भटक गया। राजनीतिक वकालतवाद में लगी भारतीय टीम अपने क्रिकेटीय केंद्र से कट गई और खेल कला से भटकने के कारण लाडर्स में जीतने के बाद भी शृंखला हार गई। मीडिया ने जडेजा और एंडरसन मुद्दे को खेल भावना के अवसान की तरह पेश किया। यह अतिशयोक्ति है। अगर खेल अच्छा हो तो बातों की जगह नहीं बचती है। बल्ले और गेंद को बोलने देना ही खेल को खेल भावना के साथ खेलना है। एंडरसन कोई नौसिखिया खिलाड़ी नहीं हैं जो क्रिकेट की भावना को नहीं समझते हैं। उनका खेल जीवन शालीन और बेदाग रहा है। अगर उनने जडेजा को अपशब्द कहे तो उसे गलती मान कर उनने माफी मांग ली थी। फिर भारतीय कप्तान और टीम प्रबंधन क्यों उन्हें सजा दिलाने पर ही अड़े रहे? श्रीनिवासन के पदग्रहण के कारण कमजोर और दयनीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ कठोर फैसला लेने की हालत में नहीं बचा है। हालांकि राजनीति का खेल, किसी खेल को शर्मसार तो कर सकता है, लेकिन पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सकता।

बहरहाल, इंग्लैंड में हारने का मुख्य कारण ध्यान और ध्येय से भटकना रहा। इसके अलावा, युवा खिलाड़ियों का कमजोर कला-कौशल भी एक वजह है। एंडरसन को प्रतिस्पर्धा से बाहर रखने के चक्कर में अपने बल्लेबाज स्पिनर मोईन अली की गेंद पर आउट होते रहे। यह स्पिन माहौल में पले-बढ़े और सीखे बल्लेबाजों का समर्पण था। घरेलू मैदानों के शेर बल्लेबाज विदेश में बिल्ली कैसे हो जाते हैं! जिस एकदिवसीय और धन के बलबूते बीसमबीस से आए अपने बल्लेबाज महान होना चाहते हैं, वह टेस्ट क्रिकेट की धरोहर है। टेस्ट क्रिकेट ही खेल में महानता की असल कसौटी है। उद्देश्य से भटके समाज में ही सचिन, रेखा और एंडरसन या जडेजा विवाद के मुद्दे बनते हैं। फिर खेल आखिर कैसे खेल रह सकता है!


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