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शाह की भाजपा PDF Print E-mail
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Monday, 18 August 2014 10:56

जनसत्ता 18 अगस्त, 2014 : अपनी ताजपोशी पर पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की मुहर लगने के हफ्ते भर बाद भाजपा के नए अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी टीम का एलान कर दिया। ग्यारह उपाध्यक्षों, आठ महासचिवों और चौदह सचिवों की इस टीम में जहां पहले के कई पदाधिकारियों को उनकी जगह बनाए रखा गया है वहीं कई नए चेहरे भी शामिल किए गए हैं। कोई ज्यादा चौंकाने वाला फैसला कहा जा सकता है तो यही कि वरुण गांधी को पुनर्गठन में कोई पद नहीं दिया गया। यों खुद वरुण ने कहा है कि वे महासचिव रह चुके हैं और दूसरों को भी मौका मिलना चाहिए। पर जब कई पदाधिकारियों को फिर अवसर दिया गया, तो वरुण को क्यों नहीं, जबकि उनका तेवर हिंदुत्व की शाह मार्का रणनीति से औरों के मुकाबले ज्यादा मेल खाता है। दरअसल, पिछले दिनों उनकी मां मेनका गांधी ने, जो केंद्र में मंत्री हैं, यह इच्छा जताई थी कि वरुण को उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जाए। यही नहीं, वरुण समर्थकों ने उनके पक्ष में सोशल मीडिया पर अभियान भी छेड़ दिया। फिर मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदारों की तरफ से भी इस तरह की सक्रियता शुरू हो गई। वरुण को नई टीम में शामिल न करने का मकसद यह जताना ही रहा होगा कि इस तरह पार्टी को उलझन में डालने वाली बातें नहीं चलने दी जाएंगी। 

नई टीम में यों तो बहुत सारे राज्यों को प्रतिनिधित्व मिला है, पर ज्यादा खयाल उन राज्यों का रखा गया है जहां विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश पर पार्टी की खास नजर है और तीन उपाध्यक्ष इसी राज्य से हैं। आरएसएस से भाजपा में भेजे गए राम माधव को कोई अहम ओहदा मिलने का पहले से अनुमान था। नए महासचिवों में वे भी शामिल हैं। अस्सी फीसद पदाधिकारी साठ साल से कम आयु के हैं। इस तरह नई टीम पहले के मुकाबले कुछ युवा कही जाएगी। शाह ने पांच ओबीसी और छह महिलाओं को नियुक्त कर सामाजिक समीकरण का भी खयाल रखा है। पर बीएस येदियुरप्पा को उपाध्यक्ष बना कर उन्होंने क्या संदेश दिया है! जो पार्टी


अपने जनादेश को भ्रष्टाचार-विरोध से परिभाषित करती है, उसने क्यों अपने अगुआ चेहरों में येदियुरप्पा को शामिल किया, जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था। क्या पदाधिकारियों में येदियुरप्पा को शामिल करने का निर्णय मोदी की सहमति के बगैर हुआ होगा? 

शाह की अगुआई वाली भाजपा का पहला सबसे बड़ा इम्तहान महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में होगा। दिल्ली में कब चुनाव होंगे, फिलहाल साफ नहीं है। शाह को उत्तर प्रदेश में मिली कामयाबी का श्रेय देकर पार्टी ने अध्यक्ष पद सौंपा है, जबकि कई दूसरे राज्यों में इससे भी ज्यादा सफलता मिली। उत्तराखंड के तीन विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने बता दिया है कि अच्छे दिन आने के नारे का जादू टूट चुका है। फिर, कई स्थानीय कारक और नए समीकरण भी उभर सकते हैं। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एकी) और कांग्रेस के गठजोड़ से निपटना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। भाजपा का लक्ष्य आने वाले विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने के साथ-साथ राज्यसभा में अपनी ताकत बढ़ाना है, जहां वह अल्पमत में है। शाह भी जानते हैं कि अब वे लोकसभा चुनाव जैसे माहौल की उम्मीद नहीं कर सकते। इसलिए वे दूसरे दलों में सेंध लगाने में जुट गए हैं। अटल-आडवाणी युग की विदाई हो चुकी है। सवाल है कि नया नेतृत्व सत्ता की भूख में पार्टी को कैसा कलेवर देना चाहता है?


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