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हम हिंदुस्तानी PDF Print E-mail
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Monday, 18 August 2014 10:54

राजकिशोर

 जनसत्ता 18 अगस्त, 2014 : अगर भारत उर्फ इंडिया में रहने वाले सभी लोग हिंदुस्तानी हैं, तो मैं भी हिंदुस्तानी हूं।

लेकिन हिंदुस्तान और हिंदू के बीच दूर का रिश्ता है। बल्कि दोनों दो अलग-अलग चीजें हैं। इनमें घालमेल वही करेगा, जो अपने को सिर्फ हिंदू मानता है, यानी हिंदुस्तानी नहीं मानता। इस आधार पर किसी और को उपदेश देना कि तुम भी हिंदू हो, उसका मूर्खतापूर्ण अपमान करना है। कम से कम उसे यह चुनने का अधिकार तो दीजिए कि उसे किस नाम से जाना जाय। अगर दुनिया के सभी लोग एक-दूसरे का या एक-दूसरे के राष्ट्र का नाम तय करने लगें, तो किसी भी नाम का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। 

कुछ तर्क हमेशा बेहूदा होते हैं। सभी के हिंदू होने का यह साठ-सत्तर साल पुराना तर्क भी ऐसा ही है। निश्चय ही आज से दो-ढाई हजार वर्ष पहले जब सभी को हिंदू कहा गया, तो इसका अर्थ वह नहीं था, जो आज हो गया है। जर्मनी में रहने वाले जर्मन कहलाते हैं, इंग्लैंड में रहने वाले इंग्लिश और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी, वैसे ही हिंदुस्तान में रहने वाले हिंदू, यह बात डेढ़-दो हजार साल पहले कही जाती, तब इसका औचित्य था। यह वह समय था जब उपर्युक्त तीनों राष्ट्र अपने आधुनिक रूप में नहीं थे। अमेरिका था, पर वह वहां के मूल बाशिंदों का था। उन्होंने अपना या अपने देश का कोई नाम नहीं रखा था। इनमें अमेरिका की कहानी सबसे दिलचस्प है। 

इस मान्यता में कोई दम नहीं है कि अमेरिका, या कहिए अमेरिकाओं (उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका) का आविष्कार कोलंबस ने किया था। उसके पहले कई और दुस्साहसी यात्री वहां पहुंच चुके थे। इन्हीं में एक था अमेरिगो वेसपुच्चि (1454-1512)। कोलंबस (1450 या 1451 से 1506) की तरह वह भी इटली का था। अमेरिका का नाम उसी के नाम पर रखा गया। अमेरिगो लैटिन में आकर अमेरिकस हो गया, जिससे अमेरिका शब्द बना। कोलंबस की ऐतिहासिक भूमिका यह थी कि उसने यूरोपीय लोगों को अमेरिका के बारे में और वहां तक पहुंचने का समुद्री मार्ग बताया। यह अमेरिका के मूल निवासियों की सबसे बड़ी त्रासदी थी। यूरोपीय लोगों ने उनकी जमीन छीनने और उन्हें दास बना कर उनसे मजदूरी कराने का नृशंस काम किया। 

अमेरिका के मूल निवासियों ने भी अपना या अपने वतन का कोई नाम नहीं रखा था। वे छोटी-छोटी बस्तियों में रहते थे और यह नहीं जानते थे कि देश या राष्ट्र क्या होता है, सरकार क्या होती है, संविधान किसे कहते हैं। उसी तरह, हम हिंदुस्तानियों ने भी अपना कोई नाम नहीं रखा था। यद्यपि वैदिक संस्कृति अमेरिकाओं की मूल संस्कृति से काफी विकसित थी, पर हम भी नहीं जानते थे कि एक समूह के तौर पर हम कौन हैं या हमारा नाम क्या है। दो शब्द जरूर प्रचलित थे- आर्य और असुर। ऐसा लगता है कि आर्यों ने अपना नामकरण इस आधार पर किया होगा कि वे भारत के मूल निवासियों के अरि (शत्रु) थे। बेहतर जमीन और जलवायु की तलाश में उन्होंने हिमालय पार किया और यहां के लोगों का कहीं संहार कर और कहीं उनसे समझौता कर यहीं बस गए। 

आर्यों ने जब लगभग पूरे उत्तर भारत पर कब्जा कर लिया, तब इस इलाके का नाम आर्यावर्त रख दिया। दक्षिण भारत पर उनका कब्जा नहीं था। बीच में विंध्याचल का पहाड़ था। आर्यावर्त के लोग सुखी-संपन्न थे, क्योंकि उनका इलाका अच्छा था। जमीन उर्वर थी, फल-फूलों की भरमार थी, तरह-तरह के पशु जंगलों में विचरण करते थे। दक्षिण की जलवायु गरम थी और यह निश्चित नहीं था कि वहां जाने पर क्या मिलेगा। इसके अलावा, वह जमाना साम्राज्यवाद का नहीं था। लोग लालच से नहीं, जरूरत से कहीं और के लिए कूच करते थे। 

जिन्हें और ज्यादा समृद्धि की कामना होती थी, वे पहाड़ी रास्ते से हिमालय के उस पार जाते थे या लंबी-लंबी समुद्र यात्राएं करते थे, जिसकी प्रतिध्वनि सत्यनारायण की कथा में सुनाई पड़ी है। यह कथा बहुत पुरानी नहीं है- शायद सौ वर्ष भी पुरानी नहीं, पर जिसने भी यह कथा लिखी होगी, उसके ध्यान में प्राचीन भारत की समुद्र यात्राओं की स्मृति जरूर रही होगी। कल्पना के साथ सत्य का रिश्ता सहोदर का है। शिप शब्द बना, उसके पहले ही पोत शब्द बन चुका था, जो अंगरेजी के पोर्ट शब्द का जनक रहा होगा।  

आर्य जब आर्य नहीं रह गए, अपने को आर्यों का वंशज कहने लगे, तब एक ऐसा शब्द- हिंद, हिंदी, हिंदू या हिंदवी- प्रचलन में आया, जो आज एक निरर्थक विवाद का विषय बना हुआ है। इसमें दरअसल विवाद की कोई बात नहीं है, लेकिन जिन्हें दिन में भूत दिखाई पड़ता है, उनके लिए कुतर्क ही तर्क है। बच्चे भी जानते हैं कि सिंधु नदी ही हिंदु या हिंदू नामकरण का कारण बनी। यह नदी भारत के उत्तर-पश्चिम में बहती है। हमारी नदियों के नाम कितने पुराने हैं! ईरान के लोगों ने सिंधु को हिंदु बना दिया, जो एक भौगोलिक संज्ञा थी। पता नहीं यह कब हुआ कि हमने अपने भौगोलिक नाम को ही अपनी धार्मिक पहचान के रूप में बदल दिया। 

जब तक कोई विदेशी जत्था भारत नहीं आया था, तब तक हमने अपने को हिंदू कहना शुरू नहीं किया था। जरूरत ही नहीं थी। वैदिक धर्म को मानने वाले थे; बौद्ध, जैन, चार्वाक थे- ये सभी परंपरागत अर्थ में हिंदू थे, पर इनमें से कोई उस अर्थ में हिंदू नहीं था, जिस अर्थ में आज लगभग एक अरब की आबादी अपने को हिंदू कहती है। बुद्ध और महावीर ने हिंदू धर्म से नहीं, वैदिक धर्म से विद्रोह किया था, जिसे मानने वाले जाति प्रथा के अनुयायी,


स्वर्ग और नरक में विश्वास करने वाले, देव पूजक और मांसाहारी थे। इन दोनों ही धर्मों ने, बाद में सिख धर्म और आर्य समाज ने भी, समानता पर जोर दिया, जबकि हिंदू धर्म में विषमता के कई स्तर हैं, जिनके विरुद्ध भारत के सवर्ण समाज ने अभी तक कोई बगावत नहीं की है। 

वैदिक धर्म के बारे में सही-सही कहा जा सकता है कि वह धर्म नहीं था, संस्कृति थी, जिसे जीवन पद्धति भी कहा जा सकता है। वास्तव में सभी पुरानी संस्कृतियों को संस्कृति या सभ्यता ही कहा जाता है, जैसे चीन की सभ्यता, ईरान की सभ्यता, सिंधु (हिंदु) घाटी की सभ्यता, एजटेक और मया सभ्यता। इन सभी में धार्मिक गतिविधियां होती थीं, देवी-देवता भी थे, पर कोई धर्म नहीं था, जैसे यहूदी धर्म, हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाइयत आदि। स्पष्ट है कि सभ्यता पहले आई, धर्म बाद में। वास्तव में धर्मों का उदय सभ्यता का पतन था। सभ्यता सभ्य बनाती है, पर धर्म सभ्य नहीं, किसी खास विश्वास प्रणाली का अनुयायी बनाता है। 

जब बौद्ध और जैन धर्म प्रगट हुए, तब जिन लोगों ने इनमें से किसी भी धर्म को नहीं अपनाया, वे अपने को सनातनी या सनातन धर्मी कहने लगे। जब इस्लाम शासक के रूप में भारत आया, तब यही सनातन धर्म हिंदू धर्म में बदल गया। मुसलमान हमें हिंदू कहने लगे, तब हमने भी अपने आप को हिंदू मान लिया। हम वैदिक धर्म को भूल गए, उपनिषदों के चिंतन को भूल गए, यहां तक कि स्मृतियों और पुराणों को भी भूल गए और हिंदू बन बैठे। मैं इसे भारतीय सभ्यता का पतन मानता हूं। 

हमारे पूर्वज अगर सनातनी या सनातनधर्मी बने रहते, तो वे सभ्यता को आगे बढ़ा सकते थे। वे कह सकते थे कि हम न आर्य हैं न अनार्य, हम तो मनु की संतान यानी मानव हैं और हमारी पहचान जाननी हो तो हमें मनुस्मृति में बताए गए धर्म के दस लक्षणों की कसौटी पर कसो। यह वह मौका था, जब समूह के बरक्स व्यक्ति को मान्यता दी जा सकती थी, क्योंकि धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध- ये दस गुण व्यक्ति में ही हो सकते हैं, समूह में नहीं।

धर्म के आधार पर बने समाजों ने व्यक्ति की इयत्ता खत्म कर दी है, लेकिन सनातन धर्म हर आदमी को अनुमति देता है कि वह खुद तय करे कि उसका चरित्र क्या होगा। तब समाज का विभाजन इस आधार पर किया जाता- धृतिवान-धृतिहीन, क्षमा करने वाला-क्षमा न करने वाला, विद्वान और अज्ञानी, सत्यवादी और सत्य की अवहेलना करने वाला आदि। हालांकि आदमियों का तुलनात्मक मूल्यांकन करना गंदी आदत है, फिर भी आज इन दस गुणों के आधार पर हम किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन कर सकते हैं। जहां तक समुदाय का सवाल है, किसी भी समुदाय के सभी सदस्यों में इनमें से कोई एक गुण भी नहीं पाया जाता। 

समय की मांग के अनुसार धर्म के इन दस लक्षणों की सूची को बढ़ाया भी जा सकता है और इसके आधार पर विभाजन भी किया जा सकता है: जैसे सांप्रदायिक-असांप्रदायिक, जाति प्रथा को बरतने वाला-जाति प्रथा को न बरतने वाला, मानव अधिकारों को मानने वाला-मानव अधिकारों को न मानने वाला, स्त्रियों को सम्मान देने वाला-स्त्रियों को सम्मान न देना वाला, समतावादी-विषमतावादी आदि। सनातन धर्म को अपनी उदारता और मानवीयता में किसी भी प्रतिष्ठानित धर्म से आगे रहना चाहिए। यह धर्म ऐसा है कि कोई मुसलमान, सिख, ईसाई या पारसी भी कह सकता है कि हां, हम मानवता के इन लक्षणों को बड़े आदर से स्वीकार करते हैं और अपने सहधमिर्यों को प्रेरित करेंगे कि वे इन्हें अपनाएं। दरअसल, दुनिया के सभी धर्मों में इन गुणों को आदर का स्थान दिया गया है। इस स्तर पर सनातन धर्म विश्व धर्म है। 

धर्म की इतनी विशद भूमिका के कुछ वंशज अगर हिंदुस्तान के सभी लोगों पर जोर दे रहे हैं कि वे अपने को हिंदू कहें, तो ताज्जुब होता है कि ये हिंदू धर्म और हिंदुस्तान का इतिहास थोड़ा-बहुत जानते भी हैं या नहीं। धर्म की किसी भी भारतीय परिभाषा के अनुसार या तो कोई हिंदू नहीं है या दुनिया के सभी लोग हिंदू हैं। जहां तक अमेरिका-अमेरिकी, जर्मनी-जर्मन का संबंध है, तो दसवीं का विद्यार्थी भी बता सकता है कि जर्मन, अमेरिकी, इंग्लिश या फ्रेंच- ये भौगोलिक नाम हैं, धार्मिक नहीं। जर्मन या अमेरिकन नाम का कोई धर्म नहीं है, देश हैं। हिंदी भौगोलिक नाम है और हिंदू रीलिजन की तर्ज पर धर्म। इकबाल की पंक्ति याद कीजिए- हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा। नेताजी को याद कीजिए- जय हिंद। कोई कहता है कि अपने को हिंदी या हिंदवी कहो, तो न हंसी आएगी न गुस्सा। पर हिंदू कहने पर जोर देना हिंदू होने को सीमित कर देना है। धर्म को धर्म के दस लक्षणों से जोड़ने वालों को सलाम है; ये लक्षण धर्म के नहीं, मानवता के हैं। इन्हें हिंदू समाज तक सीमित रखने वाले मनुष्य-विरोधी हैं, इन्हें सुधारगृह में भेजना चाहिए। 


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