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उम्मीद की फसल PDF Print E-mail
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Monday, 18 August 2014 10:50

निवेदिता

जनसत्ता 18 अगस्त, 2014 : किसान खेत, जंगल और नदी के साथ जीते हैं। शहरी जीवन में खेतों, नदियों, जंगलों का होना, न होना मायने नहीं रखता। शहरी लोग हर चीज अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं। इसलिए यहां नदियां, जंगल, पहाड़ दूर होते जा रहे हैं। हमारे जल-स्रोत शहरों के मल-मूत्र बहाने के नाले बन गए हैं। यह स्थिति तब है जब आबादी के एक बड़े हिस्से के पास शौचालय नहीं है। हम कल्पना कर सकते हैं कि अगर देश में हर आदमी के पास फ्लश वाला शौचालय होगा तो पानी कहां से आएगा! इसकी चिंता न सरकार को है, न हमारी शहरी आबादी को। लेकिन रुपौलिया गांव के किसान पानी को पृथ्वी और अपने खेतों के लिए बचाना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने कम पानी में शौच की व्यवस्था को लेकर कई नए प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग हमारी नदियों को बचाने और खेतों को ज्यादा उर्वर बनाने के लिए हैं।

बेतिया से लगभग पचास किलोमीटर दूर स्थित रुपौलिया गांव एक नंगे पठार के केंद्र में है। इसके तीनों ओर चमकती हुई पहाड़ियों का घेरा है। पास में एक नदी बहती है और चारों ओर घने जंगल हैं, मीठे पानी के कई झरने हैं। यहां का बासमती चावल दुनियाभर में खुशबू बिखेरता है। गांव के एक हिस्से में म्यांमा से आए लगभग बहत्तर परिवार बसते हैं जो आज से चौंतीस साल पहले यहां आए थे। इन्हें सरकार ने बसने की जगह दी। गांव के दूसरे छोर पर बांग्लादेश से आए करीब उनचालीस परिवार हैं। सभी किसान हैं। इन्होंने अपने जीवन में कई छोटे-छोटे प्रयोग किए, जिसने एक गांव की पूरी संस्कृति बदल दी।

मल-मूत्र की सफाई को लेकर समाज में शुरू से विभाजन की गहरी लकीर रही है। यह काम आज भी एक खास जाति के लोग ही करते हैं, जिन्हें ‘अछूत’ माना जाता है। लेकिन मानव मल-मूत्र से बनने वाले खाद ने कई सामाजिक मान्यताओं को गहरा झटका दिया है और ये खाद अब वहां के लोगों की रसोई का भी हिस्सा हैं। जो सब्जियां वे अपने लिए उगाते हैं, उसमें भी इस खाद का प्रयोग होता है। वे कहते हैं कि आदमी चलता-फिरता खाद है, जिसकी कोई लागत नहीं और पैदावार बढ़िया। हालांकि यह प्रयोग अब दुनिया के कई हिस्सों में होने लगा है। इसने महिलाओं के जीवन में हिंसा को भी कम किया है। उन्हें अब मुंह अंधेरे खेतों की ओर नहीं जाना पड़ता है।

गांव के किसानों ने मेघ पईन अभियान, वाटर एक्शन और वाश इंस्टीट्यूट की मदद से इस काम की शुरुआत की। वाटर एक्शन से जुड़े विनय कुमार ने बताया कि शुरू में यह भरोसा नहीं था कि लोग ऐसे प्रयोग के पक्ष में होंगे। पर धीरे-धीरे लोगों को इस बात का भरोसा हुआ। फिर किसान आगे आए। उन्होंने जमीन के एक टुकड़े पर यूरिया खाद का इस्तेमाल


किया, दूसरे टुकड़े पर मानव मल से बने खाद का। यह पाया गया कि जिस खेत में मानव मल का उपयोग हुआ, उसकी फसल अच्छी हुई और खेतों में पानी की जरूरत भी कम पड़ी। गांव के पूर्वी टोला के किसान पंचम लाल महतो ने बताया कि इसके लिए बारह हजार रुपए की लागत से एक नई तकनीक के जरिए दो चेम्बर वाला शौचालय तैयार किया जाता है। एक चेम्बर भर जाने के बाद दूसरा चेम्बर इस्तेमाल करते हैं। लगभग एक साल बाद बेहतरीन खाद तैयार हो जाता है। गांव की एक महिला ने बताया कि उसका कटहल का पेड़ पूरी तरह सूख गया था। उसमें उन्होंने मानव मल-मूत्र से बने खाद का इस्तेमाल किया। आज फिर वह पेड़ हरा और फलदार हो गया है। किसानों ने बताया कि पौधों में पेशाब के इस्तेमाल के भी बेहतर नतीजे आए हैं। पेशाब को जमा कर उसे दुगुने पानी के साथ मिला कर पौधे को सींचा जाता है। इससे न सिर्फ बढ़िया फसल होती है, बल्कि ये पौधों को कीड़ों से भी बचाता है।

किसान जानता है कि खेती करना खर्चीला होता जा रहा है। यूरिया खाद महंगा और जहरीला भी है। हर साल खेतों में यूरिया की मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। पानी काफी लगता है। बेतिया के करीब पचहत्तर फीसद आबादी सीधे खेती और मछली पालन जैसे कामों से जुड़ी है। किसान कहते हैं कि हमारे पास उपाय क्या है! खेतों को जितना खाद चाहिए, वह पूरा नहीं हो पाता, क्योंकि यह प्रयोग गांव के कुछ हिस्से में ही हुआ है। गुलजारो देवी कहती हैं कि शुरू में तो उन्हें घृणा आती थी कि मल से बने खाद का इस्तेमाल हम अपने रसोई में पकने वाले अनाजों और सब्जियों के लिए कैसे करें। पर बाद में पता चला कि हम जो खाद खरीद कर डालते हैं, उनसे हमारी जमीन को नुकसान होता है। हम कर्ज में डूब जाते हैं। जब से हमारा परिवार मानव मल से बने खाद का इस्तेमाल करने लगा, हमारी जमीन लहलहाने लगी। उन्होंने कहा कि जमीन हमारी बेटी है। जो उसके जीवन को हरा-भरा करेगा, हम उसके साथ ही खड़े होंगे!


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