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दक्षिणावर्त : समानता का सूत्र PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:55

altतरुण विजय

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : हर पंद्रह अगस्त को श्रीअरविंद का स्मरण होता है, जिनका भी जन्मदिवस स्वतंत्रता के उषाकाल के साथ मनाया जाता है और स्मरण होता है कि आज चाहे जो भी स्थिति हो, लेकिन भारत अपनी नियति को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है। श्रीअरविंद के शब्द बल और विश्वास देते हैं। वह भारत जो सदियों से लड़ता, जीतता और हारता रहा, फिर जीता, उठा और इकबाल से भी लिखवा दिया कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, अंतत: अपनी मूल आत्मा के स्वर को पहचानते हुए उस दिन का साक्षात्कार करेगा ही जब अविद्या और दरिद्रता के दुख इस धरती पर नहीं रहेंगे। यह होना ही है, होकर ही रहेगा। 

दुनिया भर घूम आइए- भारत से सुंदर देश कहां मिलेगा? शिलांग से वालोंग, सिक्किम से लेह और करगिल, श्रीनगर से जैसलमेर और अजंता-एलोरा से रामेश्वरम, हंपी से लक्षद्वीप और कोंकण रेलवे के रास्ते से गुजरते हुए पंजिम और उडुपी, ताजमहल और फतेहपुर सीकरी से ग्वालियर के किले तो हुसैन सागर से कटक और फिर तो जय जगन्नाथ। जो सारे विश्व में है वह भारत में है, लेकिन जो भारत में है वह शेष विश्व में भी हो, यह आवश्यक नहीं। 

सिकुड़ गए और गली-मोहल्ले की बातों में उलझ गए। वरना हमारे पूर्वजों के पदचिह्न और उनकी विद्या तथा करुणा का मैत्रीपूर्ण प्रभाव जापान से लेकर कोरिया, चीन से लेकर थाईलैंड, म्यांमा और कंबोडिया तो अफगानिस्तान से लेकर पूर्ववर्ती मेसोपोटामिया तक मिलता है। चीन में आज भी अगर कम्युनिस्ट पार्टी का साहित्य किसी भारतीय का आदर से नाम लेता है तो वह है कुमार जीव और कश्यप। कुमार जीव हजार साल पहले चीन के अध्यापक या राजगुरु के नाते सम्मानित किए गए थे, जिनकी अद्भुत कथा विद्यावारिधि डॉ. लोकेशचंद्र ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में प्रस्तुत की थी। 

लेकिन यह बात कह कर आप एक बार देखिए कि बैंकाक में विश्व के विराट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड््डे का नाम अगर स्वर्णभूमि है और अगर वहां सागर मंथन का अद्भुत दृश्य मूर्तिमंत है, तो तुरंत आधुनिक प्रभाव के वे बौद्धिक, जो लगभग भारत की हर श्रेष्ठता से घृणा करना अपनी कलम का संप्रदाय मानते हैं, कहेंगे कि आप विस्तारवादी हो रहे हैं, हिंदूवादी बात कर रहे हैं, भारत के प्राचीन औपनिवेशिक साम्राज्य की उपहासास्पद स्मृति जगा रहे हैं, यानी भारत की महानता का स्मरण उन्हें सहन नहीं होता। 

एक बार फिर वर्तमान बौद्धिक माहौल में कहिए कि भाई, अगर शताब्दियों पहले तक्षशिला में तीस लाख पुस्तकें किसी आक्रमणकारी ने जलाई थीं तो जरा इतना तो सोचो कि हस्तलिखित तीस लाख पुस्तकों को जमा कर विश्वविद्यालय स्थापित करने वाला भारत कितने वर्ष पूर्व से शब्द और उनके अर्थ, ज्ञान और विज्ञान, काव्य भंडार एकत्र कर रहा होगा? आज अगर अपनी मजाक ठीक ब्रिटिश सार्जेंट या भारत के प्रति घनीभूत घृणा से ग्रस्त पूर्वग्रही पाश्चिमात्यों की तरह उड़वानी है, तो बस इतना भर कह कर देख लीजिए कि सॉरी सर, शायद वे भारतीय ही थे, जिन्होंने जंग न लगने वाले लौह स्तंभ का निर्माण किया था और पाइथागोरस की थ्योरम से पहले भास्कराचार्य कुछ लिख और कर गए थे। प्लीज सर देख लीजिए, शायद वह कुछ विद्वत्ता की बात थी। सर, शायद आप द वंडर दैट वॉज इंडिया देखना चाहें या इस पहेली का जवाब ढूंढ़ना चाहें कि क्या दुनिया भर से कोलंबस या मार्को पोलो, बाबर या मोहम्मद बिन कासिम किसी लुटे-पिटे, दरिद्री, भुखमरे, अनपढ़, जाहिल, देश में आ रहे थे और यहां से मिट््टी या कचरा लूट कर ले जा रहे थे या वे उन लोगों के देश में आ रहे थे, जिसे दुनिया भर में सोने की चिड़िया कहा जाता था और जो आॅक्सफोर्ड और कैंब्रिज से दो हजार साल पहले नालंदा बना चुके थे, एलोरा का आश्चर्य और श्रीरंगपट्टनम के चमत्कार सृजित कर चुके थे? और सृजन करने वाले वे हाथ रोम, वेटिकन, पेरिस या किसी डच इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री लेकर नहीं आए थे। 

सर, हमें नापना आता था, हमें गिनना भी आता था, जहां अंगरेज नहीं गिन पाते थे और लैटिन शब्दों को दोहरा-दोहरा कर गिनती पूरे करते थे, वहां हम नील,


पद्म और शंख तक गिनते थे। सर कहते हैं, दशमलव भी उन्होंने दिया, जिन्हें अंगरेजी नहीं आती थी और शून्य ही नहीं, बल्कि अंकगणित भी हमारे ही उन पूर्वजों ने दिया, जो मास्को पढ़ने नहीं गए थे और इसीलिए अरबी में अंकों को हिंदसे कहा जाता है और अंगरेज उसे इंडियन न्यूमरल्स कहते हैं। सर, हमारी बात मत मानिए पर अंगरेज, अमेरिकी, जर्मन इस बारे में यानी हमारे कृतित्व के बारे में कुछ लिख गए हैं, उसी पर यकीन कर लीजिए। 

अपने ही तिरस्कार और अपमान में आनंद अनुभव करने वाले लोगों से आप क्या बहस कर सकते हैं। 

विश्व के सबसे भयानक आक्रमण हमने झेले और फिर भी अगर खड़े हो गए तो इसकी वजह है भारत को आसेतु हिमाचल बांधने और व्याख्यायित करने वाली कोई ताकत। कोई धागा है, कोई समानता का सूत्र है। वह सूत्र घृणा और आक्रामकता का पात्र नहीं हो सकता। 

भारत को फिर उठना ही होगा, ताकि बहुलतावाद और लोकतांत्रिक पारस्परिकता के साथ भेदरहित सामूहिक विकास फल-फूल सके, सुरक्षित रहे। 

ताकि एक ही प्रकार की विचारधारा- स्टालिनवाद- आइएसआइएस और अलकायदा का इस्लामी फासीवाद- किसी भी भिन्न मत और विचार के प्रति असहिष्णुता और निर्मूलन का पाशविक हिंसावाद परास्त हो सके। 

लाल किले की प्राचीर से वह छप्पन इंच की बुलेटप्रूफ छाती लिए सिंह गर्जना कर गया, उस सिंह के हृदय में वेदना का ज्वार किसी ने देखा? वह भारत जो बेटियों को सम्मान दे, बेटों की नालायकियों पर नकेल कसे। वह भारत जो विश्व की निर्माणशाला बने, जो ‘मेक इन इंडिया’ और ‘मेड इन इंडिया’ को नवीन समाज का अधिष्ठान बनाए, जो दफ्तरों में वक्त पर आना खबर की बात नहीं, बल्कि सहज-सामान्य दिनचर्या का हिस्सा करे, जो बंदूक से धरती लाल करने वाले नहीं, बल्कि हल से धरती हरी करने वाले मेहनती हिंदुस्तानी उपजाए, वह भारत, वह हिंदुस्तान हमारा अभीष्ट हो। 

और फिर स्वच्छता। फिर शौचालय। नरेंद्र मोदी इस मानसिक-रोगी मीडिया से परिचित हैं, जो हर बात में कुछ नकारात्मक, कुछ विकृत ढूंढ़ते या गढ़ते हैं। इसीलिए कहा कि भाई लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री साफ-सफाई और शौचालयों की बात करें, तो कुछ लोग कहेंगे कि क्या ये इतनी महत्त्वपूर्ण बातें हैं? हैं। इसीलिए कही गर्इं। बेटी, मां की तकलीफें तो महत्त्वपूर्ण होती ही नहीं हैं। प्रधानमंत्री आएं, लिखा हुआ भाषण कोरेपन से पढ़ें, बुलेटप्रूफ बक्से में बंद रहें, बच्चों से सिर्फ दूर से मिलें, तो वे भारी-भरकम, बड़े आदमी कहे जाएंगे। 

बड़े आदमी होने से हजार गुना बेहतर है भला भारतीय होना, जो देश की सोई आत्मा जगा दे। 

शब्द के व्यवहार में बेईमानी नहीं होनी चाहिए। मीडिया में यही झूठ, तिरस्कार और अभद्रता को बेबाकी और मीडिया-साहस समझने वाले अनपढ़ बढ़ रहे हैं। जया बच्चन ने राज्यसभा में एफएम पर अश्लील, फूहड़ और बदतमीजी भरे आरजे के कार्यक्रमों पर आपत्ति की तो सही किया और सदन ने सहमति जताई। पर टाइम्स आॅफ इंडिया ने इसे विकृत रूप देकर बहस का मन्तव्य ही बदल दिया। इससे भी हजार गुना विकृतियों की अग्निमाला से जूझ, निखर कर निकले हैं नरेंद्र मोदी। 

सफल होने के सिवाय और कोई विकल्प है ही नहीं।  

इसीलिए पहली बार बहुत-सी बातें हो गर्इं। श्रीअरविंद का स्मरण लाल किले की प्राचीर से पावनता की वह सुवास फैला गया, जो सारे भारत को आत्म-साक्षात्कार कराएगी। 

इसीलिए भारत पुन: पुन:। इसीलिए भारत भाग्योदय का अटल विश्वास हृदय में है। इसीलिए नवीन शब्द, नवीन भाषा, नवीन छंद रचे जाने की आहट है।


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