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मतांतर : कितनी संपर्क भाषाएं PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:42

विष्णु नागर

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : कुलदीप कुमार ने अपने स्तंभ में ‘हकीकत और हंगामा’ (10 अगस्त) शीर्षक से लिखी नौ पैराग्राफ की टिप्पणी के चार पैराग्राफ में ‘जनसत्ता’ में ही प्रकाशित मेरे आलेख ‘क्या अंगरेजी संपर्क भाषा है?’ (6 अगस्त) का मेरा उल्लेख किए बिना जवाब देकर बहस को आगे बढ़ाया है। उनका कहना है कि ‘हिंदी के पैरोकारों’ को यह सोचना चाहिए कि बार-बार (?) यह दावा करके कि हिंदी देश की संपर्क भाषा है, वे हिंदी का कुछ भला नहीं कर रहे हैं। हालांकि कोष्ठक में उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि जनता के स्तर पर हिंदी ही संपर्क भाषा है, मगर यह जोड़ते हुए कि शासन और ज्ञान-विज्ञान के स्तर पर नहीं है। 

मैंने भी ऐसा कोई दावा नहीं किया था, मगर मेरी सीमित बुद्धि के अनुसार संपर्क भाषा तो उसे ही कहा जा सकता है, जो जनता के बीच सेतु बनाने में कारगर साबित हो। वह नहीं, जो सत्ता के एक वर्ग के बीच ही पुल बनाए और रोज दावे करे कि वही देश की संपर्क भाषा है। 

वैसे जिस वर्ग के आधार पर कुलदीपजी ने हिंदी को संपर्क भाषा स्वीकार करते हुए भी उसे आखिरकार अस्वीकार किया है, उस वर्ग का वास्ता लोगों से कई स्तरों पर पड़ता है, वह खुद भी अंगरेजी के द्वीप में सतत नहीं रह सकता। ज्ञान-विज्ञान के कई क्षेत्र तो तब तक पूर्णता नहीं प्राप्त करते, जब तक कि लोगों के पास न जाया जाए, उनसे सीखा न जाए, उन्हें गहराई से देखा-समझा न जाए। उनके पास जो भी ज्ञान-विज्ञान है, उसका सहानुभूतिपूर्वक आलोचनात्मक विश्लेषण न किया जाए। 

समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास समेत ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्र हैं, जिनका ज्ञानात्मक-संवेदनात्मक संबंध सामान्य लोगों से जुड़ता है और इस बात को विद्वान लेखक मुझसे अधिक बेहतर ढंग से जानते हैं। इसलिए शासकों को ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान से जुड़े लोगों को भी लोगों की भाषा से संबंध रखना होता है (यह केवल कवियों-कथाकारों-कलाकारों के लिए जरूरी नहीं है) भले वे अपना काम एक ऐसी भाषा में करते हों, जो सामान्य भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली भाषा नहीं है। हालांकि यह अलग बात है कि आजकल अंगरेजी समर्थक अंगरेजी को भी एक भारतीय भाषा ही मनवाने का अथक प्रयास कर रहे हैं। मुझे कुलदीपजी की इस बारे में राय का पता नहीं है। हां, शक जरूर होता है कि उनकी मान्यता भी यही हो। 

कुलदीपजी के लेख का सबसे दिलचस्प और ज्ञानवर्धक हिस्सा शुरुआत का है, जिसमें वे बताते हैं कि उन्हें अंगरेजी बोलने का अभ्यास न होने और बीए के स्तर पर इतिहास न पढ़ने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में प्रवेश दिया गया था। हालांकि इंटरव्यू में तमाम अंगरेजीदां और स्नातक स्तर पर इतिहास (आॅनर्स) पढ़े हुए छात्र आए थे। उन्हें इस हालत में प्रवेश देने वाले कोई मामूली, सिफारिशों को तवज्जो देने वाले कथित विद्वान नहीं, बल्कि रोमिला थापर, सव्यसाची भट््टाचार्य और सुवीरा जायसवाल जैसे देश के प्रमुख इतिहासकार थे। 

असली सबक उस घटना का यह है कि कैसे वे विद्वान इस फैसले पर पहुंचे कि कस्बे से आए इस छात्र को दूसरों के मुकाबले प्राथमिकता देनी चाहिए। मेरे खयाल से यह उनकी व्यक्तिगत उदारता (जैसा कि लेखक ने कहा है) नहीं थी, बल्कि उनकी गहरी अंतरदृष्टि थी कि अंगरेजी और इतिहास ज्ञान से लगभग कोरे एक कस्बाई छात्र को उन्होंने प्रवेश में महत्त्व ही नहीं दिया, बल्कि उससे हिंदी में पौन घंटे तक बात करके उसकी थाह लेने की कोशिश की। आज वही कुलदीप हिंदी के साथ अंगरेजी के पत्रकार भी हैं और वे उन थोड़े पत्रकारों में हैं, जो हिंदी में इतिहास के सवालों पर अधिकार से लिख सकते हैं। 

इस और ऐसे ढेरों उदाहरणों से यह साबित होता है कि जब चुनौती सामने आती है तो ज्यादातर बार आदमी अंगरेजी ही क्या, बहुत कुछ सीख लेता है। हमारे पर्यटनस्थलों पर ऐसे तमाम अर्द्धशिक्षित युवक-युवती मिलेंगे, जो भारतीय ही नहीं, कई विदेशी भाषाओं का कामचलाऊ ज्ञान रखते हैं। तो सवाल अंगरेजी मात्र के विरोध का नहीं है और ऐसा कोई आज कर भी नहीं रहा है, जैसा कि अंगरेजी मीडिया के लोग बार-बार बताने की कोशिश करते और देश के बंट जाने का कल्पित भय दिखाते हैं। आज देश में कहीं अंगरेजी-विरोधी लहर नहीं चल रही है, बल्कि लहर अगर कोई है तो अंगरेजी पढ़ने की। मगर विरोध अंगरेजी का अनावश्यक हव्वा खड़ा करने का जरूर है।


क्या अंगरेजी का ज्ञान ही किसी के ज्ञान की अंतिम कसौटी हो सकता है या कुछ और भी सच है, जिसे आज से चालीस साल पहले भी रोमिला थापर जैसे विद्वान देख-समझ सके थे, जिनका इतिहास ज्ञान ही नहीं, अंगरेजी ज्ञान भी हमेशा से अविवादास्पद रहा है। 

सच तो यह है कि अंगरेजी का बढ़ता वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान की परंपरा आगे विकसित नहीं हो पा रही है। जो अपने स्तर पर ऐसा प्रयास करते हैं, उनकी सहज ही उपेक्षा होती है। आजादी के संघर्ष के दौरान और उसके बाद हिंदी में भी ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में काम करने वाले अनेक बड़े विद्वान हुए थे, जिनमें राहुल सांकृत्यायन, भगवतशरण उपाध्याय, वासुदेवशरण अग्रवाल, श्यामाचरण दुबे, पीसी जोशी, रामविलास शर्मा, गुणाकर मुले आदि कुछेक नाम उदाहरण स्वरूप लिए जा सकते हैं। इनका काम अगर आगे नहीं बढ़ाया जा सका है तो इसके कारण हमारे समाज, राजनीति आदि में ढूंढ़ने होंगे, हिंदी की कथित असमर्थता में नहीं। वैसे कोई भी भाषा अपने आप में असमर्थ नहीं होती, उसे ऐसा बनाया जाता है, बनने दिया जाता है। आज विश्वभाषा के नाम पर अंगरेजी, भारतीय भाषाओं के साथ यही कर रही है। 

हालत यह है कि अंगरेजी का आज का साहित्य- जिसमें प्रतिदिन बहुत-सा कूड़ा भी जमा हो रहा है- संपूर्ण भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे और लिखे गए साहित्य को लील गया है और खासकर विदेशों और देश के अंगरेजीदां वर्ग में भारतीय साहित्य का पर्याय बन चुका है, जबकि तमाम भारतीय भाषाओं ने आजादी के बाद कई बड़ी प्रतिभाएं पैदा की हैं। इस स्थिति का दोषी कौन है? क्या हिंदी वाले, भारतीय भाषा वाले या वह बाजार, जो गरीब से गरीब को भी मजबूर कर रहा है कि वह पेट काट कर अपनी संतान को अंगरेजी पढ़ाए, जबकि ऐसा करके भी उसकी संतानें एक साथ, एकजुट होकर प्रभुवर्ग की संतानों के मुंह का निवाला छीनने नहीं जा रही हैं। 

क्या प्रभुवर्ग इतना कमजोर-दयनीय है, जो अपनी मलाई इन्हें आसानी से खाने देगा, हां इक्का-दुक्का को अपना बना ले, यह तो हमेशा से होता आया है। आधी-अधूरी, टूटी-फूटी अंगरेजी पढ़ कर भी इन्हें वही दाल-रोटी मिलनी है और जिनको मलाई मिल रही है, मिलती रहेगी। अंगरेजी पढ़ने मात्र से सत्ता का लोकतांत्रिकीकरण हो जाएगा- जैसा कि विद्वान लेखक मानते हैं- तो यह ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ की तरह एक भ्रम, एक झूठ से ज्यादा कुछ नहीं है। फर्क यह है कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का भ्रम दो महीने से भी कम समय में टूटने लगा है, इस तथाकथित लोकतांत्रिकीकरण का भ्रम जल्दी नहीं टूटेगा, जो कि अधिक खतरनाक स्थिति है। 

कुलदीपजी कहते हैं कि ‘सच्चाई यह है कि हमारा देश चीन, जापान, फ्रांस और जर्मनी की तरह नहीं है। इसका (अंगरेजी) एक औपनिवेशिक इतिहास है, जिसके दौरान अंगरेजी ज्ञान-विज्ञान, शासन-प्रशासन और वर्ग श्रेष्ठता की भाषा बन गई है।’ उनकी बात से शत-प्रतिशत सहमत हुआ जा सकता है, मगर क्या इसका अर्थ यह है कि सारी भारतीय भाषाओं को अंगरेजी की स्थायी अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए? क्या समय के साथ ऐसा नहीं हो सकता कि यह बहुभाषी-बहुसांस्कृतिक देश आज नहीं तो भविष्य में कभी अपना कोई अलग ऐसा मॉडल विकसित करने की सोचे, जिसमें कि हम अपनी भाषाओं का सम्मान करते हुए वैश्विक जगत में भी अपनी जगह बना सकें? क्या अंगरेजी का प्रभुत्व अंतिम रूप से स्वीकार करते हुए हमें यह कल्पना करना आज से ही छोड़ देना चाहिए? क्या अपने औपनिवेशिक अतीत से संघी तरीके से नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण ढंग से लड़ना प्राय: असंभव है? क्या हम इतने विकल्पहीन हैं, बेचारे हैं?


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