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प्रतिक्रिया : संप्रेषणीयता का सवाल PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:39

शुकदेव श्रोत्रिय

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : अशोक वाजपेयी के स्तंभ ‘कभी कभार’ (22 जून) में दो टिप्पणियां- ‘गोवा में कला शिविर’ और ‘संप्रेषण की उलझनें’ छपी थीं। इन टिप्पणियों से पहले 2 अप्रैल को एलियांस फ्रांसेज सभागार में ‘स्वरमुद्रा’ के विमोचन के अवसर पर भी उन्होंने कला समीक्षा और विशेषकर हिंदी कला समीक्षा की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी। उसमें उन्होंने कहा था: ‘हमारे यहां शास्त्रीय कलाएं तो उपस्थित हैं, लेकिन उनका विश्लेषण करने वाली आलोचना बहुत कम है, खासतौर से हिंदी आलोचना एक तरह की छुटभैया आलोचना ही है। चित्रकला के क्षेत्र में बड़े कलाकारों पर कोई गंभीर आलोचनात्मक पुस्तक नहीं है।’ एक शीर्षस्थ कला मर्मज्ञ, समीक्षक अगर कला समीक्षा को ऐसी उलझनों में घिरा हुआ पाता है, तो इसका अर्थ हुआ कि बात बहुत गंभीर है। 

वाजपेयीजी ने इन टिप्पणियों में कई समस्याएं उठाई हैं। पहली, कला समीक्षा का अभाव और उसका अपूर्ण होना। दूसरी, कला समीक्षा का उलझा होना और तीसरी, कविता की पठनीयता में कमी। अपनी पहली टिप्पणी में उन्होंने माना है कि आज भारतीय कला-चिंतन पूरी तरह पश्चिमी आधुनिक कला-चिंतन से आक्रांत है। यह सही है और इसके पीछे यह कारण भी हो सकता है कि बंगाल शैली के बाद भारत में जिस कला का विस्तार हुआ उसमें भावबोध, रूपाकृति और चित्रण विधान (तकनीक) पर पाश्चात्य प्रभाव बहुत अधिक था। पर इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि आधुनिक भारतीय कला-चिंतन को इस बात की भनक तक नहीं है कि हमारे यहां सदियों से कला-चिंतन होता रहा है। 

हमारे प्राचीन कला-चिंतन का उल्लेख संक्षेप में या विस्तृत, प्राय: कला इतिहास और दर्शन की हर पुस्तक में मिल जाएगा, पर समस्या दूसरी है। पहली बात तो यह कि पाश्चात्य कला-चिंतन की पकी-पकाई अवधारणाओं पर आधुनिक कला संरचनाओं का मूल्यांकन सरल हो जाता है। दूसरी, प्राचीन भारतीय कला विषयक मान्यताओं को लेकर आधुनिक कला का मूल्यांकन बहुत बड़े कालखंड और विपरीत सभ्यता की वैचारिकता के ध्रुवों को मिलाना है, जो सरल कार्य नहीं था। कला अपने मूल में सार्वभौमिक है, पर उसके कला रूप सभ्यता, संस्कृति, समाज, धर्म आदि से प्रभावित होते हैं। यहां वाजपेयीजी ने ठीक ही कहा है: ‘यह कठिन काम है और जिस तरह के आलोचनात्मक उद्यम और बौद्धिक सख्ती की मांग करता है, उसका खासा अभाव है।’ 

मगर यह कहने से काम नहीं बनता कि अभाव है। हिंदी साहित्य में जिस प्रकार समीक्षाशास्त्र विपुल मात्रा में लिखा गया और विकसित हुआ, उसका अंश भी कला (ललित) में नहीं हो पाया। इसका उत्तरदायित्व समीक्षकों पर ही है। हिंदी साहित्य में एक से एक उद्भट आलोचक हुए, पर भारतीय कलाशास्त्र की मान्यताओं को तत्कालीन कला से जोड़ते हुए कला समीक्षा की एक धाराप्रवाह परंपरा बनाने की किसी ने नहीं सोची। श्यामसुंदर दास, प्रेमचंद और राय कृष्णदास ने जो विशुद्ध कला आधारित कला समीक्षा शुरू की थी, उसको आगे के साहित्य समीक्षकों द्वारा विकसित किया जाना चाहिए था। 

कला आधारित समीक्षा की धारा का विकास न होने से ‘कई बार यह भी लगता है कि बहुत सारी आलोचना किसी कलाकृति या किसी कलाकार की अतिव्याख्या करती है और ऐसे अर्थ खोज निकालती है, जिनका सहज बोध सामान्य कला रसिकों को नहीं होता और जिसे वे देख-समझ नहीं पाते।’ क्यों? 

ऐसी स्थिति में पहले तो संभव है कि समीक्षक का ज्ञान उसकी भाषा पर हावी हो जाता हो और दूसरी दशा में यह कलाकृति का मर्म खोजने के श्रम से बच कर निकल जाने का रास्ता भी हो सकता है। यहां वाजपेयीजी ने ठीक लिखा है कि ‘रचना संप्रेषणीय न हो तो आलोचना को हर हालत में संप्रेषणीय होना चाहिए।’ वे यह भी मानते हैं कि कला आलोचना को संप्रेषणीय होना चाहिए और संप्रेषण का प्रश्न सदा से उलझा हुआ रहा है। फिर रास्ता कौन सुझाएगा। शब्दों की जादूगरी से संप्रेषण नहीं होता। विश्वनाथ त्रिपाठी ने एक जुलाई को इंडिया हैबिटाट सेंटर में नामवर सिंह से प्रश्न के संदर्भ में कहा: ‘रचना के तिलिस्म का प्रवेशद्वार भाषा ही है।’ हालांकि उनका संदर्भ साहित्य था, पर कला भी तो आज तिलिस्मी लगती है, तो उसके लिए सरल भाषा में समीक्षा और समीक्षा में सटीक व्याख्या की आवश्यकता है। 

हिंदी में कला आलोचना की स्थिति अत्यंत शोचनीय है। राय कृष्णदास की पतली-सी पुस्तक के बाद आज तक हिंदी में भारतीय कला के इतिहास की एक


भी उल्लेखनीय पुस्तक दिखाई नहीं देती। अलग-अलग कलाकारों पर तो लिखा भी गया, पर एक समग्र आलोचनात्मक इतिहास न जाने कब लिखा जाएगा? कला आलोचना में अंगरेजी का ही वर्चस्व दिखाई देता है। अकादेमी के कार्यक्रम हों, कला प्रदर्शनियां हों, कैटलॉग में परिचयात्मक लेख हों, प्रदर्शनियों के उद्घाटन भाषण हों, वे सभी निन्यानबे प्रतिशत अंगरेजी में संपन्न होते हैं। हिंदी में तो कुछ होता ही नहीं, फिर हिंदी कला समीक्षा दीन क्यों न हो? लगभग तीन वर्ष पूर्व ललित कला अकादेमी ने ‘हिंदी में कला समीक्षा दशा और दिशा’ शीर्षक से एक विचार गोष्ठी की थी, जो पिछले कुछ वर्षों में मेरी याद में अकादमी का एकमात्र कार्यक्रम है, जो हिंदी में संपन्न हुआ। 

वाजपेयीजी ‘संप्रेषण की उलझनें’ टिप्पणी का आरंभ ही इस वाक्य से करते हैं: ‘हम किसके लिए लिखते हैं और जिनके लिए लिखते हैं उनमें से कितनों तक वह पहुंच पाता है।’ यह प्रश्न समाज में कला की पैठ का भी है। यहां साहित्यकार जो लिखता है वह पाठक तक प्रकाशित रूप में पहुंचता है, मूल रूप में नहीं। उस रचना पर पाठक का कोई अधिकार नहीं होता। पर कलाकृति एक बार चित्रकार के हाथ से निकल कर समाज में किसी के पास गई तो उस व्यक्ति का कलाकृति पर अधिकार हो जाता है। वह एक साथ अनेक व्यक्तियों तक नहीं पहुंच सकती। रचित साहित्य न तो बेचा जाता है न ही उसकी नीलामी होती है। कलाकृति एक वस्तु के रूप में बिकती है। कला एक उत्पाद हो गई है, इसलिए उसका बाजार होता है। वह भविष्य में अधिक मूल्य पर बेच कर धन कमाने के लिए भी खरीदी जाती है। 

कला और साहित्य के संप्रेषण में भी मूलभूत अंतर है। कला की इकाई रूपाकृति है और साहित्य की शब्द। इसलिए रूपाकृति में रची गई कला और शब्दों के सहारे रचित साहित्य के संप्रेषण में अंतर हो जाता है। कला रूपों में अर्थ विस्तार की बहुत गुंजाइश है, इसलिए केवल ऐसा नहीं है कि ‘अपनी ओर से समझने का उद्यम ही नहीं करना चाहते।’ कलाकृति के भावार्थ तक दर्शक कैसे पहुंचे, जबकि पूरी समीक्षा कलाकृति को बिना छुए निकल जाती हो। 

मेरा अनुभव है कि जिस प्रकार साहित्य का पाठकों में प्रसार होता है, कलाकृतियों का दर्शकों में नहीं होता। आम आदमी कलाकार को अजूबा मानता है, जो कलाकृति में ऐसा जादू भर सकता है कि वह करोड़ों में बिके। कलाकृति की महानता नीलामी के मूल्यों से और मीडिया के प्रचार से स्थापित होने लगी है। ब्रिटेन में अगर यह बहस उठाई जा सकती है कि आम आदमी कविता से दूर क्यों होता जा रहा है, तो हमारे देश में यह स्थिति और अधिक भयंकर होगी ही। ऐसे में कला की समाज में पैठ कैसे हो? आम कला रसिक भी कलाकृति का आनंद ले सकें, ऐसी संप्रेषणीयता को उलझन मान कर छोड़ा नहीं जा सकता। 

संगीत की समीक्षा में जितने शब्द जिन तात्पर्यों के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं ऐसे कला में गढ़े क्यों नहीं जा सके, इसका रास्ता हिंदी के शीर्षस्थ लेखकों को ही निकालना है। प्रश्न उठाने के बाद उनका समाधान तो समीक्षक ही निकालेंगे। कला गैलरियों की संख्या अधिक होना या उच्च धनाढ्य वर्ग का कला से जुड़ना इस बात का प्रमाण नहीं है कि कला समाज से अधिक जुड़ या संप्रेषित हो रही है। एक ओर साहित्य प्रकाशित होकर छोटे-छोटे कस्बों तक पहुंच जाता है और छोटे-छोटे शहरों से पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं वहीं कला कॉरपोरेट जगत से जुड़ती चली जा रही है। साहित्य विशिष्ट से सामान्य में फैलता है, जबकि कला विशिष्ट में सिमटती जा रही है।


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