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भाषा: धारा के विरुद्ध PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:37

विजय बहादुर सिंह

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : ‘हिंदी में खिले हुए हैं बहुरंगी देश-काल’। कविता की यह पंक्ति अपना पूरा आशय तब खोलती है, जब हम इसके ठीक बाद की पंक्ति भी पढ़ते हैं- ‘आग के रंगों से नहाए हुए’। लीलाधर जगूड़ी की कविता ‘रंगभूमि’ की ये दोनों पंक्तियां पढ़ कर मुझे हिंदी शब्दानुशासन वाले आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जैसे निगूढ़ पंडित याद आते हैं। उन्होंने लिखा है कि हिंदी के विकास में सबसे पहला योगदान अमीर खुसरो और मुसलमान दरबारों का है। कबीर या मीरा तो अपनी जगह, यह गोस्वामी तुलसीदास हैं, जो रामगुलाम और दरबार जैसे शब्द अपने दोहों में प्रयुक्त करते हैं। दरबार शब्द फारसी है। आज भी उनसे अधिक बड़ा हिंदू कौन है? ये दोनों यानी वाजपेयी और गोस्वामी केवल अपनी जाति से ब्राह्मण नहीं, आचार से भी थे। 

आर्यसमाज के संस्थापक, पश्चिमी सभ्यता, धर्म और साम्राज्य से मोर्चा बांध कर लड़ने वाले महान समाज-चिंतक और हिंदी के समर्थक स्वामी दयानंद ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में दोजख, काफिर, नुक्ता आदि शब्दों का प्रयोग किया है। वे तो हिंदी नहीं, वैदिक आर्य संस्कृति के एकांत समर्थक थे। रीतिकालीन कवियों और हमारे अपने जमाने के महान कथाकार प्रेमचंद ने भी उर्दू-फारसी के अनेक शब्दों का इस्तेमाल किया। प्रेमचंद की तो लोकप्रसिद्ध और अंतिम कहानी का शीर्षक ही है ‘कफन’। हिंदी की यह क्लैसिक कहानी है। 

और हमारा अपना पहनावा न तो राम का है न कृष्ण का, गौतम बुद्ध का न चाणक्य का। ‘कुरता’ कहीं का और पायजामा भी। अब जो लोग पायजामा या पैंट पहनते हैं या कमीज में कॉलर लगाते या बटन टांकते हैं उनका हिंदीकरण कैसे करेंगे। पायजामा पहना हुआ शख्स पायजामा छोड़ दे तो नंगा ही हो जाएगा बेचारा। फिर उसके पास चड््ढी या लंगोट ही बचेंगे। 

जो लोग हिंदी को सीधे-सीधे संस्कृत बनाने के नशे में हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि वह संस्कृत जैसी बिल्कुल नहीं है। हां, उसको अपनी सांस्कृतिक विरासत और एक स्तर तक चेतना का स्रोत अवश्य मानती है। जानने वाले जानते हैं कि हिंदी तो अपभ्रंश से फूटी है। यह भी कि वह संस्कृत की तरह कठिन नियमों से नहीं बंधी है। बहुत सारी भाषा-नदियां उसकी अपनी प्रसन्न और स्वच्छंद धारा में आकर मिली हैं। हिंदी की यह सहज प्रकृति है। उसमें जितना तत्सम (संस्कृत मूल के शब्द) हैं, उससे कई गुना तद्भव, बोलियों के और तुर्की, अरबी-फारसी के शब्द हैं। तमाम होटलों में जो रोटी शब्द चलता है, वह तुर्की का है। चपाती, करपट््िटका तो कोई नहीं बोलता, न ‘कफन’ को ‘मृत चैल’। हिंदी के कट््टर और कठमुल्ले अंधभक्तों को भी नहीं मालूम होगा कि यह ‘मृत चैल’ क्या है। 

भारतीय संस्कृति के दावेदार भक्तों को भला कहां पता कि आर्यों का सबसे बड़ा देवता इंद्र क्या खाता-पीता था। भारतीय राजनीति के आधुनिक चाणक्य कहे जाने वाले सागर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और इंदिरा गांधी युग के मध्यप्रदेश के चर्चित और विवादास्पद मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय आद्य इतिहास का अध्ययन’ में लिखा है- ‘इंद्र की क्षुधा उत्कट है। वह विशाल मात्रा में गोमांस, हलवा और मालपुओं का भक्षण करता और उन्मादक सोम या मधुसुरा के साथ इस भोजन को गटकता है।’ वैदिक ऋषियों ने, जो अधिकतर न भी कहें तो बहुधा मांसाहारी थे, अपने इस देवेंद्र की स्तुतियां खूब रची हैं। 

महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग मिलेंगे जो आज की स्थितियों से मेल नहीं


खाते। आज कौन भारतीय होगा जो पांचाली के साथ पांडवों की जीवन-शैली का समर्थन करना चाहेगा? यों उत्तराखंड के देहरादून इलाके से ऊपर अब भी ऐसी आबादी है, जो इस रूढ़ि को अपनी परिवार-प्रथा बनाए चल रही है। महाभारत में भीम आदि के खाने, युधिष्ठिर के जुआ खेलने या उस झोंक या नशे में अपनी महिमामयी पत्नी को ही दांव पर लगाने को आज कौन भारतीय है, जो अपनी जीवन-संस्कृति में शामिल करना चाहेगा? 

भारतीय संस्कृति में बाहर से कितना आकर मिला है और आधुनिक भारतीय संस्कृति का स्थायी नागरिक बन गया है, इसे कहां तक गिनेंगे। तबला, जो संगीत महफिलों का दमदार संगत-वाद्य है, क्या कथित भारतीय संस्कृति की देन है? अपना तो मृदंग है, सितार है, वीणा है। हारमोनियम और सारंगी भी अपने नहीं। 

हिंदू, हिंदी और उसके प्रेमी (?) अगर भारतीय संस्कृति और जीवन-परंपराधारा को समझना चाहें तो और कुछ नहीं, वैदिक और लौकिक संस्कृत भाषा, रामायण, महाभारत, कालिदास की रचनाओं आदि का तुलनात्मक अध्ययन कर लें, बगैर किसी पर भरोसा किए। वे चाणक्य के अर्थशास्त्र, वात्स्यायन के कामसूत्र का भी अध्ययन करें। उनका तो भला होगा ही, लोकसमाज और समकालीन भारतीय सत्ता, राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति का भी भला होगा। 

कौन नहीं जानता कि जैसे मुसलमान के लिए इस्लाम, कुरान, ईसाई के लिए बाइबिल, वैसे हिंदू के लिए वेद, उपनिषद, पुराण और रामायण-महाभारत हैं। विष्णु, शिव, दुर्गा, काली, गणेश भी। अकेले हिंदुओं में कितनी विविधता और बहुलता है। अलग-अलग देवी-देवताओं की अलग-अलग पूजा और भोग हैं। अन्य बचे हुए लगभग तैंतीस करोड़ देवताओं के बारे में मैं नहीं जाता। हिंदू वह हो ही नहीं सकता, जो धर्म के भीतर की इस रंगीन विविधता और बहुलता को नहीं जानता, जिसका लोकतांत्रिक गणराज्य में भरोसा नहीं है। 

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे तथाकथित हिंदुओं के होते सारा मस्त और उदार हिंदू समाज शर्म भोग रहा है। 

जब अयोध्या की बाबरी मस्जिद गिराई जा रही थी तो एक हिंदू मठवासी साधु ने- जो मेरे गांव (अवध-अयोध्या) के निकट पैदा हुआ था- पूछा था कि आप यह बताइए कि अगर रथयात्रा के कप्तान या सेनानायक आडवाणी अगले जन्म में किसी मुसलमान के घर पैदा हो गए तो भी क्या उन्हें बाबरी मस्जिद ध्वंस का खयाल आएगा? हिंदुत्व पुनर्जन्म मानता है न? उसी ने कहा था कि जब अपने तैंतीस करोड़ देवता हैं, तो एक और मोहम्मद साहब क्यों नहीं शामिल कर लिए जाते हैं। किसी भी हिंदू दावेदार को यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी शंकराचार्य स्वरूपानंद की कितनी फजीहत की जा रही है और हो रही है। क्या कोई सचमुच का हिंदू चाहेगा कि हमारी सामूहिक फजीहत हो? बहुसंख्यक हिंदू समाज तो नहीं। हिंदी समाज भी भला क्यों चाहेगा?


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