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वक़्त की नब्ज़ : बदलाव की बयार PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:33

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : दशकों से स्वतंत्रता दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा फहराने के बाद हमें बताते हैं कि हमारा भारत महान है। हमारी खामियों को भुला कर इन्होंने याद दिलाया है सिर्फ हमारी महानता का, हमारे तथाकथित विकास और प्रगति का। इस 15 अगस्त को पहली बार हमारे प्रधानमंत्री ने सत्य से देशावासियों का सामना करवाया, भारत देश का चेहरा दर्पण में दिखा कर। याद दिलाया नरेंद्र मोदी ने कि हम जगत गुरू बन सकते हैं लेकिन आज हम इस भूमिका के लायक बिल्कुल नहीं हैं।

मैंने कई बार सुने हैं लालकिले की प्राचीर से हमारे राजनेताओं के भाषण। अक्सर इन भाषणों में यही सुना है कि भारत दुनिया का सबसे महान देश है और हमारी सरकार इस देश की गरीब जनता के लिए खून पसीना दिन रात एक करके काम कर रही है। इसलिए बहुत अच्छा लगा मुझे जब नरेंद्र मोदी ने इस बार अपने भाषण में हमको उन चीजों की याद दिलाई जिनको देख कर हम आंखें बंद कर लेते हैं। या फिर गरीब देश होने की दलील देकर अनदेखा कर देते हैं। सो जो हमारी सबसे गंभीर समस्याएं हैं उनकी तरफ हम देखते तक नहीं हैं, समाधान ढूंढ़ना तो दूर की बात।

किस प्रधानमंत्री ने कभी पहले अपने स्वतंत्रता दिवस वाले भाषण में बलात्कार का जिक्र किया है? किस प्रधानमंत्री ने देश की माताओं को याद दिलाया है कि उनका दायित्व बनता है अपने बेटों को सीधे रास्ते पर रखने का। कई और ऐसी बातें सुनने को मिलीं मोदी के भाषण में जो कभी पहले लालकिले की प्राचीर से हमने नहीं सुनी हैं। प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि 68 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी अपने इस भारत महान का यह हाल है कि देहातों में महिलाओं को रात के अंधेरे में खुली जगहों में शौच करना पड़ता है। याद दिलाया उन्होंने कि हमारे शहर और गांव इतने गंदे हैं कि यह गंदगी विदेशी पर्यटकों को दूर रखती है। याद दिलाया कि कितनी शर्म की बात है कि अभी तक हम गरीबी को खत्म नहीं करा सके हैं इस देश में।

मुझे उनकी बातों में सबसे अच्छी बात यह लगी कि उन्होंने हम सबको याद दिलाया कि हमारे भी दायित्व हैं देश की तरफ। देशवासियों को याद दिला कर कि उनकी भी भूमिका है देश के विकास और परिवर्तन में। मोदी ने स्पष्ट किया कि वह भारत को एक नई दिशा में ले जाना चाहते हैं। अभी तक हमारे सारे प्रधानमंत्री उसी रास्ते पर चलते आए हैं जो इस देश के पहले प्रधानमंत्री ने हमको दिखाया था-नेहरू के समाजवाद का रास्ता। नेहरूजी के समाजवाद की बुनियाद है कि सरकार माईबाप है और हम उसके लाचार बच्चे। मैं निजी तौर पर वर्षों से इस सोच के खिलाफ रही हूं क्योंकि मेरा मानना है कि इस किस्म के समाजवादी सोच ने एक ऐसी मानसिकता को जन्म दिया है जिसने भारत को आगे बढ़ने से रोक के रखा है।

यह इसलिए कि जब सरकार पर जनता इस तरह निर्भर हो जाती है तो देश में प्रगति लाना तकरीबन असंभव हो जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ है अपने इस भारत देश में। माईबाप सरकार वाली मानसिकता


देश भर में जहर की तरह फैली हुई है लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान दिखता है देहातों में। आम लोग गंदगी में रहते हैं सिर्फ यह सोच कर कि सफाई करना सरकार का काम है। देहातों में आप अगर सड़ते हुए कूड़े की तरफ इशारा करके लोगों से पूछें कि वह इनको उठा क्यों नहीं लेते हैं तो अक्सर जवाब मिलता है कि यह उनका काम नहीं है। कसूर इस देश के आम आदमी का नहीं, कसूर उस मानसिकता का है जो माईबाप सरकार की समाजवादी नीतियों से पैदा हुई है। इसलिए जब प्रधानमंत्री ने देशवासियों को उनके दायित्वों की याद दिलाई सफाई अभियान को सफल बनाने में, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।

उससे भी अच्छी लगी उनकी यह बात कि गरीबी के खिलाफ हमको मिलकर लड़ना पड़ेगा। सार्क देशों को भी निमंत्रण दिया कि वह इस युद्ध में हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ें। इस बात से भी जाहिर होता है कि वह नेहरू के समाजवाद से अलग रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। नेहरू के समाजवाद में गरीबी को हमेशा कायम रखना जरूरी होता है ताकि हमारे समाजवादी नेता जाहिर कर सकें गरीबों में खैरात बांट कर कि उनके दिलों में गरीबों के लिए कितना दर्द है। सो समाजवाद के नाम पर शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती हैं लेकिन इसमें भी धोखा है। इन आम सेवाओं द्वारा न अच्छे स्कूल बने हैं और न अच्छे सरकारी अस्पताल लेकिन इन सेवाओं को बेहतर करने का काम 68 वर्षों से नहीं हुआ है क्योंकि हमारे शासक इनको गरीबों के लायक समझते हैं। उनके अपने बच्चे उन स्कूलों में कभी नहीं पढ़ते हैं जो जनता के लिए बनाए गए हैं और जब नेताजी खुद बीमार पड़ते हैं तो समाजवादी नीतियों के तहत उनको विदेशों में इलाज करने की इजाजत है।

अपने आपको प्रधान सेवक कहकर मोदी ने भारत सरकार के आला अधिकारियों और अपने मंत्रियों को याद दिलाया कि वह जनता की सेवा करने आए हैं राजनीति में, जनता पर राज करने नहीं। यह बात अक्सर हमारे जनप्रतिनिधि भूल जाते हैं बिल्कुल। उनको सीधे रास्ते पर रखने के लिए प्रधानमंत्री ने एक ऐसी योजना का एलान किया अपने भाषण में जो सांसदों को अपने चुनाव क्षेत्र में बार-बार जाने के लिए मजबूर करेगी। इस योजना के तहत हर सांसद को अपने क्षेत्र में एक मॉडल गांव का निर्माण करना होगा अगले दो सालों के अंदर। कुछ और हो न हो परिवर्तन की सुगंध तो आई है इस बार लाल किले की प्राचीर से।


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