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कभी-कभार : ज्ञानपीठ पुरस्कार PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:24

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : ज्ञानपीठ पुरस्कार इस बार फिर हिंदी में आया, यह अच्छी बात है। वर्तमान साहित्य हिंदी में विपुल-समृद्ध है यह इसका एक और प्रमाण है। वह इस बार कविता के लिए मिला यह भी, मेरे जैसे कविता के निर्लज्ज पक्षधर के लिए, प्रसन्नता का विषय है। वह एक मित्रकवि को मिला, यह भी खुश करने वाली खबर है। केदारनाथ सिंह ने बहुत अधिक परिमाण में कविता नहीं लिखी है: अपने कई समवयसियों की तुलना में वे कविता में मितभाषी ही हैं। यह कहना कठिन है कि उन्होंने कभी असावधानी से कविता लिखी है: उनका शिल्प शुरू से आज तक बिल्कुल सधा हुआ है। उसमें कच्चापन, बल्कि खुरदरापन भी मुश्किल से मिलता है। वे कई मायनों में सुमित्रानंदन पंत की याद दिलाते हैं: सुदर्शनता, सौम्यता और सौजन्य में वे पंतजी जैसे ही हैं। 

‘सौजन्य से सभी खुश रहते हैं’ इसका वे जीता-जागता प्रमाण हैं: उन्हें लगभग अजातशत्रु कहा जा सकता है, क्योंकि हमारे दूसरे कवि ज्ञानपीठ-पुरस्कृत कुंवर नारायण की तरह, उन्होंने भी कभी किसी के बारे में कोई कड़ी बात नहीं कही है। उनको ज्ञानपीठ मिलना इसलिए भी निर्विवाद है। यह अकारण नहीं है कि उन्हें हिंदी के सभी बड़े पुरस्कार बारी-बारी से मिलते गए हैं: उनकी सुपात्रता को लेकर कभी कोई संदेह प्रगट नहीं किया गया है। उनका काव्य-संसार सुगठित है- उसमें लोक छबियां, अपने गांव-घर की स्मृतियां और चौकन्नी आधुनिक नागरिकता सब एक साथ हैं। उनकी आधुनिकता में एक तरह का अदम्य गीति-तत्त्व हमेशा सक्रिय और अक्सर अंत:सलिल रहा है। उनकी कविता इस समय हिंदी में सबसे संप्रेषणीय कविता में बहुमान्य है। वह अटपटेपन, कठिनाई और जटिलता से बच कर लिखी गई कविता भी है। 

यह सब कहने के बाद मुझे लगता है कि ज्ञानपीठ उनसे पहले, मुझ नाचीज की राय में, हमारे दो बड़े गद्यकारों कृष्णा सोबती और कृष्ण बलदेव वैद को मिलना चाहिए था। केदारजी अच्छे कवि हैं, लेकिन उन्हें बड़ा कवि कहने में मुझे संकोच होगा। हो सकता है कि मैं गलत होऊं अपने इस आकलन में, मेरे हिसाब से अज्ञेय-मुक्तिबोध-शमशेर-नागार्जुन की चतुर्थी के बाद हिंदी में पिछले लगभग पचास वर्षों में कोई बड़ा कवि नहीं हुआ है। लेकिन बड़े गद्यकार हुए हैं। संक्षेप में इस दावे का कुछ आधार बताना जरूरी है। 

कृष्णा सोबती की दृष्टि महाकाव्यात्मक है और उन्होंने कथा की संरचना में मूलगामी नवाचार किया है। उनके यहां उदग्र नागरिकता और जिम्मेदार आधुनिकता है और वे उसे लोकजीवन में अवस्थित करती हैं। मानवीय संबंधों की गहनता और विडंबनाओं का उनका कथान्वेषण अप्रतिम है। जीवन की अबाध गति और उसकी चपेट में आए मनुष्यों की उनकी गाथा अपने रेंज में विराट है। दूसरी ओर, हिंदी की कथाभाषा में जितना निर्भीक, लगभग अकेला और जबर्दस्त नवाचार वैद साहब ने किया है उतना किसी और ने नहीं। उपन्यास और कहानी दोनों के रूपाकार को हमारी विडंबनाओं, अंतर्विरोधों, पाखंडों और विद्रूपों से जितना उन्होंने दोचार करवाया है उसकी दूसरी मिसाल मिलना कठिन है। दोनों ही गद्यकारों के पास गहरी नैतिक दृष्टि और मानवीय नियति की सघन-उद्विग्न चिंता है। दोनों ही केदारजी से आयु, उपलब्धि और निर्भीक नवाचार में जेठे हैं। दोनों के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि जरूरत पड़ने पर वे अपने शिल्प को अराजक होने के कगार तक ले गए हैं, जो बड़ी कल्पनाशीलता और साहसिकता का प्रबल साक्ष्य है। यह भी नोट करने की बात है कि दोनों जैसे कथाकार किसी अन्य भाषा में शायद ही हों, हालांकि बड़े गद्यकार कई भाषाओं में निश्चय ही हैं। इसे मैं दर्ज किए बिना नहीं रह सकता कि ज्ञानपीठ मिलने के बाद एक निजी बातचीत में केदारजी ने स्वयं मुझसे कहा कि उनसे अधिक कृष्णा सोबती उसकी सुपात्र हैं। उनकी ईमानदारी खरी और उजली है। 


हिंदी कुंभ

बहुत दिनों से एक विचार मन में चलता रहा है कि हिंदी अपनी बहुलता, जीवंतता और सर्जनात्मकता का कोई बड़ा उत्सव क्यों नहीं मनाती! सिर्फ साहित्य नहीं, पत्रकारिता, अध्ययन-अध्यापन, ललित कलाओं, रंगकर्म, संगीत और नृत्य, लोककलाओं, पकवानों-मिठाइयों, वैचारिक वाद-विवाद-संवाद, संस्थाओं, सिनेमा आदि अनेक विधाओं का एक मिलाजुला कुंभ। हममें से अधिकांश को यह पता होगा कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय के लगभग सभी घराने हिंदी अंचल में रहे हैं; उसमें गाई जाने वाली सभी बंदिशें हिंदी की बोलियों में ही होती हैं; कथक हिंदी अंचल का शास्त्रीय नृत्य है; पंडवानी, नौटंकी, बिरहा आदि हिंदी अंचल की ही लोकविधाएं हैं; ज्यादातर हिंदी सिनेमा हिंदी में ही होता है; आध्यात्मिक प्रवचन और उपदेश हिंदी में ही दिए जाते हैं आदि।  

पर हममें से अधिकांश हिंदी के बारे में सोचते हुए उस समूची विविध संस्कृति के बारे में कम सोचते हैं, जो कि हिंदी अंचल की रही है और है। हम राजकाज में हिंदी के हाशिये पर होने से इतना त्रस्त रहते हैं कि भूल जाते हैं कि राज्य से बाहर और अलग जन-जीवन और भारतीय समाज में हिंदी कितने रूपों में घर करती रही है। हमें इसकी खबर ही नहीं है कि कबीर का यानी हिंदी के एक महाकवि का अनुसरण करने वाले लोगों की संख्या पूरे भारत में छह करोड़ के लगभग है जैसा


कि शबनम विरमानी ने अपनी विस्तृत कबीर-यात्रा में अनेक रूपों में अभिलिखित किया है। 

हिंदी अंचल में होने वाली रामलीलाओं की संख्या हजारों में जाएगी और रामकथा कहने-सुनने वाले तो इतने अधिक हैं कि उनकी संख्या का सही अनुमान लगाना कठिन है। अगर यह सब हिंदी में होता है और इसलिए हिंदी है, तो हम उसे वर्ष में एक बार सही, कहीं एकत्र क्यों नहीं देखते-सराहते? सारे धार्मिक कुंभ हिंदी अंचल में ही होते हैं: वहां हिंदी की एक वार्षिक भाषा-कुंभ क्यों नहीं? 

असमिया, मलयालम, मराठी आदि में साहित्य और भाषाओं के उनके पारंपरिक समारोहों में हजारों लोग जुटते हैं: हिंदी में, उसकी विपुल सांस्कृतिक संपदा के बावजूद, ऐसा क्यों नहीं होता? हमने कुछ लोगों से बात की है और उनकी मदद से कुछ हो सके इसकी कोशिश है। तथाकथित औपचारिक, पाखंडमय और उबाऊ हिंदी दिवस या हिंदी सप्ताह में अगर इस तरह का कुछ हो तो उसकी औपचारिक एकरसता से कुछ निजात भी मिल सकेगी। 


चुपचाप

हम चुपचाप अपने आसपास और जीवन-जगत को देख-निरख रहे हैं। चुप्पी में कई तरह से भलाई है: एक तो आप कोई अपरिपक्व-अधीर फैसला देने से बच जाते हैं। दूसरे, आप सही और सटीक शब्द खोज कर बोलने की झंझट में नहीं फंसते। तीसरे, चूंकि अक्सर आपके मन में यह स्पष्ट नहीं होता कि आपका क्या पक्ष है, आप उसे मुखर करने से या कि अपना असमंजस जाहिर करने से भी रह जाते हैं। चौथे, आप चुप रह कर किसी का दिल दुखाने से भी बच जाते हैं। बोल कर आप कई तरह के खतरे मोल लेते हैं। पहला तो यही कि आप कितनी ही सावधानी क्यों न बरतें, जो आपको गलत ही समझना चाहते हैं वे वैसा ही समझेंगे। दूसरा यह कि आप, हो सकता है, जो बोलें वह जरूरत से कम या ज्यादा हो। तीसरा यह कि आपके बोलने से कहीं कोई फर्क न पड़े और आपको लगे कि आप नाहक बोले। चौथा यह कि आपको बाद में लगे कि आपने जो कहा उसे किसी दूसरे ढंग से कहते तो कम नुकसान या बेहतर होता। 

ऐसे सयाने-समझदार लोग हमारे आसपास होते हैं, जो हमें बोलने से रोकते हैं। उन्हें सारा बोलना, किसी मुद्दे पर या व्यक्ति या पुस्तक या कलाकृति आदि पर, व्यर्थ और गैरजरूरी लगता है। अन्याय या गलत कार्रवाई के खिलाफ बोलना भी उनको बेकार नजर आता है। उनका शायद यह खयाल होता है कि आपके बोलने से अन्याय रुक भले जाए, खत्म तो नहीं होगा और आप दूसरों का बोझ खुद उठाने की जहमत क्यों मोल लेते हैं! ऐसे भी हैं जो खुद नहीं बोलते और इसलिए पाक-साफ और सुरक्षित बने रहते हैं, पर दूसरों को बोलने के लिए उकसाते रहते हैं। 

हमारी उमर में पहुंचे लोग कई बार यह महसूस करते हैं, पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ, कि आप के अब दिन और अवसर ही कितने बचे हैं कि बोल कर दूसरों को प्रतिवाद आदि का अवसर देने में व्यर्थ उन्हें गंवाएं! दुनिया जैसी चल रही है वैसी ही चलेगी और आपके बोलने से उसकी गति और मति में कोई अंतर आने से रहा। दुनिया बदलने के सभी सपने इतिहास के कूड़ेदान में हैं और आप उन्हें चुपचाप देखें और उनसे सबक लें, यही बेहतर है। 

हम जैसे लोग जो शब्दों के व्यवसाय में ही पले-बढ़े हैं यह आसानी से नहीं मान सकते जैसे कि हमारे ही एक बड़े कवि ने कहा है: ‘मौन भी अभिव्यंजना है’। हमें यह मानने में भी कठिनाई है कि शब्दों के बीच भी चुप्पियां होती हैं और कई बार कविता वहीं बसती है। हम एक वाचाल युग में रहने वाले लोग हैं, जो बिना बोले रह नहीं सकते। सारा युग बोल रहा है, चलबोले यंत्रों पर, अखबारों और चैनलों पर, मंचों और संसदों में, युद्धों और बमबारियों में, कुंजों-निकुंजों में, बारिशों और सूखों में, बर्फबारी और कीचड़ में- हमसे चुप रहने को कहना हमें इस युग से बाहर कहीं कर देने जैसा है! 

आखिर चुप रह कर क्या होगा? बोल कर कम से कम अपने अंत:करण को यह सांत्वना तो दे सकते हैं कि हमने कुछ किया। हमारा बोलना ही इन दिनों करना हुआ जा रहा है। किसी और युग में शब्द इतना कर्म नहीं हुए थे! हम लड़ रहे हैं कि नहीं, पता नहीं। पर शब्द हमारे अस्त्र और उपकरण हैं। हमसे चुपचाप रहने को न कहिए!


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