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पुस्तकायन: स्मृतियों का वितान PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:22

महेश आलोक

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : कांतिकुमार जैन की ख्याति आलोचक-शोधकर्ता से अधिक संस्मरण लेखक के रूप में रही है। हरिशंकर परसाई के साथ बिताए समय और यादों को समेटती उनकी पुस्तक ‘तुम्हारा परसाई’ खूब चर्चित रही। उनके संस्मरणों की बड़ी विशेषता है कि वे व्यक्ति के उन अनछुए पहलुओं पर भी प्रकाश डालते हैं, जिनसे हम अनभिज्ञ रहे हैं। वस्तुनिष्ठता, व्यक्तिगत संबंधों में ईमानदारी और पारदर्शिता संस्मरण लेखक की रचना प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा हैं। और वह सामग्री, चाहे पत्र हो या स्मृति के आधार पर बातचीत के अंश, उन्हें संपादित करने की कला, जिससे संस्मरण रोचक और पठनीय बन सके और उस व्यक्तित्व की ख्याति पर भी कोई आंच न आ सके- यह गुण उसमें निहित होना बहुत जरूरी है। फिर संस्मरण जब मुक्तिबोध जैसे विराट काव्य-व्यक्तित्व पर लिखा जा रहा हो, तब खतरा थोड़ा और बढ़ जाता है। 

महागुरु मुक्तिबोध- जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर इस दृष्टि से कांतिकुमार जैन की एक और कृति है, जो संस्मरण लेखन की लगभग विलुप्त होती विधा में नया रचनात्मक अध्याय जोड़ती है। मुक्तिबोध के मित्रों की एक लंबी फेहरिश्त इस पुस्तक में मौजूद है। कुछ चर्चित, कुछ अचर्चित, कुछ पहचाने, कुछ संस्मरण को गति प्रदान करने के लिए आए हुए। लेकिन इन सबमें जो सबसे खास बात रेखांकित करने की है कि मुक्तिबोध के वैचारिक सहचरों में जितने भी लोग शामिल थे, चाहे वे स्वामी कृष्णानंद ‘सोख्ता’ हों, अब्दुल हक खां ‘मशरिकी’, नरेश मेहता, जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, रामकृष्ण श्रीवास्तव, शिवकुमार श्रीवास्तव, अनिल कुमार, हरिशंकर परसाई, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा या भाऊ समर्थ जैसे चित्रकार या बिल्कुल नए कवि सतीश चौबे- सभी मुक्तिबोध की वैचारिक प्रतिभा से आतंकित थे। लेखक के अनुसार- ‘इस मंडली में सम्मिलित होने की एक ही शर्त थी- वह व्यक्ति बौद्धिक हो और महागुरु का विश्वास अर्जित कर ले।’ महागुरु यानी मुक्तिबोध। 

इस संस्मरण से एक खास बात निकल कर आती है कि क्या मुक्तिबोध अपने वैचारिक आग्रह के प्रति इतने ‘सीलबंद’ थे कि ‘विचारों के लोकतंत्र’ के प्रति उनमें कोई आस्था नहीं थी? यह ठीक है कि यह कृति मुक्तिबोध के जीवन-संघर्ष को इस रूप में प्रस्तुत करती है कि आप द्रवित हो जाएं। ‘तार सप्तक’ का कवि, अपने ‘स्वाभिमान’ और ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ की कीमत पर समझौता न करते हुए नितांत फटेहाल जिंदगी व्यतीत कर रहा हो, सैंतीस वर्ष की अवस्था में ही साठ का लगने लगा हो, ‘टूटे दांत और फटे कुर्ते के कारण उपहास का पात्र’ बन गया हो। स्त्रियां देख कर हंसती हों, बकौल मुक्तिबोध- ‘‘वह जानती नहीं मैं कौन हंू? मैं ‘ब्रह्मराक्षस’ हूं। अनादिकाल से चला आया वह ‘ब्रह्मराक्षस’, जिसने हमेशा सही रहने की कोशिश की है और गलती करता चला गया।’’ 

निश्चित रूप से यह कृति मुक्तिबोध के प्राणलेवा जीवन-संघर्ष, उनकी अदम्य जिजीविषा, अपने मार्क्सवादी वैचारिक आग्रह के प्रति जिद की पराकाष्ठा तक अडिग रहने की सार्थक अंतर्निष्ठा (हालांकि उनके पूरी तरह मार्क्सवादी होने पर ‘मशरिकी’ साहब को संदेह था), जीवन-यापन में बर्बर और कू्रर होते समय की मर्मांतक और पीड़ादायक उपस्थिति के बावजूद उद्दाम रचनाशीलता को बचाए रखने का साहस और एक खास समय में गहरी असुरक्षा ग्रंथि के शिकार रचनाकार की मनोदशा का बेबाक चित्रण करती है। निश्चय ही मुक्तिबोध के मूल्यांकन में इस कृति से नई आधार भूमि मिलेगी, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। 

मुक्तिबोध को ‘महागुरु’ का खिताब देने वाले जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’ (जिन्हें ‘महागुरु’ का ‘महाचेला’ कहा गया है) की मुक्तिबोध को टूटने से बचाए रखने में अहम भूमिका रही है। मुक्तिबोध को ‘महागुरु मुक्तिबोध’ बनाया नागपुर ने। नागपुर में ही वे अपने जटिल असुरक्षा ग्रंथि से बाहर आए, ‘कामायनी और भारतीय इतिहास’ पर नए सिरे से विमर्श किया और अपने घर में पर्याप्त स्थान न होने के कारण थोड़ी दूरी पर ‘जुम्मा टैंक यानी जुमेराती का तालाब’ की सीढ़ियों पर बैठ कर वैचारिक संवाद के माध्यम से वह विमर्श-मंडली भी बनाई, जिसका जिक्र हम पहले कर चुके हैं। ‘मुक्तिबोध का शायद ही ऐसा कोई मित्र हो, जो जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर उनके साथ न बैठा हो और जिसने महागुरु से संवाद न किया हो।’ 

इस महत्त्वपूर्ण संस्मरणात्मक दस्तावेज में दो नाम ऐसे हैं, जिनका जिक्र लेखक के अनुसार पहली बार मुक्तिबोध के संदर्भ में आया है। वे हैं- कृष्णानंद ‘सोख्ता’ और अब्दुल हक खां ‘मशरिकी’। कृष्णानंद ‘सोख्ता’ नागपुर से ‘नया खून’ साप्ताहिक निकालते थे। अपने नाम के अनुरूप


यह पत्र प्रगतिशील तो था ही, अपने स्वभाव में इसी कारण ‘जन-चरित्री’ भी था। मुक्तिबोध मंडल के सक्रिय सदस्य थे सोख्ताजी। मुक्तिबोध, ‘नया खून’ में नाम बदल कर लेखन करते। धारदार लेखन और लिखते भी थे ‘नया खून’ के कार्यालय में ही। वे कभी अवंतीलाल गुप्त, तो कभी यौगंध नारायण तो कभी अमिताभ के नाम से लिखते थे। 

सोख्ताजी आम आदमी के हक की लड़ाई ‘नया खून’ के माध्यम से लड़ रहे थे। ‘कलामे सोख्ता’- नया खून में उसी के पक्ष का कलाम है। सोख्ताजी क्रांतिकारी भी बने, जेल गए और इन सबने मुक्तिबोध की प्रतिरोधी क्षमता को और परिष्कृत कर दिया। असल में यह कृति एक बड़ा रचनाकार बनने की प्रक्रिया और उसकी पृष्ठभूमि का ज्वलंत दस्तावेज है। अनेक लोग, अनेक मित्र-कुमित्र, संघर्ष, फक्कड़पन, क्रांतिकारी, नेहरू युग की सच्ची तस्वीर, क्रांतिकारियों की गतिविधियां और इनके बीच से विकसित होता मुक्तिबोध का विराट व्यक्तित्व- पूरी कृति एक ऐसा कोलाज बनाती है कि बस आप इसमें, उसकी छवियों के अंदरूनी रहस्य में डूबते चले जाते हैं। लेखक का मानना है कि ‘‘स्वतंत्रता के बाद ‘नेहरू युग’ के मोहभंग का इतिहास जानना हो तो, ‘नया खून’ से बढ़ कर प्रामाणिक सामग्री और कहीं नहीं मिलेगी।’’ 

अब्दुल हक खां ‘मशरिकी’ का भी इस संदर्भ में उल्लेख जरूरी है। एक शायर, हर दिल अजीज इंसान। गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक। मुक्तिबोध के नागपुर आने के शुरुआती दिनों के ही मित्र। विद्रोहीजी, सोख्ताजी और मशरिकी साहब- इस त्रिकोण के बीच में ही मुक्तिबोध, ‘मुक्तिबोध’ बने। मशरिकी साहब भी श्रमिक संगठन से जुड़े थे, लेकिन शायरी जटिल करते थे। जनता की बात कहना, लेकिन इस तरह कहना कि जनता उसे समझ ही न सके। लेखक के अनुसार मुक्तिबोध और मशरिकी- दोनों की स्थिति इस मामले में एक जैसी थी। एक महत्त्वपूर्ण बात मशरिकी साहब के हवाले से लेखक ने इस कृति में रेखांकित की है: ‘‘मुक्तिबोध पूरी तरह मार्क्सवादी नहीं थे या उनके उन दिनों के हालात ने उन्हें पूरा मार्क्सवादी होने नहीं दिया।’’ क्या इसीलिए मुक्तिबोध अपने मार्क्सवादी मित्रों को भी ‘कामरेड’ नहीं, ‘पार्टनर’ कहते थे? 

इस संस्मरणात्मक कृति को पढ़ कर यह तथ्य तो उभर कर सामने आता ही है कि मुक्तिबोध की अधिकतर श्रेष्ठ रचनाएं नागपुर प्रवास में लिखी गर्इं। उनके मंडल के घनिष्ठ मित्रों में हरिशंकर परसाई जैसे व्यंग लेखक थे, तो भाऊ समर्थ जैसे बड़े कलाकार भी। नेमिचंद जैन, रामकृष्ण श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव और सतीश चौबे जैसे युवा कवि से लेकर अनिल कुमार जैसे आग उगलने वाले ‘लोहियावादी’ भी। वे रंग-संधान जैसी कला-पत्रिका भी निकालते थे। इन सबने अपनी-अपनी तरह से मुक्तिबोध को निर्मित किया है- प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में। 

हालांकि मुक्तिबोध महागुरु थे और मित्र-मंडली के स्वभाव और चरित्र के अनुसार मुक्तिबोध का ही प्रभाव हर तरफ दिखाई पड़ता है, जैसे मुक्तिबोध के ये सभी अनुकरणकर्ता हों। लेकिन इस कृति का अध्ययन करते हुए यह बात भी निकल कर आती है कि मित्रता में जाने-अनजाने परस्पर प्रभाव निर्मित होता ही है। शायद यही कारण है कि मुक्तिबोध के यहां ‘जटिल फैंटेसी’ के साथ-साथ गहरी नाटकीयता और ‘क्लोजअप’ और ‘लांग शाट’ भी बहुत है। ‘फैंटेसी’ में एक अमूर्त चित्रकला के तो दर्शन होते ही हैं, मित्रों को ‘पार्टनर’ कहते ही जो आत्मीयता, चिंता और लगाव झलकता था, वह भी उनकी कविताओं की रचना-प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। यह कृति मुक्तिबोध के ऐसे कई अनछुए पहलुओं से परदा उठाती है, जिसके बिना उनका सटीक मूल्यांकन शायद अधूरा जान पड़े।  

महागुरु मुक्तिबोध- जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर: कांतिकुमार जैन; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 500 रुपए। 


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