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पुस्तकायन: व्यवस्था की अंधेरी गलियां PDF Print E-mail
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Sunday, 17 August 2014 11:20

बिपिन तिवारी

जनसत्ता 17 अगस्त, 2014 : रूपसिंह चंदेल का उपन्यास गलियारे प्रशासनिक व्यवस्था की भीतरी सच्चाइयों की पड़ताल करता है। उच्चतम प्रशासनिक व्यवस्था देश में किस तरह काम करती है और किस तरह उसका चयन किया जाता है इसकी बारीक विवेचना की गई है। प्रशासनिक वर्ग में अपने को विशिष्ट मानने का भाव होता है। इसलिए यह वर्ग आम जन से पूरी तरह कट जाता है। वे जिस वर्ग की सेवा के लिए नियुक्त किए जाते हैं सबसे ज्यादा उसी के खिलाफ काम करते हैं। उपन्यास की कथावस्तु सुधांशु कुमार, प्रीति मजूमदार, डीपी मीणा आदि के आसपास बुनी गई है। इनके माध्यम से ही इस प्रशासनिक व्यवस्था की कारगुजारियों को अभिव्यक्त किया गया है। 

उपन्यास की मुख्य कथा सुधांशु कुमार और प्रीति मजूमदार के प्रेम संबंधों को लेकर है, पर अन्य कथाएं बाद में जुड़ती चली जाती हैं। सुधांशु की संघर्ष यात्रा बनारस से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज और फिर आइएएस बनने के बीच दिखाई पड़ती है, जिसमें अपनी पढ़ाई से लेकर रोटी तक का इंतजाम उसे ट्यूशन पढ़ा कर करना पड़ता है। हिंदू कॉलेज में उसकी मुलाकात प्रीति मजूमदार से होती है, जो एक संयुक्त सचिव की बेटी है। प्रीति मजूमदार पढ़ने में सामान्य है। वह सुधांशु से प्रभावित है। वह सुधांशु के दूर भागने के लाख प्रयास के बावजूद उससे अपने को जोड़े रखती है, जिसकी परिणति दोनों की शादी के रूप में होती है। 

उपन्यास में अचानक मोड़ प्रीति के आइएएस बनने के बाद आता है। देहरादून में नियुक्ति मिलने के साथ ही प्रीति अपने अधिकारों के प्रति अतिरिक्त सतर्क हो गई थी। वह सुधांशु से किसी भी रूप में अपने को कम मानने को तैयार नहीं थी। प्रीति ने एक समय सुधांशु के किसान परिवार की पृष्ठभूमि को लेकर भले उदारता क्यों न दिखाई हो, पर शादी के बाद वह इस भाव को छिपा नहीं पाती? वह शादी के बाद सुधांशु के माता-पिता को लेकर सामान्य नहीं रह पाती। उनकी आदतों में उसे गंवई पिछड़ापन दिखाई देने लगता है। 

प्रीति मजूमदार उच्च वर्ग में पली-बढ़ी है और सुधांशु की पारिवारिक स्थिति निम्नवर्गीय है। ऐसे में दोनों के बीच वर्गीय साम्य नहीं बन पाता। प्रीति अपनी वर्गीय स्थिति में उच्च होने का भाव प्रकट करती है। इसीलिए उसे सुधांशु दास की हर बात में हीनता नजर आती है। वह चाहे उसके मां-बाबूजी को लेकर हो, अपने गांव-समाज को लेकर, ईमानदारी से अपनी नौकरी करने को लेकर या साहित्य के प्रति उसके लगाव को लेकर। प्रीति की इस बात में ही उसके वर्गीय सरोकारों को समझा जा सकता है। ‘सुधांशु, अपनी निम्नमध्यवर्गीय मानसिकता से ऊपर उठो। सोच प्रगति में सबसे बड़ी बाधा होती है। व्यक्ति में प्रतिभा हो तो स्थितियों को बदल सकता है।’ इसी सोच के कारण वह प्रयास करने के बाद भी सुधांशु के माता-पिता को लेकर सहज नहीं हो पाती। 

आइएएस ट्रेनिंग के दौरान ही प्रीति मजूमदार की मुलाकात एक वरिष्ठ आइएएस अफसर डीपी मीणा से हो गई थी। इसके बाद से उसका सुधांशु दास से कटाव होता चला गया। वह अपने स्वार्थों को पूरा करने के हिसाब से जीवन जीने लगी, जिसके लिए सिद्धांत, नैतिकता, ईमानदारी आदि मूल्यों का कोई मायने नहीं था। उसके व्यक्तित्व में अपने पद, अधिकार आदि को लेकर अहं का भाव था। जिसका वह सुधांशु को अहसास भी कराती रहती थी। इसीलिए वह आसानी से डीपी मीणा के जाल में फंस गई। ट्रेनिंग के बाद पहली नियुक्ति और फिर दिल्ली मुख्यालय में तैनाती कराने तक का सारा जाल मीणा ने बिछाया। इसीलिए वह मीणा की अनुचित हरकतों का अधिक प्रतिरोध नहीं करती। 

यहां आकर स्त्रियों के अधिकार संपन्न और पढ़ने-लिखने और स्वावलंबी बनने के सारे तर्क भोथरे साबित हो जाते हैं। इस प्रवृत्ति को नब्बे के बाद के परिवेश में बखूबी देखा जा सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूरा ध्यान इसी बात पर है कि भारत में यौनिकता आदि को लेकर जो नैतिकता का भाव है उसको समाप्त कर दिया जाए, तभी उसको सेक्स सिंबल में बदला जा सकता है। प्रीति के लिए मीणा से संबंध बनाने को लेकर कोई अपराधबोध नहीं है। वह तो बेहतर की तलाश में थी। जो एक समय उसे सुधांशु से प्रेम का नाटक करके


मिला, तो दूसरे समय डीपी मीणा से। इसीलिए जब सुधांशु उससे मीणा को लेकर कोई बात करता, तो वह अपने पद और स्वतंत्रता की बात बहुत पुख्ता ढंग से कहती, जिसके लिए वह किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है। 

दरअसल, स्त्रियों को इस नई संस्कृति में जिस तरह एक जिंस मात्र में तब्दील किया गया है यह उसी की परिणति है। प्रीति मजूमदार उसी संस्कृति के बीच पली-बढ़ी है। उसके लिए किसी तरह का कोई मूल्यगत टकराव नहीं है। यही इस नई संस्कृति की खासियत है। यह संस्कृति नई पीढ़ी में भोग और स्वार्थ की एक नई संस्कृति विकसित कर रही है, जिससे वह अपने उद्देश्यों को आसानी से पूरा कर सके। प्रीति मजूमदार के चरित्र के हिसाब से देखें तो इसको प्रामाणिक ढंग से देखा-समझा जा सकता है। महत्त्वाकांक्षाएं व्यक्ति को कितना पतित कर सकती हैं, इसे प्रीति मजूमदार के चरित्र की मार्फत देखा जा सकता है। वह अपने लाभ के लिए सारे समझौते करती है। 

सुधांशु दास प्रशासनिक वर्ग का होने के बावजूद अपने को उस संस्कृति के हिसाब से बदल नहीं पाता, इसीलिए वह प्रीति से लेकर दफ्तर के लोगों की निगाहों में खटकता रहता है। यही उसका अपराध है। उसे हर तरह से प्रताड़ित किया जाता है। कभी उसका स्थानांतरण किया जाता है तो कभी उसको उसके पद के हिसाब से काम नहीं दिया जाता। उसके अपराध को महाभारत के एक पात्र (युयुत्स) के मार्फत कहें तो- ‘सत्य के प्रति रहा मैं दृढ़।’ 

सुधांशु का घुट-घुट कर मरना दरअसल एक संवेदनशील, ईमानदार आदमी की मौत है, जिसके लिए यह पतनशील प्रशासनिक वर्ग जिम्मेदार है। प्रीति मजूमदार जिम्मेदार है, जो सुधांशु दास को हर मौके पर छलती रही। सुधांशु ने साहित्य की दुनिया में शरण तलाशने की कोशिश जरूर की, पर वह वहां भी अपने तनावों से मुक्त नहीं हो सका। कथा पात्र का इस घुटन में मर जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। इसके माध्यम से समाज की दिशा को समझा जा सकता है। वह किस तरह के मूल्यों के हिसाब से आगे बढ़ रहा है। 

उपन्यास की कथा में कई शैलियों का इस्तेमाल है। कहीं आत्मकथात्मक शैली है, कहीं नाटकीय शैली तो कहीं फ्लैशबैक शैली। इससे कथा की रोचकता और बढ़ जाती है। ‘भ्रष्ट और रिश्वतखोर एक-दूसरे को तुरंत पहचान लेते हैं। वे एक ही गलियारे से गुजरने वाले राही होते हैं... गलियारे जो देश को पतन के अंधकार तक ले जा रहे हैं।... ये आजादी के बाद का वह इतिहास रच रहे हैं जिसकी कल्पना गांधी, सुभाष, भगतसिंह और उनके साथियों ने नहीं की थी।’ ये गलियारे सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था के पतन के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में भी बने हुए हैं, जिसे प्रीति मजूमदार, डीपी मीणा, चमनलाल पाल, अरुण कुमार भट््ट आदि पात्रों में देखा जा सकता है। 

उपन्यास ऐसे प्रश्नों को उठाता है, जो आज के समय के बड़े प्रश्न हैं, पर उन्हें जानबूझ कर अप्रासंगिक बनाने की पूरी कोशिश की गई है। सुधांशु के वर्गीय चरित्र की दृढ़ता एक सकारात्मक संकेत है कि इस वर्ग में भी सामाजिक सरोकारों के हिसाब से काम करने वाले लोग हैं। वे तमाम तरह की प्रताड़ना सहने के बावजूद अपने रास्ते से हटने को तैयार नहीं हैं। इसी कारण सुधांशु तथाकथित सफलता के पैमानों पर विफल होने के बावजूद उपन्यास का बड़ा चरित्र बन जाता है। 

गलियारे: रूपसिंह चंदेल; भावना प्रकाशन, 109-ए, पटपड़गंज, नई दिल्ली; 500 रुपए।


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