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Saturday, 16 August 2014 10:32

प्रेमपाल शर्मा

जनसत्ता 16 अगस्त, 2014 : मेघनाथ साहा का नाम देश के महान वैज्ञानिकों में शुमार किया जाता है। ढाका में 1889 में पैदा हुए मेघनाथ पहले इलाहाबाद और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे और भौतिकी एवं गणित के क्षेत्र में नाम कमाया। दामोदर घाटी परियोजना और नदियों को जोड़ने का शुरुआती विचार उन्हीं का था। वे देश के पहले वैज्ञानिक थे जो 1951 में लोकसभा के लिए चुने गए। उन्हीं दिनों सत्येंद्रनाथ बोस भी राज्यसभा में भेजे गए। ‘एकलव्य’ द्वारा प्रकाशित ‘स्रोत’ पत्रिका के नए अंक में उन पर कुछ और नई जानकारियां दी हैं।

पत्रिका पढ़ कर मैंने एक कथाकार मित्र को दे दी। विज्ञान के वे भी दीवाने हैं। बहुत प्रसन्न थे सब कुछ पढ़ कर। फिर बोले- ‘पता है मेघनाथ साहा दलित थे!’ और भी ऐसी दलित-सवर्ण विमर्श को जोड़ती बातें। न चाहते हुए भी मुझे टोकना पड़ा- ‘क्या जरूरत पड़ गई उनकी जाति खोजने की और आपने कहां से खोजी यह जन्मपत्री! पत्रिका में तो कहीं नहीं लिखा था और आज तक पूरा देश उन्हें पूरी श्रद्धा से महान वैज्ञानिक मानता है। इस जाति को लगाने से क्या हासिल होगा! मेरे एक वरिष्ठ कालिदास साहा थे। वे दलित नहीं थे। बडेÞ मेहनती, विद्वान। एक मजूमदार हैं उतने ही भले।’ मैंने कहा कि बंगाली समाज जाति या धर्म को जरूरत से ज्यादा तवज्जो नहीं देता। इसे बंगाल का असर कहें या वामराज का। अचानक पकड़े जाने से वे मित्र कुछ हकलाए कि ‘हम बस बता रहे हैं!’

दिल्ली के मेरे अनगिनत बुद्धिजीवी प्रोफेसर, पत्रकार मित्र हैं जो बात शुरू करने के पहले ही वाक्य में अपने ‘निशाने’ की जाति बताते हैं। ये वाइस चांसलर कुर्मी हैं, या ये भूमिहार या ये ब्राह्मण। क्यों भई! क्या जरूरत है बताने की या जानने की? ऊपर से तो आप सेक्युलर, जातिविहीन समाज बनाने का डंका बजाते हैं। उसी का साठ बरस से खा रहे हैं, लेकिन आपके भीतर जाति-धर्म इतना गहरे तक धंसा है कि वह खुद ही बोलता है। हाल में गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘मैत्री’ की गोष्ठी थी- ‘आंबेडकर और उनके बाद की राजनीति।’ नौजवान प्राध्यापक राकेश राना तो बहुत अच्छा बोले ही, कई भागीदारों ने भी खुल कर विचार रखे। लेकिन उस दिन एक बुद्धिजीवी की बात अभी भी खटक रही है। उन्होंने पूछा कि यहां बैठे लोगों में दलित कौन है! क्या हम सबने गांधी, आंबेडकर से यही सीखा है? क्या हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नहीं बचना चाहिए जाति जानने के पाप से। क्या वक्त नहीं आ गया है जब हमारे कोश से जाति शब्द सदा के लिए


मिटा दिया जाए।

कुछ बरस पहले एक मंत्रालय के विशेष कक्ष में बैठा था। सामने पड़े कागज पर निगाह गई तो पढ़ कर सारे संविधान के मूल्य दिमाग में सुन्न हो गए। नामों की सूची थी। कुमार रंजन, अवधेश भारती, स्फूर्ति कुमारी...! सबसे ऊपर पीली पर्ची पर लिखा था- ‘ये सब यादव हैं।’ ये भी लिखा जा सकता था कि ये सब भूमिहार हैं, ब्राह्मण हैं। कौन जाने विगत में ऐसी लंबी परंपरा रही हो, इसलिए ये बातें कभी खबर ही नहीं बनीं। इक्कीसवीं सदी के भारत में जाति की सियासत करने वाले शब्दों को सुन कर सिर शर्म से झुक जाता है। जो विज्ञान और वैज्ञानिक दुनिया भर के मनुष्यों को एक जीनोम से मापते हों, हिंदुस्तान में भाई लोग उनकी भी कब्र खोद कर जाति सिद्ध कर देते हैं।

देश के दूरदराज के गांवों में ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा जाति के नाम पर शोषण, अन्याय आज भी पूरी तरह कायम है। साठ-पैंसठ साल में भी संविधान के प्रावधान वहां नहीं पहुंचे और यही रफ्तार रही तो न जाने और कितने प्रकाश वर्ष लगें। लेकिन नई दिल्ली के इन सरकारी कार्यालयों में ऐसे जातिसूचक शब्द क्यों बेखटके टहल रहे हैं? क्या यह संविधान का अपमान नहीं है? मेघनाथ साहा की जाति के विमर्श के बीच मेरे एक और मित्र ने बताया कि ‘मैंने अपने बच्चों का जाति प्रमाणपत्र नहीं बनवाया। मैंने बच्चों से साफ कह दिया है कि मैं पिछले तीस साल से दिल्ली के शाहजहां रोड के पास रहता हूं। संयुक्त सचिव के पद पर हूं और इसीलिए सारी सुविधाओं में तुम रहे हो। फिर किस बात की रियायत और क्यों? यह उन्हें मिलनी चाहिए जिनके उत्थान के लिए संविधान में प्रावधान किया गया था।’ इस दोस्त का नाम पवन कुमार है। क्या मेरे बुद्धिजीवी खाए-पीए अमीर मित्र इन अनुभवों से कुछ सबक लेंगे? दोस्तो, शुरुआत तो करो!


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